सफलता का नया फॉर्मूला: बुद्धिमत्ता कृत्रिम, मूर्खता मौलिक
जब कोई अफसर बरसों से अटकी पड़ी फाइल को बिना खोले सिर्फ इसलिए नए सिरे से जांच के लिए लौटा दे क्योंकि उस पर लगे 'यू-पिन' का रंग फाइल कवर से मैच नहीं कर रहा था, तो यह वह प्रशासनिक मौलिकता है जिसे समझने में सिलिकॉन वैली का कोई भी डेटा मॉडल जिंदगी भर चकराता रहेगा। यही वह बिंदु है जहां समझदारी की सीमाएं दम तोड़ती हैं और सफलता का असली खेल शुरू होता है।
इस देश में तरक्की फाइलों के सही अध्ययन से नहीं, बल्कि ऐसे ही हैरतअंगेज और बेतुके फैसलों को पूरे अधिकार के साथ थोपने से मिलती है। अक्ल का बोझ ढोने वाला जिंदगी भर ड्राफ्ट सुधारता रह जाता है, जबकि अगाध और आत्मविश्वास से लबरेज मूर्खता के दम पर लोग कुर्सियां, ओहदे और प्रमोशन सब अपनी झोली में समेट लेते हैं।
समझदार होने का सबसे बड़ा संताप यह है कि बुद्धिमान आदमी हमेशा सही होने के तनाव में घुटता रहता है। उसे नतीजों का खौफ होता है, तर्कों के टूटने का मलाल होता है, और वह जिंदगी भर 'कॉज एंड इफेक्ट' के मकड़जाल में उलझकर केवल योजनाएं बनाता रह जाता है।
दूसरी तरफ, एक अव्वल दर्जे का मूर्ख इस मानसिक गुलामी से पूरी तरह आजाद होता है। उसे न किसी फैक्ट-चेक की दरकार होती है, न मर्यादाओं का लिहाज। वह जिस रसूख और अधिकार के साथ गलत बात को सही ठहराता है, सामने खड़ा तीस मार खां भी एक पल के लिए अपनी ही अक्ल पर शक करने लगता है। कॉरपोरेट के बोर्डरूम से लेकर सियासत के मंचों तक, तरक्की का असली राज यही है कि आपकी अज्ञानता में कोई झिझक, कोई संकोच न दिखे।
दुनिया भर के वैज्ञानिक पिछले कई दशकों से इस जुगत में अपनी दाढ़ी सफेद कर रहे हैं कि मशीनों को इतना अक्लमंद बना दिया जाए कि वे इंसानी सभ्यता की बागडोर अपने हाथ में ले लें। खरबों डॉलर का निवेश पानी की तरह बहाया गया, सुपरकंप्यूटरों के सर्वर रूम दिन-रात हुंकार भरते रहे, और नतीजा क्या निकला? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)यानी एक ऐसा नफीस, सधा हुआ मुंशी, जो हर सवाल का नपा-तुला, तार्किक और बेहद उबाऊ जवाब देता है।
लेकिन इन वैज्ञानिकों की सारी रिसर्च उस मोड़ पर आकर हांफने लगती है, जहां इंसानी फितरत का असली खेल शुरू होता है। वे यह बुनियादी बात भूल गए कि दुनिया को कभी अक्ल के तराजू पर तौला ही नहीं गया। अगर इतिहास और वर्तमान के पन्नों को निष्पक्ष होकर पलटें, तो यह साफ दिखता है कि व्यवस्था को अक्ल के पुतलों ने नहीं, बल्कि अगाध, निश्छल और परम आत्मविश्वास से लबरेज मूर्खों ने चलाया है। बुद्धिमान आदमी तो जोखिम के गुणा-भाग में ही अपनी जिंदगी की बैलेंस शीट बिगाड़ बैठता है, जबकि एक सच्चा मूर्ख बिना किसी डेटा और लॉजिक के सीधे मैदान में कूदकर झंडे गाड़ देता है।
अल्बर्ट आइंस्टीन ने बहुत सोच-समझकर कहा था कि दो चीजें अनंत हैं, एक ब्रह्मांड और दूसरी मानव की मूर्खता; और ब्रह्मांड के बारे में वे तब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे।
आइंस्टीन तो e =mc² जैसे फिजिक्स के फार्मूले सुलझाकर चले गए, मगर उनका यह सामाजिक सिद्धांत आज के डिजिटल दौर में सौ फीसदी खरा उतर रहा है। एआई, चाहे जितने खरबों पैरामीटर्स चाट ले, वह सिर्फ पुराने इंसानी डेटा और पैटर्न्स की जुगाली कर सकता है। उसके पास नया रचने के नाम पर सिर्फ गणितीय संभावनाओं का खेल है।
इसके उलट, हमारी ‘नेचुरल स्टुपिडिटी’ किसी एल्गोरिद्म या लॉजिक मॉडल की मोहताज नहीं है। उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी अनप्रेडिक्टिबिलिटी है। वह बिना किसी ट्रेनिंग डेटा के, बिल्कुल अप्रत्याशित और शत-प्रतिशत ओरिजिनल नमूने पेश करने की असीमित कुव्वत रखती है। एआई में तकनीकी खामी आ जाए तो उसे 'हैलुसिनेशन' कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है, मगर इंसान जिस बेपरवाह मौलिकता और सीनाजोरी के साथ रोज नए गुल खिलाता है, उस रचनात्मकता का कॉपीराइट कुदरत ने हमेशा के लिए इंसान के नाम ही सुरक्षित कर रखा है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता कभी उस ऊंचाई को छू ही नहीं सकती, क्योंकि वह गलतियां करने से कतराती है। वह तो डेटा के तयशुदा दायरे में रेंगने वाला कीड़ा है, जबकि इंसानी मूर्खता पूरी तरह जैविक और आउट-ऑफ-द-बॉक्स होती है। कोई सुपरकंप्यूटर यह हिसाब लगा ही नहीं सकता कि इंसान कब, कहां और किस बात पर पूरी व्यवस्था को धता बता देगा। इस विशुद्ध इंसानी हुनर का पेटेंट कोई मशीन सपने में भी नहीं छीन सकती।
इसलिए जमाने के साथ कदमताल करना है और सफलता की सीढ़ियां तेजी से लांघनी हैं, तो होशियारी की यह पुरानी, बदरंग चादर उतार फेंकिए। समझदारी सिर्फ सिरदर्द, एंग्जायटी और फाइलों के अंबार देती है; जबकि विशुद्ध, मौलिक मूर्खता परम शांति, परम आनंद और निर्विवाद प्रभुत्व की गारंटी है। अक्ल के पीछे भागना छोड़िए, क्योंकि जहां समझदारी की सीमाएं दम तोड़ती हैं, वहीं से असली इंसानी हुकूमत का दौर शुरू होता है।
©️मनोज जोशी - 9977008211