Sunday, September 20, 2026

सफलता का नया फॉर्मूला: बुद्धिमत्ता कृत्रिम, मूर्खता मौलिक

 सफलता का नया फॉर्मूला: बुद्धिमत्ता कृत्रिम, मूर्खता मौलिक


जब कोई अफसर बरसों से अटकी पड़ी फाइल को बिना खोले सिर्फ इसलिए नए सिरे से जांच के लिए लौटा दे क्योंकि उस पर लगे 'यू-पिन' का रंग फाइल कवर से मैच नहीं कर रहा था, तो यह वह प्रशासनिक मौलिकता है जिसे समझने में सिलिकॉन वैली का कोई भी डेटा मॉडल जिंदगी भर चकराता रहेगा। यही वह बिंदु है जहां समझदारी की सीमाएं दम तोड़ती हैं और सफलता का असली खेल शुरू होता है।

 इस देश में तरक्की फाइलों के सही अध्ययन से नहीं, बल्कि ऐसे ही हैरतअंगेज और बेतुके फैसलों को पूरे अधिकार के साथ थोपने से मिलती है। अक्ल का बोझ ढोने वाला जिंदगी भर ड्राफ्ट सुधारता रह जाता है, जबकि अगाध और आत्मविश्वास से लबरेज मूर्खता के दम पर लोग कुर्सियां, ओहदे और प्रमोशन सब अपनी झोली में समेट लेते हैं।

समझदार होने का सबसे बड़ा संताप यह है कि बुद्धिमान आदमी हमेशा सही होने के तनाव में घुटता रहता है। उसे नतीजों का खौफ होता है, तर्कों के टूटने का मलाल होता है, और वह जिंदगी भर 'कॉज एंड इफेक्ट' के मकड़जाल में उलझकर केवल योजनाएं बनाता रह जाता है।

दूसरी तरफ, एक अव्वल दर्जे का मूर्ख इस मानसिक गुलामी से पूरी तरह आजाद होता है। उसे न किसी फैक्ट-चेक की दरकार होती है, न मर्यादाओं का लिहाज। वह जिस रसूख और अधिकार के साथ गलत बात को सही ठहराता है, सामने खड़ा तीस मार खां भी एक पल के लिए अपनी ही अक्ल पर शक करने लगता है। कॉरपोरेट के बोर्डरूम से लेकर सियासत के मंचों तक, तरक्की का असली राज यही है कि आपकी अज्ञानता में कोई झिझक, कोई संकोच न दिखे।

दुनिया भर के वैज्ञानिक पिछले कई दशकों से इस जुगत में अपनी दाढ़ी सफेद कर रहे हैं कि मशीनों को इतना अक्लमंद बना दिया जाए कि वे इंसानी सभ्यता की बागडोर अपने हाथ में ले लें। खरबों डॉलर का निवेश पानी की तरह बहाया गया, सुपरकंप्यूटरों के सर्वर रूम दिन-रात हुंकार भरते रहे, और नतीजा क्या निकला? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)यानी एक ऐसा नफीस, सधा हुआ मुंशी, जो हर सवाल का नपा-तुला, तार्किक और बेहद उबाऊ जवाब देता है।

लेकिन इन वैज्ञानिकों की सारी रिसर्च उस मोड़ पर आकर हांफने लगती है, जहां इंसानी फितरत का असली खेल शुरू होता है। वे यह बुनियादी बात भूल गए कि दुनिया को कभी अक्ल के तराजू पर तौला ही नहीं गया। अगर इतिहास और वर्तमान के पन्नों को निष्पक्ष होकर पलटें, तो यह साफ दिखता है कि व्यवस्था को अक्ल के पुतलों ने नहीं, बल्कि अगाध, निश्छल और परम आत्मविश्वास से लबरेज मूर्खों ने चलाया है। बुद्धिमान आदमी तो जोखिम के गुणा-भाग में ही अपनी जिंदगी की बैलेंस शीट बिगाड़ बैठता है, जबकि एक सच्चा मूर्ख बिना किसी डेटा और लॉजिक के सीधे मैदान में कूदकर झंडे गाड़ देता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने बहुत सोच-समझकर कहा था कि दो चीजें अनंत हैं, एक ब्रह्मांड और दूसरी मानव की मूर्खता; और ब्रह्मांड के बारे में वे तब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। 

आइंस्टीन तो e =mc² जैसे फिजिक्स के फार्मूले सुलझाकर चले गए, मगर उनका यह सामाजिक सिद्धांत आज के डिजिटल दौर में सौ फीसदी खरा उतर रहा है। एआई, चाहे जितने खरबों पैरामीटर्स चाट ले, वह सिर्फ पुराने इंसानी डेटा और पैटर्न्स की जुगाली कर सकता है। उसके पास नया रचने के नाम पर सिर्फ गणितीय संभावनाओं का खेल है।

इसके उलट, हमारी ‘नेचुरल स्टुपिडिटी’ किसी एल्गोरिद्म या लॉजिक मॉडल की मोहताज नहीं है। उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी अनप्रेडिक्टिबिलिटी है। वह बिना किसी ट्रेनिंग डेटा के, बिल्कुल अप्रत्याशित और शत-प्रतिशत ओरिजिनल नमूने पेश करने की असीमित कुव्वत रखती है। एआई में तकनीकी खामी आ जाए तो उसे 'हैलुसिनेशन' कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है, मगर इंसान जिस बेपरवाह मौलिकता और सीनाजोरी के साथ रोज नए गुल खिलाता है, उस रचनात्मकता का कॉपीराइट कुदरत ने हमेशा के लिए इंसान के नाम ही सुरक्षित कर रखा है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता कभी उस ऊंचाई को छू ही नहीं सकती, क्योंकि वह गलतियां करने से कतराती है। वह तो डेटा के तयशुदा दायरे में रेंगने वाला कीड़ा है, जबकि इंसानी मूर्खता पूरी तरह जैविक और आउट-ऑफ-द-बॉक्स होती है। कोई सुपरकंप्यूटर यह हिसाब लगा ही नहीं सकता कि इंसान कब, कहां और किस बात पर पूरी व्यवस्था को धता बता देगा। इस विशुद्ध इंसानी हुनर का पेटेंट कोई मशीन सपने में भी नहीं छीन सकती।

इसलिए जमाने के साथ कदमताल करना है और सफलता की सीढ़ियां तेजी से लांघनी हैं, तो होशियारी की यह पुरानी, बदरंग चादर उतार फेंकिए। समझदारी सिर्फ सिरदर्द, एंग्जायटी और फाइलों के अंबार देती है; जबकि विशुद्ध, मौलिक मूर्खता परम शांति, परम आनंद और निर्विवाद प्रभुत्व की गारंटी है। अक्ल के पीछे भागना छोड़िए, क्योंकि जहां समझदारी की सीमाएं दम तोड़ती हैं, वहीं से असली इंसानी हुकूमत का दौर शुरू होता है।

©️मनोज जोशी - 9977008211

Saturday, September 19, 2026

हाशिये के लोग

 प्रस्तुत है एक स्वरचित कविता 


हाशिये के लोग


हाशिये के लोग

सुबह घर से निकलते हैं

तो साथ होती है बच्चों की फीस,

घर का किराया, बिजली का बिल,

दवा का खर्च

और महीने के अंत तक

कुछ बचा लेने की चिंता।

कोई नौकरी बचाने में लगा है,

कोई पाने में;

कोई दुकान चला रहा है,

कोई खेत बचा रहा है

और कोई बच्चों का भविष्य।

छोटी-छोटी जरूरतों के बीच

बड़े सपनों को

किसी तरह जिंदा रखते हैं।

यही लोग

घर, बाजार और देश चलाते हैं,

लेकिन

हाशिये पर खड़े रहते हैं।

हाशिये के लोग

पहले जुलूसों में चलते थे,

अब ट्रेंड के साथ चलते हैं।

दौर बदल गया है।

पहले तख्तियां थीं,

अब मोबाइल हैं।

पहले नारे थे,

अब हैशटैग हैं।

पहले भाषण सुने जाते थे,

अब वीडियो देखे जाते हैं।

हाशिये के लोग

पहले भी भीड़ थे,

अब भी हैं।

फर्क इतना है

कि पहले भीड़

सड़कों पर दिखती थी,

अब स्क्रीन पर दिखाई देती है।

कुछ लोग उनके लिए

कंटेंट गढ़ते हैं

एक तस्वीर,

एक बयान,

वीडियो का एक टुकड़ा

और थोड़ा-सा गुस्सा।

इतना ही काफी है

एक धारणा बनाने के लिए।

फिर हाशिये के लोग

उसी धारणा को

सच मानकर

एक-दूसरे से लड़ते हैं,

मुंह फुलाते हैं,

रिश्ते खराब कर लेते हैं।

हाशिये के लोग

किसी के व्यू बढ़ाते हैं,

किसी के फॉलोअर

और किसी की कमाई।

हाशिये के लोग

अपना पेट नहीं भर पाते,

लेकिन सोशल मीडिया की

इस भड़ास से

उसकी दुकान चलाते हैं,

जिसने उन्हें

अधूरा सच दिखाया है।

जुलूस अब भी निकलते हैं,

लेकिन उनमें शामिल होने वाले

अक्सर “बेचारे” होते हैं।

ये बेचारे

तख्तियां लिए नारे लगाते हैं

और उसकी कीमत ले लेते हैं।

फिर चुनाव आता है।

“बेचारों” को लुभाया जाता है

सरकारी योजनाओं से,

“ईनाम” से,

“पेय पदार्थ” से।

और

हाशिये के लोग

कतार में खड़े होते हैं।

उंगली पर स्याही लगती है

और उन्हें याद दिलाया जाता है

कि लोकतंत्र में

सरकार वे बनाते हैं

और गिराते हैं।

हाशिये के लोग

इसी गुमान में जीते रहते हैं।

हाशिये के लोग

खुद बदलाव नहीं करते,

इंतजार करते हैं नायक का।

कभी एक को

सत्ता पर बैठाते हैं,

तो कभी दूसरे को।

और खुद

वहीं रहते हैं

हाशिये पर।

संविधान के पहले शब्द भी

उन्हीं से शुरू होते हैं

“हम भारत के लोग...”

यही सबसे बड़ा दुख है।

जिस व्यवस्था को

हम कोसते हैं,

उसे हमने ही चुना है।

जिस समाज को

बदलना चाहते हैं,

वह भी हमसे ही बना है।

इसलिए बदलाव

सिर्फ सत्ता बदलने से नहीं आएगा।

समाज बदलेगा,

तभी व्यवस्था बदलेगी।

और समाज कोई दूसरा नहीं

हम हैं।

हाशिये के लोग

कमजोर नहीं हैं।

वे सबसे अधिक हैं।

वे सिर्फ संख्या नहीं,

इस देश की शक्ति हैं।

बस उन्हें

अपनी संख्या से अधिक

अपनी जिम्मेदारी का

अहसास होना बाकी है।

शायद उसी दिन

हाशिये का आदमी

हाशिये से बाहर आएगा।

और व्यवस्था बदलने के लिए

किसी और का इंतजार

नहीं करना पड़ेगा।


©️मनोज जोशी

19.09.2026

9977008211

Monday, August 31, 2026

संघ का सुंदर चेहरा और स्वयंसेवक होने का भ्रम

 संघ का सुंदर चेहरा और स्वयंसेवक होने का भ्रम


मनोज जोशी 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन से जो कहा, वह केवल वहां उपस्थित भारतीय समुदाय के लिए दिया गया भाषण नहीं था। वह दुनिया के सामने हिंदु जीवन-दृष्टि और संघ के वास्तविक हिंदुत्व की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी।

मेरे लिए तो इस कार्यक्रम में गर्व करने लायक एक और बात है कि अभाविप में मेरे वरिष्ठ पदाधिकारी रहे वैज्ञानिक डॉ. सुदेश अग्रवाल इस कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका में थे। पिछले दिनों एक पारिवारिक आयोजन में उनसे मुलाकात में इस कार्यक्रम की कार्ययोजना और उद्देश्य के बारे में सामान्य बातचीत भी हुई थी।


29 अगस्त को ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। सत्य एक है, उसकी अभिव्यक्ति के मार्ग अनेक हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई हिंदु यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं रहने चाहिए तो वह हिंदु नहीं रह जाता। हिंदु होने के लिए यह मानना आवश्यक है कि सभी मार्ग उसी सत्य की ओर जाते हैं और प्रत्येक मनुष्य की अपनी गरिमा है।

यह बात संघ के लिए नई नहीं है। संघ के हिंदुत्व में पूजा पद्धति कभी राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं रही। उसका मूल भाव उस भारतीय दर्शन में है, जो कहता है -

“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।”

अर्थात सत्य एक है, विद्वान उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।

डॉ. भागवत देश में अनेक अवसरों पर बता चुके हैं कि हिंदु होना किसी के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि सबको अपना मानने की साधना है। हिंदुत्व किसी समुदाय को मिटाने की घोषणा नहीं, संपूर्ण सृष्टि में एकत्व देखने की दृष्टि है। 

अर्चना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक “हिंदुत्व और गाँधी” में भी हिंदुत्व की यही परिभाषा लिखी गई है। न्यूयॉर्क से उन्होंने इसी विचार को संसार के सामने रखा कि संघ की दृष्टि पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने की है।

लेकिन इस संदेश को दुनिया से पहले भारत में उन लोगों को ध्यान से सुनना चाहिए, जो पिछले कुछ वर्षों में अचानक स्वयंभू स्वयंसेवक बन गए हैं।

इनमें से अनेक लोग कभी शाखा नहीं गए। आज भी नहीं जाते। और न ही संघ प्रेरित संगठनों से जुड़े हैं।संघ की प्रार्थना की दो पंक्तियां ठीक से नहीं गा सकते। गुरु पूर्णिमा पर संघ को एक रुपया गुरु दक्षिणा नहीं देते। संघ के सेवा, संयम, समरसता और अनुशासन से उनका कोई संबंध नहीं है। फिर भी सत्ता के निकट होने, पद पाने अथवा अपनी राजनीतिक पहचान चमकाने के लिए स्वयं को “बाल्यकाल से स्वयंसेवक” बताते हुए उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता।

उनकी कथनी और करनी का संघ की सीख से कोई मेल नहीं है। वे दिनभर मुसलमानों को गालियां देते हैं, मुस्लिम मुक्त समाज की बात करते हैं और सोशल मीडिया पर किसी समुदाय, राजनीतिक दल अथवा व्यक्ति विशेष के विरुद्ध विष उगलते रहते हैं। उन्हें लगता है कि हिंदु होने का सबसे बड़ा प्रमाण किसी मुसलमान से घृणा करना है।

डॉ. भागवत का संदेश ऐसे लोगों के लिए एक कसौटी है।

यदि हिंदु होने की पहली शर्त सभी मार्गों का सम्मान और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा को स्वीकार करना है तो घृणा फैलाने वाला व्यक्ति हिंदुत्व का प्रतिनिधि कैसे हो सकता है? यदि संघ का ध्येय समाज को संगठित करना है तो समाज को धर्म और जाति के नाम पर बांटने वाला उसका स्वयंसेवक कैसे कहलाएगा?

स्वयंसेवक होना कोई परिचय-पत्र नहीं, जीवन साधना है। शाखा केवल मैदान में एक घंटे का कार्यक्रम नहीं, व्यक्ति के भीतर अनुशासन, आत्मसंयम, सेवा और समाज के प्रति आत्मीयता उत्पन्न करने की प्रक्रिया है। संघ का गणवेश पहन लेना आसान है, लेकिन संघ को अपने आचरण में उतारना कठिन है।

विडंबना यह है कि संघ के विरोधियों से अधिक नुकसान कई बार वे लोग करते हैं, जो संघ का मुखौटा लगाकर अपने निजी नफरती एजेंडे को उसका विचार बताने लगते हैं। उनके शब्दों से समाज में संघ की वही छवि बनती है, जिसका संघ स्वयं प्रतिपादन नहीं करता। वे न हिंदु धर्म की व्यापकता समझते हैं, न संघ की साधना और न उस भारत को, जिसकी आत्मा विविधता में एकता है।

इसलिए सच्चे हिंदुओं, समर्पित स्वयंसेवकों और स्वयं संघ को ऐसे जबरिया बने स्वयंसेवकों से सतर्क रहना होगा। संघ का नाम किसी को गाली देने का अधिकार-पत्र नहीं है। हिंदुत्व किसी के प्रति घृणा की अनुमति नहीं देता।

डॉ. मोहन भागवत को सुनिए, उनके शब्दों का अर्थ समझिए और उन्हें अपने जीवन में उतारिए। संघ की आड़ में अपने नफरती एजेंडे को संघ का चेहरा मत बनाइए।

संघ का वास्तविक चेहरा घृणा का नहीं, आत्मीयता का है। वह चेहरा सचमुच बहुत सुंदर है।


Monday, August 17, 2026

केवल विषधर नहीं, सृष्टि की धारण-शक्ति भी है नाग

 केवल विषधर नहीं, सृष्टि की धारण-शक्ति भी है नाग

#मनोज_जोशी

नागपंचमी पर विशेष


हमारी बोलचाल में साँप प्रायः भय, विष और छल का प्रतीक बनकर आता है। चाणक्य नीति में दुर्जन की तुलना सर्प से करते हुए कहा गया है

दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।

सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे॥

अर्थात् दुर्जन और सर्प में सर्प बेहतर है, क्योंकि वह किसी अवसर पर ही डसता है, जबकि दुर्जन कदम-कदम पर हानि पहुँचाता है। इस श्लोक में भी ध्यान देने योग्य बात यह है कि सर्प की प्रकृति को मनुष्य की दुर्भावना से अलग रखा गया है। सर्प का दंश उसकी स्वाभाविक सुरक्षा-प्रवृत्ति है, जबकि दुर्जन जान-बूझकर और बार-बार आघात करता है।

लेकिन हिंदु संस्कृति में नाग की पहचान केवल विषधर के रूप में नहीं है। हमारे वेद, पुराण, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता नाग को दैवी शक्ति, सृष्टि की स्थिरता, तप, संरक्षण और प्रकृति-संतुलन से जोड़ते हैं। नागपंचमी इसी व्यापक दृष्टि को समझने का अवसर है।

शुक्ल यजुर्वेद में पृथ्वी, अंतरिक्ष और दिव्य लोकों में स्थित सभी सर्पों को प्रणाम करते हुए कहा गया है

नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु।

ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥

अर्थात् पृथ्वी पर रहने वाले, अंतरिक्ष में विचरण करने वाले और दिव्य लोक में स्थित सभी सर्पों को नमस्कार। यह मंत्र मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक घटक मानता है। जिन जीवों से हमें भय लगता है, उनके अस्तित्व और उनकी भूमिका को भी स्वीकार करना हिंदु चिंतन की विशेषता है।

श्रीमद्भगवद्गीता के विभूति योग में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं

“सर्पाणामस्मि वासुकिः”, अर्थात् सर्पों में मैं वासुकि हूँ। अगले ही श्लोक में वे कहते हैं

“अनन्तश्चास्मि नागानाम्”, अर्थात् नागों में मैं अनन्त हूँ। इस प्रकार नाग को भगवान अपनी विभूतियों में स्थान देते हैं।

वासुकि वही नागराज हैं जिन्हें समुद्र-मंथन में देवताओं और दानवों ने मंथन की रस्सी बनाया। अनन्त या शेषनाग सृष्टि की धारण-शक्ति के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु शेषनाग पर विराजते हैं और भगवान शिव के कंठ में नाग सुशोभित है। यह नाग पर विजय या उसके दमन का चित्र नहीं, बल्कि नियंत्रित शक्ति और सामंजस्य का संकेत है। विष को धारण करने वाले शिव के कंठ में विषधर का स्थान यह बताता है कि प्रचंड शक्ति जब मर्यादा में रहती है, तब वह विनाश नहीं, कल्याण का माध्यम बनती है।

महाभारत के आदिपर्व में शेषनाग का चरित्र और भी अर्थपूर्ण रूप में सामने आता है। वे अपने नाग भाइयों के आचरण से विरक्त होकर कठोर तप करते हैं। ब्रह्मा उनके संयम और तप से प्रसन्न होकर उन्हें पृथ्वी को धारण करने का दायित्व देते हैं। जिसे सामान्य दृष्टि केवल विषधर मानती है, हिंदु परंपरा उसी नाग में पृथ्वी का भार सँभालने वाली धैर्यवान शक्ति देखती है।

महाभारत का आस्तीक प्रसंग नागपंचमी के संदेश को और विस्तार देता है। राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई तो उनके पुत्र जनमेजय ने प्रतिशोध में संपूर्ण नागवंश के विनाश के लिए सर्पसत्र आरंभ कर दिया। तब ऋषि आस्तीक ने यज्ञ रुकवाकर नागों को सामूहिक विनाश से बचाया। यह कथा बताती है कि किसी एक के अपराध का दंड पूरे वंश अथवा पूरी प्रजाति को देना धर्मसम्मत नहीं हो सकता। प्रतिशोध की अग्नि जब समूची सृष्टि के संतुलन को नष्ट करने लगे, तब उसे रोकना ही धर्म है।

नागपंचमी का वास्तविक संदेश इसलिए केवल अनिष्ट से बचने के लिए नाग की पूजा करना नहीं है। यह उस जीव के अस्तित्व को स्वीकार करने का संस्कार है, जिससे मनुष्य स्वाभाविक रूप से भयभीत होता है। प्रकृति में सर्पों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे चूहों और अन्य जीवों की संख्या नियंत्रित कर कृषि तथा पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा करते हैं। उनके समाप्त होने का प्रभाव पूरी खाद्य-शृंखला पर पड़ता है।

इस पर्व पर श्रृद्धा के साथ वैज्ञानिक संवेदनशीलता भी आवश्यक है। नागों को पकड़ना, उनका प्रदर्शन करना अथवा उन्हें जबरन दूध पिलाना पूजा नहीं है। साँप का स्वाभाविक आहार दूध नहीं होता। सच्ची नागपूजा यही है कि उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहने दिया जाए, दिखाई देने पर 

प्रशिक्षित सर्पमित्र या वन विभाग की सहायता ली जाए और भय के कारण उनकी हत्या न की जाए।

हिंदु संस्कृति की विशेषता यही है कि वह प्रकृति की केवल सुंदर और सौम्य शक्तियों को प्रणाम नहीं करती; वह प्रचंड, विषैली और भय उत्पन्न करने वाली शक्तियों में भी दैवी तत्व देखती है। नागपंचमी हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति में जो हमारे अनुकूल नहीं है, वह आवश्यक रूप से अनुपयोगी या नष्ट कर देने योग्य नहीं है।

नाग केवल विषधर नहीं है। वह वासुकि के रूप में ईश्वर की विभूति, अनन्त के रूप में सृष्टि का आधार और आस्तीक की कथा में संरक्षण का अधिकारी भी है। नागपंचमी भय से पूजा का नहीं, भय के पार जाकर सह-अस्तित्व स्वीकार करने का पर्व है।


नमोऽस्तु सर्पेभ्यः।

Sunday, August 9, 2026

लच्छेदार भाषण देकर छवि को निखारने के लिये तालियाँ लेना अलग बात है, नेपथ्य में रहकर दूसरों के लिये कुछ करना अलग बात है।

 लच्छेदार भाषण देकर  छवि को निखारने के लिये तालियाँ  लेना अलग बात है, नेपथ्य में रहकर दूसरों के लिये कुछ करना अलग बात है। 

 - प्रो. राजेन्द्र सिंह 'रज्जु भैया' 

( आज पुण्यतिथि )


रज्जु भैया के इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द है -"नेपथ्य"।

यह केवल मंच के पीछे की जगह नहीं, बल्कि एक कार्य-दृष्टि है। ऐसी दृष्टि, जिसमें व्यक्ति से अधिक महत्व कार्य का होता है और प्रसिद्धि से अधिक महत्व परिणाम का।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति को यदि एक शब्द में समझाना हो, तो वह शायद "नेपथ्य" ही होगा। संघ ने अपने स्वयंसेवकों को कभी स्वयं को स्थापित करने का प्रशिक्षण नहीं दिया, बल्कि समाज को संगठित करने का संस्कार दिया। इसलिए हजारों स्वयंसेवक ऐसे मिलेंगे, जिन्होंने दशकों तक शिक्षा, सेवा, ग्राम विकास, आपदा राहत, सामाजिक समरसता या संगठन के क्षेत्र में काम किया, लेकिन व्यक्तिगत परिचय या प्रचार उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रहा।

संघ की शाखा में स्वयंसेवक को यह नहीं सिखाया जाता कि वह कितना प्रसिद्ध बनेगा; यह सिखाया जाता है कि जहाँ समाज को आवश्यकता हो, वहाँ सबसे पहले और सबसे शांत भाव से खड़ा होना है। इसलिए संघ के अनेक कार्य समाज में दिखाई देते हैं, लेकिन उन्हें करने वाले लोग अक्सर नेपथ्य में ही रहते हैं।

रज्जु भैया स्वयं असाधारण विद्वान थे, सफल भौतिक विज्ञानी थे, प्रभावशाली वक्ता भी थे, लेकिन उन्होंने अपने व्यक्तित्व को कभी केंद्र में नहीं रखा। उनका आग्रह व्यक्ति-पूजा पर नहीं, कार्य और विचार की निरंतरता पर था।

आज जब सार्वजनिक जीवन में दृश्यता को ही सफलता का पर्याय मान लिया गया है, तब रज्जु भैया का यह वाक्य और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह याद दिलाता है कि किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके मंच पर बैठे लोगों में नहीं, बल्कि नेपथ्य में खड़े उन असंख्य कार्यकर्ताओं में होती है, जो बिना किसी अपेक्षा के अपना दायित्व निभाते रहते हैं।

शायद यही कारण है कि संघ ने सदैव व्यक्ति से अधिक विचार और पद से अधिक दायित्व पर बल दिया है। नेपथ्य में रहकर समाज के लिए कार्य करना केवल एक शैली नहीं, बल्कि एक साधना है। और यही साधना रज्जु भैया के व्यक्तित्व और उनके इस वाक्य दोनों का सार है।

 मनोज जोशी

राष्ट्रधर्म अमर रहना चाहिए


 राष्ट्रधर्म अमर रहना चाहिए 

- मनोज जोशी 


मैं रहूँ या काल की धारा मुझे बहा ले जाए,

भारत माता का गौरव अक्षुण्ण रहना चाहिए।

तन मिटे तो मिट जाए इस पावन माटी में,

राष्ट्रधर्म का दीप निरंतर जलना चाहिए।

वेदों की ऋचाएँ गूँजें, गीता का संदेश रहे,

राम का मर्यादा-पथ, कृष्ण का उपदेश रहे।

शंकर का अद्वैत और बुद्ध की करुणा लेकर,

भारत को फिर विश्वगुरु बनना चाहिए।

गंगा निर्मल बहे, हिमालय अडिग खड़ा रहे,

हर वन, नदी और जीव के प्रति श्रद्धा रहे।

इस धरती के कण-कण में ईश्वर का वास मानकर,

प्रकृति का संरक्षण भी पूजा बनना चाहिए।

भगवा केवल रंग नहीं, त्याग और तप की ज्वाला है,

यह ऋषियों के ज्ञान और वीरों की वरमाला है।

धर्म विजय का घोष नहीं, सबके मंगल की कामना है,

विश्व के कल्याण का संकल्प जगना चाहिए।

जाति-पंथ की दीवारें भारत को बाँट न पाएँ,

हम अपने पुरखों और माटी को न भूल जाएँ।

भाषाएँ और वेश अनेक, पर राष्ट्रभाव हो एक,

हर हृदय में भारत का स्पंदन होना चाहिए।

घर-घर संस्कार जगें, मातृशक्ति का मान रहे,

शास्त्र का विवेक और शस्त्र का स्वाभिमान रहे।

अन्याय के सम्मुख मौन रहना धर्म नहीं होता,

सत्य की रक्षा में निर्भय होकर खड़ा होना चाहिए।

मेरा नाम भले इतिहास के पन्नों में न आए,

मेरी आहुति राष्ट्रयज्ञ की अग्नि बढ़ाती जाए।

मैं रहूँ या न रहूँ, इसकी चिंता मुझको नहीं,

हिंदु संस्कृति और भारत अमर रहना चाहिए

एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक

 एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक 


संस्कृत की सुभाषित परंपरा का एक प्रसिद्ध श्लोक है,

 पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।

शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा पुरुषःपञ्चलक्षणः॥


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने युवाओं से बातचीत में इस सुभाषित का उल्लेख किया।


अगर इसे आज की जिंदगी और मैनेजमेंट की भाषा में समझें, तो मेरी समझ से यह एक तरह से लीडरशिप का पाँच सूत्रीय मॉडल है।


1.पहला सूत्र है - संसाधन सही जगह लगाइए। “पात्रे त्यागी” का मतलब सिर्फ दान देना नहीं है। इसका अर्थ है कि आपका समय, पैसा, ऊर्जा और भरोसा उस व्यक्ति या काम पर लगे, जहां उसका सही उपयोग हो। अच्छे मैनेजर और अच्छे इंसान की पहचान यही है कि वह केवल देता नहीं, बल्कि सही जगह देता है।


2.दूसरा सूत्र - टैलेंट और अच्छाई को पहचानिए। “गुणे रागी” कहता है कि अच्छे गुणों से प्रेम होना चाहिए। किसी टीम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि कौन आपके करीब है, बल्कि यह है कि कौन योग्य है, कौन मेहनती है और कौन बेहतर काम कर रहा है। जो व्यक्ति गुणों की कद्र करता है, उसके आसपास अच्छे लोग अपने-आप जुड़ने लगते हैं।


3.तीसरा सूत्र - सफलता अकेले मत रखिए। “संविभागी च बन्धुषु” का सीधा संदेश है कि उपलब्धि, अवसर और श्रेय साझा कीजिए। किसी भी टीम में भरोसा तब बनता है, जब नेता सफलता का श्रेय बाँटता है और मुश्किल समय की जिम्मेदारी खुद भी लेता है।


4.चौथा सूत्र - जानकारी नहीं, समझ विकसित कीजिए। “शास्त्रे बोद्धा” का अर्थ है विषय को समझना। आज हमारे पास जानकारी की कमी नहीं है। फर्क इस बात से पड़ता है कि कौन उस जानकारी का सही अर्थ निकालता है, सही निर्णय लेता है और उसे काम में बदलता है। यही ज्ञान और सिर्फ सूचना के बीच का अंतर है।


5.पाँचवां सूत्र - संकट में नेतृत्व दिखाइए। “रणे योद्धा” का अर्थ केवल युद्ध नहीं है। जीवन और कामकाज में असली रण वह समय है जब परिस्थितियां आपके पक्ष में न हों। दबाव हो, असफलता सामने हो या कठिन फैसला लेना पड़े। अच्छे समय में सब नेतृत्व कर सकते हैं, लेकिन लीडर की असली पहचान संकट के समय होती है।


यही इस श्लोक की आधुनिक उपयोगिता है। सही जगह निवेश, प्रतिभा की पहचान, सफलता की साझेदारी, गहरी समझ और संकट में साहस -ये पाँच गुण किसी व्यक्ति को केवल सफल नहीं, बल्कि प्रभावी लीडर बनाते हैं।