Sunday, August 9, 2026

लच्छेदार भाषण देकर छवि को निखारने के लिये तालियाँ लेना अलग बात है, नेपथ्य में रहकर दूसरों के लिये कुछ करना अलग बात है।

 लच्छेदार भाषण देकर  छवि को निखारने के लिये तालियाँ  लेना अलग बात है, नेपथ्य में रहकर दूसरों के लिये कुछ करना अलग बात है। 

 - प्रो. राजेन्द्र सिंह 'रज्जु भैया' 

( आज पुण्यतिथि )


रज्जु भैया के इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द है -"नेपथ्य"।

यह केवल मंच के पीछे की जगह नहीं, बल्कि एक कार्य-दृष्टि है। ऐसी दृष्टि, जिसमें व्यक्ति से अधिक महत्व कार्य का होता है और प्रसिद्धि से अधिक महत्व परिणाम का।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति को यदि एक शब्द में समझाना हो, तो वह शायद "नेपथ्य" ही होगा। संघ ने अपने स्वयंसेवकों को कभी स्वयं को स्थापित करने का प्रशिक्षण नहीं दिया, बल्कि समाज को संगठित करने का संस्कार दिया। इसलिए हजारों स्वयंसेवक ऐसे मिलेंगे, जिन्होंने दशकों तक शिक्षा, सेवा, ग्राम विकास, आपदा राहत, सामाजिक समरसता या संगठन के क्षेत्र में काम किया, लेकिन व्यक्तिगत परिचय या प्रचार उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रहा।

संघ की शाखा में स्वयंसेवक को यह नहीं सिखाया जाता कि वह कितना प्रसिद्ध बनेगा; यह सिखाया जाता है कि जहाँ समाज को आवश्यकता हो, वहाँ सबसे पहले और सबसे शांत भाव से खड़ा होना है। इसलिए संघ के अनेक कार्य समाज में दिखाई देते हैं, लेकिन उन्हें करने वाले लोग अक्सर नेपथ्य में ही रहते हैं।

रज्जु भैया स्वयं असाधारण विद्वान थे, सफल भौतिक विज्ञानी थे, प्रभावशाली वक्ता भी थे, लेकिन उन्होंने अपने व्यक्तित्व को कभी केंद्र में नहीं रखा। उनका आग्रह व्यक्ति-पूजा पर नहीं, कार्य और विचार की निरंतरता पर था।

आज जब सार्वजनिक जीवन में दृश्यता को ही सफलता का पर्याय मान लिया गया है, तब रज्जु भैया का यह वाक्य और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह याद दिलाता है कि किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके मंच पर बैठे लोगों में नहीं, बल्कि नेपथ्य में खड़े उन असंख्य कार्यकर्ताओं में होती है, जो बिना किसी अपेक्षा के अपना दायित्व निभाते रहते हैं।

शायद यही कारण है कि संघ ने सदैव व्यक्ति से अधिक विचार और पद से अधिक दायित्व पर बल दिया है। नेपथ्य में रहकर समाज के लिए कार्य करना केवल एक शैली नहीं, बल्कि एक साधना है। और यही साधना रज्जु भैया के व्यक्तित्व और उनके इस वाक्य दोनों का सार है।

 मनोज जोशी

राष्ट्रधर्म अमर रहना चाहिए


 राष्ट्रधर्म अमर रहना चाहिए 

- मनोज जोशी 


मैं रहूँ या काल की धारा मुझे बहा ले जाए,

भारत माता का गौरव अक्षुण्ण रहना चाहिए।

तन मिटे तो मिट जाए इस पावन माटी में,

राष्ट्रधर्म का दीप निरंतर जलना चाहिए।

वेदों की ऋचाएँ गूँजें, गीता का संदेश रहे,

राम का मर्यादा-पथ, कृष्ण का उपदेश रहे।

शंकर का अद्वैत और बुद्ध की करुणा लेकर,

भारत को फिर विश्वगुरु बनना चाहिए।

गंगा निर्मल बहे, हिमालय अडिग खड़ा रहे,

हर वन, नदी और जीव के प्रति श्रद्धा रहे।

इस धरती के कण-कण में ईश्वर का वास मानकर,

प्रकृति का संरक्षण भी पूजा बनना चाहिए।

भगवा केवल रंग नहीं, त्याग और तप की ज्वाला है,

यह ऋषियों के ज्ञान और वीरों की वरमाला है।

धर्म विजय का घोष नहीं, सबके मंगल की कामना है,

विश्व के कल्याण का संकल्प जगना चाहिए।

जाति-पंथ की दीवारें भारत को बाँट न पाएँ,

हम अपने पुरखों और माटी को न भूल जाएँ।

भाषाएँ और वेश अनेक, पर राष्ट्रभाव हो एक,

हर हृदय में भारत का स्पंदन होना चाहिए।

घर-घर संस्कार जगें, मातृशक्ति का मान रहे,

शास्त्र का विवेक और शस्त्र का स्वाभिमान रहे।

अन्याय के सम्मुख मौन रहना धर्म नहीं होता,

सत्य की रक्षा में निर्भय होकर खड़ा होना चाहिए।

मेरा नाम भले इतिहास के पन्नों में न आए,

मेरी आहुति राष्ट्रयज्ञ की अग्नि बढ़ाती जाए।

मैं रहूँ या न रहूँ, इसकी चिंता मुझको नहीं,

हिंदु संस्कृति और भारत अमर रहना चाहिए

एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक

 एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक 


संस्कृत की सुभाषित परंपरा का एक प्रसिद्ध श्लोक है,

 पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।

शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा पुरुषःपञ्चलक्षणः॥


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने युवाओं से बातचीत में इस सुभाषित का उल्लेख किया।


अगर इसे आज की जिंदगी और मैनेजमेंट की भाषा में समझें, तो मेरी समझ से यह एक तरह से लीडरशिप का पाँच सूत्रीय मॉडल है।


1.पहला सूत्र है - संसाधन सही जगह लगाइए। “पात्रे त्यागी” का मतलब सिर्फ दान देना नहीं है। इसका अर्थ है कि आपका समय, पैसा, ऊर्जा और भरोसा उस व्यक्ति या काम पर लगे, जहां उसका सही उपयोग हो। अच्छे मैनेजर और अच्छे इंसान की पहचान यही है कि वह केवल देता नहीं, बल्कि सही जगह देता है।


2.दूसरा सूत्र - टैलेंट और अच्छाई को पहचानिए। “गुणे रागी” कहता है कि अच्छे गुणों से प्रेम होना चाहिए। किसी टीम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि कौन आपके करीब है, बल्कि यह है कि कौन योग्य है, कौन मेहनती है और कौन बेहतर काम कर रहा है। जो व्यक्ति गुणों की कद्र करता है, उसके आसपास अच्छे लोग अपने-आप जुड़ने लगते हैं।


3.तीसरा सूत्र - सफलता अकेले मत रखिए। “संविभागी च बन्धुषु” का सीधा संदेश है कि उपलब्धि, अवसर और श्रेय साझा कीजिए। किसी भी टीम में भरोसा तब बनता है, जब नेता सफलता का श्रेय बाँटता है और मुश्किल समय की जिम्मेदारी खुद भी लेता है।


4.चौथा सूत्र - जानकारी नहीं, समझ विकसित कीजिए। “शास्त्रे बोद्धा” का अर्थ है विषय को समझना। आज हमारे पास जानकारी की कमी नहीं है। फर्क इस बात से पड़ता है कि कौन उस जानकारी का सही अर्थ निकालता है, सही निर्णय लेता है और उसे काम में बदलता है। यही ज्ञान और सिर्फ सूचना के बीच का अंतर है।


5.पाँचवां सूत्र - संकट में नेतृत्व दिखाइए। “रणे योद्धा” का अर्थ केवल युद्ध नहीं है। जीवन और कामकाज में असली रण वह समय है जब परिस्थितियां आपके पक्ष में न हों। दबाव हो, असफलता सामने हो या कठिन फैसला लेना पड़े। अच्छे समय में सब नेतृत्व कर सकते हैं, लेकिन लीडर की असली पहचान संकट के समय होती है।


यही इस श्लोक की आधुनिक उपयोगिता है। सही जगह निवेश, प्रतिभा की पहचान, सफलता की साझेदारी, गहरी समझ और संकट में साहस -ये पाँच गुण किसी व्यक्ति को केवल सफल नहीं, बल्कि प्रभावी लीडर बनाते हैं।

भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल

 भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल 


 विश्व मूलनिवासी दिवस पर विशेष 


 मनोज जोशी 


आज विश्व मूलनिवासी दिवस है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इस दिवस की अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संदर्भ हैं, लेकिन भारत में इसे समझने की दृष्टि हमारी अपनी होनी चाहिए। भारत में मूलनिवासी कौन है? इसका सबसे सहज उत्तर है, हम सब भारतवासी मूलनिवासी हैं।

भारत की धरती किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय की मातृभूमि नहीं है। यह हम सबकी मातृभूमि है। फिर मूलनिवासी की पहचान को किसी एक समाज तक सीमित करके बाकी भारतीयों को उससे अलग खड़ा करने की आवश्यकता ही क्या है?

भेदभाव का कहाँ सवाल,

हम सब भारत माँ के लाल।

यही इस दिन का भारतीय संदेश होना चाहिए।

हमारे वनवासी समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति है। उनकी भाषा, लोक परंपराएं, पर्व, नृत्य, कला और प्रकृति के साथ जीवन जीने की शैली भारत की अमूल्य धरोहर हैं। इस विशिष्टता का पूरा सम्मान होना चाहिए। उनके संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक हितों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा भी होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए यह मान लेना जरूरी नहीं कि केवल वही इस भूमि के मूलनिवासी हैं और शेष भारतीय कोई दूसरी श्रेणी हैं।

यहीं शब्दों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

औपनिवेशिक शासन ने भारत को समझने और उस पर शासन करने के लिए समाज को अनेक जातीय, नस्ली और सामाजिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया। जनगणना से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक भारतीय समाज को अलग-अलग खांचों में देखने की यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। स्वतंत्र भारत को इस विरासत से आगे बढ़कर अपनी सभ्यतागत दृष्टि से समाज को देखना चाहिए जहां विविधता का सम्मान हो, लेकिन विविधता को विभाजन में न बदला जाए।

भारत को जोड़ने वाली अवधारणा यह नहीं हो सकती कि पहले हम यह तय करें कि कौन ‘मूल’ है और कौन नहीं। 

वन में रहने वाला भी इस धरती का पुत्र है और गांव में रहने वाला भी। पहाड़ों में रहने वाला भी और मैदान में रहने वाला भी। शहर में रहने वाला भी उतना ही भारतवासी है जितना किसी दुर्गम वन क्षेत्र में सदियों से अपनी परंपराओं को सहेजकर रखने वाला परिवार।

स्थान अलग हो सकता है, जीवन-पद्धति अलग हो सकती है, पर मातृभूमि अलग नहीं होती।

यही कारण है कि वनवासी समाज को भारत की मुख्यधारा से अलग किसी समानांतर पहचान के रूप में देखने के बजाय भारतीय सभ्यता के अभिन्न अंग के रूप में देखने की आवश्यकता है। गोंड की परंपरा भी भारत की है, भील की भी, बैगा की भी और संथाल की भी। उसी प्रकार तमिल, मराठी, पंजाबी, असमिया, गुजराती, बंगाली और देश की असंख्य अन्य परंपराएं भी भारत की ही हैं।

हम अलग-अलग धाराएं हैं, लेकिन सभ्यता की नदी एक है।

मूलनिवासी शब्द को यदि अधिकार और सम्मान का प्रतीक बनाया जाए तो वह सकारात्मक है। लेकिन उसी शब्द के आधार पर समाज में यह भाव पैदा होने लगे कि कोई इस भूमि पर अधिक मूल है और कोई कम, तो हमें सावधान होना चाहिए। किसी भी भारतीय की भारतीयता को दूसरे की तुलना में कमतर नहीं माना जा सकता।

वनवासी समाज  हमारा अपना है। उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है। उसका गौरव भारत का गौरव है। उसके जंगल और पहाड़ भारत की धरोहर हैं। उसके लोकगीत, देवी-देवता, नायक और परंपराएं भारत माता के विराट स्वरूप का हिस्सा हैं।

इसीलिए मूलनिवासी दिवस को विभाजन की शब्दावली से निकालकर समरसता के उत्सव में बदलने की आवश्यकता है।

न यह किसी एक समाज का अधिकार कम करता है, न किसी की विशिष्ट पहचान मिटाता है। इसके विपरीत यह कहता है, अपनी पहचान पर गर्व कीजिए, अपनी परंपरा बचाइए, अपनी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाइए; लेकिन सबसे ऊपर उस मातृभूमि को याद रखिए जो हम सभी को एक सूत्र में बांधती है।


 कोई वन में, कोई नगर में, 

 कोई पर्वत, कोई मैदान। 

 बोली-वेश भले हों न्यारे, 

 सबकी माता हिंदुस्तान। 


 और इसलिए 

 किसे मूल और किसे पराया, 

 क्यों खींचें ऐसी दीवार? 

 माटी सबकी, माता सबकी, 

 भारत सबका एक परिवार। 

 भेदभाव का कहाँ सवाल, 

 हम सब भारत माँ के लाल।