Monday, August 17, 2026

केवल विषधर नहीं, सृष्टि की धारण-शक्ति भी है नाग

 केवल विषधर नहीं, सृष्टि की धारण-शक्ति भी है नाग

#मनोज_जोशी

नागपंचमी पर विशेष


हमारी बोलचाल में साँप प्रायः भय, विष और छल का प्रतीक बनकर आता है। चाणक्य नीति में दुर्जन की तुलना सर्प से करते हुए कहा गया है

दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।

सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे॥

अर्थात् दुर्जन और सर्प में सर्प बेहतर है, क्योंकि वह किसी अवसर पर ही डसता है, जबकि दुर्जन कदम-कदम पर हानि पहुँचाता है। इस श्लोक में भी ध्यान देने योग्य बात यह है कि सर्प की प्रकृति को मनुष्य की दुर्भावना से अलग रखा गया है। सर्प का दंश उसकी स्वाभाविक सुरक्षा-प्रवृत्ति है, जबकि दुर्जन जान-बूझकर और बार-बार आघात करता है।

लेकिन हिंदु संस्कृति में नाग की पहचान केवल विषधर के रूप में नहीं है। हमारे वेद, पुराण, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता नाग को दैवी शक्ति, सृष्टि की स्थिरता, तप, संरक्षण और प्रकृति-संतुलन से जोड़ते हैं। नागपंचमी इसी व्यापक दृष्टि को समझने का अवसर है।

शुक्ल यजुर्वेद में पृथ्वी, अंतरिक्ष और दिव्य लोकों में स्थित सभी सर्पों को प्रणाम करते हुए कहा गया है

नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु।

ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥

अर्थात् पृथ्वी पर रहने वाले, अंतरिक्ष में विचरण करने वाले और दिव्य लोक में स्थित सभी सर्पों को नमस्कार। यह मंत्र मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक घटक मानता है। जिन जीवों से हमें भय लगता है, उनके अस्तित्व और उनकी भूमिका को भी स्वीकार करना हिंदु चिंतन की विशेषता है।

श्रीमद्भगवद्गीता के विभूति योग में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं

“सर्पाणामस्मि वासुकिः”, अर्थात् सर्पों में मैं वासुकि हूँ। अगले ही श्लोक में वे कहते हैं

“अनन्तश्चास्मि नागानाम्”, अर्थात् नागों में मैं अनन्त हूँ। इस प्रकार नाग को भगवान अपनी विभूतियों में स्थान देते हैं।

वासुकि वही नागराज हैं जिन्हें समुद्र-मंथन में देवताओं और दानवों ने मंथन की रस्सी बनाया। अनन्त या शेषनाग सृष्टि की धारण-शक्ति के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु शेषनाग पर विराजते हैं और भगवान शिव के कंठ में नाग सुशोभित है। यह नाग पर विजय या उसके दमन का चित्र नहीं, बल्कि नियंत्रित शक्ति और सामंजस्य का संकेत है। विष को धारण करने वाले शिव के कंठ में विषधर का स्थान यह बताता है कि प्रचंड शक्ति जब मर्यादा में रहती है, तब वह विनाश नहीं, कल्याण का माध्यम बनती है।

महाभारत के आदिपर्व में शेषनाग का चरित्र और भी अर्थपूर्ण रूप में सामने आता है। वे अपने नाग भाइयों के आचरण से विरक्त होकर कठोर तप करते हैं। ब्रह्मा उनके संयम और तप से प्रसन्न होकर उन्हें पृथ्वी को धारण करने का दायित्व देते हैं। जिसे सामान्य दृष्टि केवल विषधर मानती है, हिंदु परंपरा उसी नाग में पृथ्वी का भार सँभालने वाली धैर्यवान शक्ति देखती है।

महाभारत का आस्तीक प्रसंग नागपंचमी के संदेश को और विस्तार देता है। राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई तो उनके पुत्र जनमेजय ने प्रतिशोध में संपूर्ण नागवंश के विनाश के लिए सर्पसत्र आरंभ कर दिया। तब ऋषि आस्तीक ने यज्ञ रुकवाकर नागों को सामूहिक विनाश से बचाया। यह कथा बताती है कि किसी एक के अपराध का दंड पूरे वंश अथवा पूरी प्रजाति को देना धर्मसम्मत नहीं हो सकता। प्रतिशोध की अग्नि जब समूची सृष्टि के संतुलन को नष्ट करने लगे, तब उसे रोकना ही धर्म है।

नागपंचमी का वास्तविक संदेश इसलिए केवल अनिष्ट से बचने के लिए नाग की पूजा करना नहीं है। यह उस जीव के अस्तित्व को स्वीकार करने का संस्कार है, जिससे मनुष्य स्वाभाविक रूप से भयभीत होता है। प्रकृति में सर्पों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे चूहों और अन्य जीवों की संख्या नियंत्रित कर कृषि तथा पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा करते हैं। उनके समाप्त होने का प्रभाव पूरी खाद्य-शृंखला पर पड़ता है।

इस पर्व पर श्रृद्धा के साथ वैज्ञानिक संवेदनशीलता भी आवश्यक है। नागों को पकड़ना, उनका प्रदर्शन करना अथवा उन्हें जबरन दूध पिलाना पूजा नहीं है। साँप का स्वाभाविक आहार दूध नहीं होता। सच्ची नागपूजा यही है कि उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहने दिया जाए, दिखाई देने पर 

प्रशिक्षित सर्पमित्र या वन विभाग की सहायता ली जाए और भय के कारण उनकी हत्या न की जाए।

हिंदु संस्कृति की विशेषता यही है कि वह प्रकृति की केवल सुंदर और सौम्य शक्तियों को प्रणाम नहीं करती; वह प्रचंड, विषैली और भय उत्पन्न करने वाली शक्तियों में भी दैवी तत्व देखती है। नागपंचमी हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति में जो हमारे अनुकूल नहीं है, वह आवश्यक रूप से अनुपयोगी या नष्ट कर देने योग्य नहीं है।

नाग केवल विषधर नहीं है। वह वासुकि के रूप में ईश्वर की विभूति, अनन्त के रूप में सृष्टि का आधार और आस्तीक की कथा में संरक्षण का अधिकारी भी है। नागपंचमी भय से पूजा का नहीं, भय के पार जाकर सह-अस्तित्व स्वीकार करने का पर्व है।


नमोऽस्तु सर्पेभ्यः।

Sunday, August 9, 2026

लच्छेदार भाषण देकर छवि को निखारने के लिये तालियाँ लेना अलग बात है, नेपथ्य में रहकर दूसरों के लिये कुछ करना अलग बात है।

 लच्छेदार भाषण देकर  छवि को निखारने के लिये तालियाँ  लेना अलग बात है, नेपथ्य में रहकर दूसरों के लिये कुछ करना अलग बात है। 

 - प्रो. राजेन्द्र सिंह 'रज्जु भैया' 

( आज पुण्यतिथि )


रज्जु भैया के इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द है -"नेपथ्य"।

यह केवल मंच के पीछे की जगह नहीं, बल्कि एक कार्य-दृष्टि है। ऐसी दृष्टि, जिसमें व्यक्ति से अधिक महत्व कार्य का होता है और प्रसिद्धि से अधिक महत्व परिणाम का।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति को यदि एक शब्द में समझाना हो, तो वह शायद "नेपथ्य" ही होगा। संघ ने अपने स्वयंसेवकों को कभी स्वयं को स्थापित करने का प्रशिक्षण नहीं दिया, बल्कि समाज को संगठित करने का संस्कार दिया। इसलिए हजारों स्वयंसेवक ऐसे मिलेंगे, जिन्होंने दशकों तक शिक्षा, सेवा, ग्राम विकास, आपदा राहत, सामाजिक समरसता या संगठन के क्षेत्र में काम किया, लेकिन व्यक्तिगत परिचय या प्रचार उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रहा।

संघ की शाखा में स्वयंसेवक को यह नहीं सिखाया जाता कि वह कितना प्रसिद्ध बनेगा; यह सिखाया जाता है कि जहाँ समाज को आवश्यकता हो, वहाँ सबसे पहले और सबसे शांत भाव से खड़ा होना है। इसलिए संघ के अनेक कार्य समाज में दिखाई देते हैं, लेकिन उन्हें करने वाले लोग अक्सर नेपथ्य में ही रहते हैं।

रज्जु भैया स्वयं असाधारण विद्वान थे, सफल भौतिक विज्ञानी थे, प्रभावशाली वक्ता भी थे, लेकिन उन्होंने अपने व्यक्तित्व को कभी केंद्र में नहीं रखा। उनका आग्रह व्यक्ति-पूजा पर नहीं, कार्य और विचार की निरंतरता पर था।

आज जब सार्वजनिक जीवन में दृश्यता को ही सफलता का पर्याय मान लिया गया है, तब रज्जु भैया का यह वाक्य और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह याद दिलाता है कि किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके मंच पर बैठे लोगों में नहीं, बल्कि नेपथ्य में खड़े उन असंख्य कार्यकर्ताओं में होती है, जो बिना किसी अपेक्षा के अपना दायित्व निभाते रहते हैं।

शायद यही कारण है कि संघ ने सदैव व्यक्ति से अधिक विचार और पद से अधिक दायित्व पर बल दिया है। नेपथ्य में रहकर समाज के लिए कार्य करना केवल एक शैली नहीं, बल्कि एक साधना है। और यही साधना रज्जु भैया के व्यक्तित्व और उनके इस वाक्य दोनों का सार है।

 मनोज जोशी

राष्ट्रधर्म अमर रहना चाहिए


 राष्ट्रधर्म अमर रहना चाहिए 

- मनोज जोशी 


मैं रहूँ या काल की धारा मुझे बहा ले जाए,

भारत माता का गौरव अक्षुण्ण रहना चाहिए।

तन मिटे तो मिट जाए इस पावन माटी में,

राष्ट्रधर्म का दीप निरंतर जलना चाहिए।

वेदों की ऋचाएँ गूँजें, गीता का संदेश रहे,

राम का मर्यादा-पथ, कृष्ण का उपदेश रहे।

शंकर का अद्वैत और बुद्ध की करुणा लेकर,

भारत को फिर विश्वगुरु बनना चाहिए।

गंगा निर्मल बहे, हिमालय अडिग खड़ा रहे,

हर वन, नदी और जीव के प्रति श्रद्धा रहे।

इस धरती के कण-कण में ईश्वर का वास मानकर,

प्रकृति का संरक्षण भी पूजा बनना चाहिए।

भगवा केवल रंग नहीं, त्याग और तप की ज्वाला है,

यह ऋषियों के ज्ञान और वीरों की वरमाला है।

धर्म विजय का घोष नहीं, सबके मंगल की कामना है,

विश्व के कल्याण का संकल्प जगना चाहिए।

जाति-पंथ की दीवारें भारत को बाँट न पाएँ,

हम अपने पुरखों और माटी को न भूल जाएँ।

भाषाएँ और वेश अनेक, पर राष्ट्रभाव हो एक,

हर हृदय में भारत का स्पंदन होना चाहिए।

घर-घर संस्कार जगें, मातृशक्ति का मान रहे,

शास्त्र का विवेक और शस्त्र का स्वाभिमान रहे।

अन्याय के सम्मुख मौन रहना धर्म नहीं होता,

सत्य की रक्षा में निर्भय होकर खड़ा होना चाहिए।

मेरा नाम भले इतिहास के पन्नों में न आए,

मेरी आहुति राष्ट्रयज्ञ की अग्नि बढ़ाती जाए।

मैं रहूँ या न रहूँ, इसकी चिंता मुझको नहीं,

हिंदु संस्कृति और भारत अमर रहना चाहिए

एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक

 एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक 


संस्कृत की सुभाषित परंपरा का एक प्रसिद्ध श्लोक है,

 पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।

शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा पुरुषःपञ्चलक्षणः॥


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने युवाओं से बातचीत में इस सुभाषित का उल्लेख किया।


अगर इसे आज की जिंदगी और मैनेजमेंट की भाषा में समझें, तो मेरी समझ से यह एक तरह से लीडरशिप का पाँच सूत्रीय मॉडल है।


1.पहला सूत्र है - संसाधन सही जगह लगाइए। “पात्रे त्यागी” का मतलब सिर्फ दान देना नहीं है। इसका अर्थ है कि आपका समय, पैसा, ऊर्जा और भरोसा उस व्यक्ति या काम पर लगे, जहां उसका सही उपयोग हो। अच्छे मैनेजर और अच्छे इंसान की पहचान यही है कि वह केवल देता नहीं, बल्कि सही जगह देता है।


2.दूसरा सूत्र - टैलेंट और अच्छाई को पहचानिए। “गुणे रागी” कहता है कि अच्छे गुणों से प्रेम होना चाहिए। किसी टीम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि कौन आपके करीब है, बल्कि यह है कि कौन योग्य है, कौन मेहनती है और कौन बेहतर काम कर रहा है। जो व्यक्ति गुणों की कद्र करता है, उसके आसपास अच्छे लोग अपने-आप जुड़ने लगते हैं।


3.तीसरा सूत्र - सफलता अकेले मत रखिए। “संविभागी च बन्धुषु” का सीधा संदेश है कि उपलब्धि, अवसर और श्रेय साझा कीजिए। किसी भी टीम में भरोसा तब बनता है, जब नेता सफलता का श्रेय बाँटता है और मुश्किल समय की जिम्मेदारी खुद भी लेता है।


4.चौथा सूत्र - जानकारी नहीं, समझ विकसित कीजिए। “शास्त्रे बोद्धा” का अर्थ है विषय को समझना। आज हमारे पास जानकारी की कमी नहीं है। फर्क इस बात से पड़ता है कि कौन उस जानकारी का सही अर्थ निकालता है, सही निर्णय लेता है और उसे काम में बदलता है। यही ज्ञान और सिर्फ सूचना के बीच का अंतर है।


5.पाँचवां सूत्र - संकट में नेतृत्व दिखाइए। “रणे योद्धा” का अर्थ केवल युद्ध नहीं है। जीवन और कामकाज में असली रण वह समय है जब परिस्थितियां आपके पक्ष में न हों। दबाव हो, असफलता सामने हो या कठिन फैसला लेना पड़े। अच्छे समय में सब नेतृत्व कर सकते हैं, लेकिन लीडर की असली पहचान संकट के समय होती है।


यही इस श्लोक की आधुनिक उपयोगिता है। सही जगह निवेश, प्रतिभा की पहचान, सफलता की साझेदारी, गहरी समझ और संकट में साहस -ये पाँच गुण किसी व्यक्ति को केवल सफल नहीं, बल्कि प्रभावी लीडर बनाते हैं।

भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल

 भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल 


 विश्व मूलनिवासी दिवस पर विशेष 


 मनोज जोशी 


आज विश्व मूलनिवासी दिवस है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इस दिवस की अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संदर्भ हैं, लेकिन भारत में इसे समझने की दृष्टि हमारी अपनी होनी चाहिए। भारत में मूलनिवासी कौन है? इसका सबसे सहज उत्तर है, हम सब भारतवासी मूलनिवासी हैं।

भारत की धरती किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय की मातृभूमि नहीं है। यह हम सबकी मातृभूमि है। फिर मूलनिवासी की पहचान को किसी एक समाज तक सीमित करके बाकी भारतीयों को उससे अलग खड़ा करने की आवश्यकता ही क्या है?

भेदभाव का कहाँ सवाल,

हम सब भारत माँ के लाल।

यही इस दिन का भारतीय संदेश होना चाहिए।

हमारे वनवासी समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति है। उनकी भाषा, लोक परंपराएं, पर्व, नृत्य, कला और प्रकृति के साथ जीवन जीने की शैली भारत की अमूल्य धरोहर हैं। इस विशिष्टता का पूरा सम्मान होना चाहिए। उनके संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक हितों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा भी होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए यह मान लेना जरूरी नहीं कि केवल वही इस भूमि के मूलनिवासी हैं और शेष भारतीय कोई दूसरी श्रेणी हैं।

यहीं शब्दों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

औपनिवेशिक शासन ने भारत को समझने और उस पर शासन करने के लिए समाज को अनेक जातीय, नस्ली और सामाजिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया। जनगणना से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक भारतीय समाज को अलग-अलग खांचों में देखने की यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। स्वतंत्र भारत को इस विरासत से आगे बढ़कर अपनी सभ्यतागत दृष्टि से समाज को देखना चाहिए जहां विविधता का सम्मान हो, लेकिन विविधता को विभाजन में न बदला जाए।

भारत को जोड़ने वाली अवधारणा यह नहीं हो सकती कि पहले हम यह तय करें कि कौन ‘मूल’ है और कौन नहीं। 

वन में रहने वाला भी इस धरती का पुत्र है और गांव में रहने वाला भी। पहाड़ों में रहने वाला भी और मैदान में रहने वाला भी। शहर में रहने वाला भी उतना ही भारतवासी है जितना किसी दुर्गम वन क्षेत्र में सदियों से अपनी परंपराओं को सहेजकर रखने वाला परिवार।

स्थान अलग हो सकता है, जीवन-पद्धति अलग हो सकती है, पर मातृभूमि अलग नहीं होती।

यही कारण है कि वनवासी समाज को भारत की मुख्यधारा से अलग किसी समानांतर पहचान के रूप में देखने के बजाय भारतीय सभ्यता के अभिन्न अंग के रूप में देखने की आवश्यकता है। गोंड की परंपरा भी भारत की है, भील की भी, बैगा की भी और संथाल की भी। उसी प्रकार तमिल, मराठी, पंजाबी, असमिया, गुजराती, बंगाली और देश की असंख्य अन्य परंपराएं भी भारत की ही हैं।

हम अलग-अलग धाराएं हैं, लेकिन सभ्यता की नदी एक है।

मूलनिवासी शब्द को यदि अधिकार और सम्मान का प्रतीक बनाया जाए तो वह सकारात्मक है। लेकिन उसी शब्द के आधार पर समाज में यह भाव पैदा होने लगे कि कोई इस भूमि पर अधिक मूल है और कोई कम, तो हमें सावधान होना चाहिए। किसी भी भारतीय की भारतीयता को दूसरे की तुलना में कमतर नहीं माना जा सकता।

वनवासी समाज  हमारा अपना है। उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है। उसका गौरव भारत का गौरव है। उसके जंगल और पहाड़ भारत की धरोहर हैं। उसके लोकगीत, देवी-देवता, नायक और परंपराएं भारत माता के विराट स्वरूप का हिस्सा हैं।

इसीलिए मूलनिवासी दिवस को विभाजन की शब्दावली से निकालकर समरसता के उत्सव में बदलने की आवश्यकता है।

न यह किसी एक समाज का अधिकार कम करता है, न किसी की विशिष्ट पहचान मिटाता है। इसके विपरीत यह कहता है, अपनी पहचान पर गर्व कीजिए, अपनी परंपरा बचाइए, अपनी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाइए; लेकिन सबसे ऊपर उस मातृभूमि को याद रखिए जो हम सभी को एक सूत्र में बांधती है।


 कोई वन में, कोई नगर में, 

 कोई पर्वत, कोई मैदान। 

 बोली-वेश भले हों न्यारे, 

 सबकी माता हिंदुस्तान। 


 और इसलिए 

 किसे मूल और किसे पराया, 

 क्यों खींचें ऐसी दीवार? 

 माटी सबकी, माता सबकी, 

 भारत सबका एक परिवार। 

 भेदभाव का कहाँ सवाल, 

 हम सब भारत माँ के लाल।

Wednesday, April 5, 2023

प्लास्टिक की पन्नी और मन्नत : हिंदु संस्कृति की परंपरा में विकृति



प्लास्टिक की पन्नी और मन्नत : हिंदु संस्कृति की परंपरा में विकृति

#मनोज_जोशी



 


पिछले सप्ताह संयोग से चैत्र शुक्ल अष्टमी पर यानी बुधवार को कर्फ्यू वाली माता के मंदिर में दर्शन के लिए परिवार के साथ पहुंच गया। बिना किसी योजना के ऐसे पहुंचा जैसे स्वयं माता ने बुलाया हो। और यहाँ शेर के पाँव में बड़ी संख्या में पन्नी बंधी हुईं दिखी। याद आया कि कुछ दिन पहले ही Dainik Bhaskar में खबर छपी थी कि मन्नत के लिए यहाँ लोग शेर के पाँव में प्लास्टिक की पन्नी बांध रहे हैं। कलावा और चुनरी बांधना तो सुना था, प्लास्टिक की पन्नी की बात पहली बार सुनी तो अजीब सा लगा। और फिर उस दिन देख लिया तो मन खिन्न हो गया।

आखिर पन्नी बांधने की परंपरा कहाँ से आ गई।

मुझे अपने बचपन की दो घटनाएं याद आ गईं। 

1.घर के पास कालीजी का मंदिर था और उसी में हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित हो गई थी। कई मित्र खास तौर से गणित की परीक्षा वाले दिन हनुमान जी के दर्शन करने जाते और उनसे परीक्षा में पास कराने की प्रार्थना करते। अपने राम को कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई। बाद के वर्षों में उस मंदिर में और शहर के दूसरे हनुमान मंदिरों में चिट्ठियां चिपकने लगीं।

यह चिट्ठी परिणाम को कितना प्रभावित करती है पता नहीं ... लेकिन भक्त और भगवान के रिश्ते में भावनात्मक लगाव इतना होता है कि इस चिट्ठी को आस्था और विश्वास का प्रकटीकरण मानकर स्वीकार कर लिया।

और फिर इसमें कोई बुराई भी नहीं। भक्त अपने ढंग से अपने मन की बात भगवान से कहा रहा है। कई बार तो यह चिट्ठियां बहुत मार्मिक भी होती हैं।


2. यह किस्सा बिल्कुल प्लास्टिक की पन्नी जैसा ही है। घर पर माँ के स्पष्ट निर्देश थे कि भगवान को चीनी के बर्तन में भोग नहीं लगेगा। वो कहती थीं चीनी का बर्तन शुद्ध नहीं है, भगवान उसके भोग को स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन बचपना तो बचपना होता है, जैसा कहा वैसा मान लिया तो काहे के बच्चे। अपने राम ने एक दिन पूजा की और चीनी की प्लेट में भोग लगा दिया। पता नहीं क्या हुआ वह चीनी की प्लेट नीचे गिर कर टूट गई और भोग सामग्री जमीन पर फैल गई। उस घटना से यह बात मन में कहीं बैठ गई कि वाकई चीनी के बर्तन में भगवान भोग स्वीकार नहीं करते।

अब वापस पन्नी वाली बात पर आता हूँ।‌ यह तो हम सब जानते हैं कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए घातक है। और जो पर्यावरण के लिए घातक है उसे ईश्वर कैसे स्वीकार करेंगे ? हम तो हिंदु संस्कृति के वाहक हैं। प्रकृति के हर अंग पेड़ पौधे पशु पक्षी सब में देवताओं का वास मानने वाला हिंदु समाज उस पॉलिथीन को बांध कर मन्नत मांग रहा है जिसके खाने से गौ माता बीमार पड़ रहीं हैं। गौ माता में तो सभी देवताओं का वास हैं। और केवल गौ माता क्यों भगवान विष्णु के दशावतार का ध्यान कीजिए मछली से लेकर मानव तक सब में विष्णु अवतार का अंश मौजूद हैं। 

आखिर इसका आधार क्या है? और दुख का विषय यह है कि यह उस मंदिर में हो रहा है जिसकी स्थापना के लिए हमारी पुरानी पीढ़ी ने संघर्ष किया, कर्फ्यू लगा इसीलिए तो कर्फ्यू वाली माता का मंदिर नाम प्रचलित हुआ।

और मंदिर की स्थापना क्यों होती है ? संस्कृति की रक्षा के लिए ही ना ? फिर यह पन्नी बांध कर क्या हम रक्षा कर रहे हैं? इस पर विचार नितांत आवश्यक है।

हिंदु religion नहीं संस्कृति है, जीवनशैली है। यह परिवर्तनशील है इसीलिए युगों तक अक्षुण्ण है। इसकी अक्षुण्णता को बनाए रखने के लिए विकृतियों को भी रोकना होगा।


एक गीत जिसने १९८० के दशक के अंतिम वर्षों में मुझे प्रेरणा दी उसके बोल थे

"रुढ़ियों को तोड़ दो, परंपराएं मोड़ दो

जिसमें देश का भला न हो

वो हर काम छोड़ दो"

मुझे लगता है इसमें एक बात और जोड़ना पड़ेगी

"विकृतियों को रोक दो"

Monday, February 6, 2023

‘परंम् वैभवम नेतुमेतत्वस्वराष्ट्रं’

‘परंम् वैभवम नेतुमेतत्वस्वराष्ट्रं’


यानी राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाना है. अगर आप मुझसे पूछें कि यह कैसे होगा? तो मेरा स्पष्ट मत यह है कि जाति व्यवस्था को समाप्त करना होगा और इसकी शुरुआत जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करके होगी।

एक ही मंदिर, एक जलाशय, सबका एक श्मशान हो। जब तक यह एकता नहीं आएगी। जाति के आधार पर श्रेष्ठता और निम्नता के भाव जब तक समाप्त नहीं होंगे, हम परम वैभव के लक्ष्य को नहीं पा सकते। हमारे सांस्कृतिक इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं जो साबित करते हैं कि प्राचीन वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी, जन्म आधारित नहीं। बाद में यह जन्म आधारित जाति व्यवस्था में बदल गई।

अक्तूबर, 2003 में नागपुर में अपने विजयादशमी उद्बोधन में संघ के पांचवें सरसंघचालक सुदर्शन जी ने कथित दलित समस्या पर कहा, 'अपने ही समाज के एक वर्ग को दलित जैसे घृणित शब्द से संबोधित करना कहां तक उचित है? वास्तव में जो लोग विकास के निम्न स्तर पर हैं उनमें ऊपर उठने का आत्मविश्वास जगाना पहली आवश्यकता है। हमारी सोच यह है कि यह कार्य समाज को स्वयं करना होता है और यह कार्य तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित नेता लोग नहीं कर सकते। इस कार्य को सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व को अपने हाथ में लेना चाहिए।'

संघ के चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया एक जगह लिखते हैं -'इस देश का हिन्दू समाज हजारों वर्षों तक समृद्धि एवं वैभव का जीवन जीने के बाद ईसा की नवमी और दशमी शताब्दियों में ऐसी रुढ़िग्रस्त अवस्था में पहुंच गया जहां गुण-कर्म पर आधारित वर्ण एवं जाति व्यवस्था को ऊंच-नीच का पर्याय मानकर हमारे ही लोगों ने राष्ट्र के उत्थान में बाधाएं खड़ी कर दीं। परिणामत: हिन्दू समाज अनेक प्रकार से विभक्त हो गया और राष्ट्र को निरंतर आठ सौ वर्षों तक परकीयों की दासता सहनी पड़ी।'

संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस का तो यह वाक्य प्रसिद्ध है - "यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है तो संसार में कुछ भी पाप नहीं है।"

बालासाहब देवरस ने 1986 राष्ट्रीय सेविका समिति के स्वर्ण जयंती समारोह में दिए भाषण में कहा था 'जाति-व्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिए. हिंदू समाज की जातिप्रथा समाप्त होने पर सारा संसार हिंदू समाज को वरण करेगा. इसके लिए भारतीय महिला समाज को पहल अपने हाथ में लेकर अपने घर से ही अंतरजातीय और अंतरप्रांतीय विवाह की शुरुआत करनी चाहिए.'

द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी कहते थे - ‘चातुर्वर्ण्य में न तो किसी वर्ण का अस्तित्व है और न ही किसी जाति का. आज तो हम सभी का एक ही वर्ण और एक ही जाति है और वह है हिंदू.’

संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने कहा ‘हम अस्पृश्यता दूर करने की बात नहीं करते बल्कि हम स्वयंसेवकों को इस प्रकार विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम सभी हिंदू हैं और एक ही परिवार के सदस्य हैं. इससे किसी भी स्वयंसेवक में इस तरह का विचार नहीं आता है कि कौन किस जाति का है?’

#मनोज_जोशी

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