प्रस्तुत है एक स्वरचित कविता
हाशिये के लोग
हाशिये के लोग
सुबह घर से निकलते हैं
तो साथ होती है बच्चों की फीस,
घर का किराया, बिजली का बिल,
दवा का खर्च
और महीने के अंत तक
कुछ बचा लेने की चिंता।
कोई नौकरी बचाने में लगा है,
कोई पाने में;
कोई दुकान चला रहा है,
कोई खेत बचा रहा है
और कोई बच्चों का भविष्य।
छोटी-छोटी जरूरतों के बीच
बड़े सपनों को
किसी तरह जिंदा रखते हैं।
यही लोग
घर, बाजार और देश चलाते हैं,
लेकिन
हाशिये पर खड़े रहते हैं।
हाशिये के लोग
पहले जुलूसों में चलते थे,
अब ट्रेंड के साथ चलते हैं।
दौर बदल गया है।
पहले तख्तियां थीं,
अब मोबाइल हैं।
पहले नारे थे,
अब हैशटैग हैं।
पहले भाषण सुने जाते थे,
अब वीडियो देखे जाते हैं।
हाशिये के लोग
पहले भी भीड़ थे,
अब भी हैं।
फर्क इतना है
कि पहले भीड़
सड़कों पर दिखती थी,
अब स्क्रीन पर दिखाई देती है।
कुछ लोग उनके लिए
कंटेंट गढ़ते हैं
एक तस्वीर,
एक बयान,
वीडियो का एक टुकड़ा
और थोड़ा-सा गुस्सा।
इतना ही काफी है
एक धारणा बनाने के लिए।
फिर हाशिये के लोग
उसी धारणा को
सच मानकर
एक-दूसरे से लड़ते हैं,
मुंह फुलाते हैं,
रिश्ते खराब कर लेते हैं।
हाशिये के लोग
किसी के व्यू बढ़ाते हैं,
किसी के फॉलोअर
और किसी की कमाई।
हाशिये के लोग
अपना पेट नहीं भर पाते,
लेकिन सोशल मीडिया की
इस भड़ास से
उसकी दुकान चलाते हैं,
जिसने उन्हें
अधूरा सच दिखाया है।
जुलूस अब भी निकलते हैं,
लेकिन उनमें शामिल होने वाले
अक्सर “बेचारे” होते हैं।
ये बेचारे
तख्तियां लिए नारे लगाते हैं
और उसकी कीमत ले लेते हैं।
फिर चुनाव आता है।
“बेचारों” को लुभाया जाता है
सरकारी योजनाओं से,
“ईनाम” से,
“पेय पदार्थ” से।
और
हाशिये के लोग
कतार में खड़े होते हैं।
उंगली पर स्याही लगती है
और उन्हें याद दिलाया जाता है
कि लोकतंत्र में
सरकार वे बनाते हैं
और गिराते हैं।
हाशिये के लोग
इसी गुमान में जीते रहते हैं।
हाशिये के लोग
खुद बदलाव नहीं करते,
इंतजार करते हैं नायक का।
कभी एक को
सत्ता पर बैठाते हैं,
तो कभी दूसरे को।
और खुद
वहीं रहते हैं
हाशिये पर।
संविधान के पहले शब्द भी
उन्हीं से शुरू होते हैं
“हम भारत के लोग...”
यही सबसे बड़ा दुख है।
जिस व्यवस्था को
हम कोसते हैं,
उसे हमने ही चुना है।
जिस समाज को
बदलना चाहते हैं,
वह भी हमसे ही बना है।
इसलिए बदलाव
सिर्फ सत्ता बदलने से नहीं आएगा।
समाज बदलेगा,
तभी व्यवस्था बदलेगी।
और समाज कोई दूसरा नहीं
हम हैं।
हाशिये के लोग
कमजोर नहीं हैं।
वे सबसे अधिक हैं।
वे सिर्फ संख्या नहीं,
इस देश की शक्ति हैं।
बस उन्हें
अपनी संख्या से अधिक
अपनी जिम्मेदारी का
अहसास होना बाकी है।
शायद उसी दिन
हाशिये का आदमी
हाशिये से बाहर आएगा।
और व्यवस्था बदलने के लिए
किसी और का इंतजार
नहीं करना पड़ेगा।
©️मनोज जोशी
19.09.2026
9977008211

