Wednesday, November 25, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का रामराज्य (२५)

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का रामराज्य" (२५)

(गतांक से आगे)

आखिर गाँधीजी के क्या विचार थे संघ के बारे में ??


पिछली २४ कड़ियों में हमने जाना कि महात्मा गाँधी एक सनातनी हिंदु थे। वे धर्म आधारित राजनीति के दूत थे। उन्होंने हिंदुत्व को धर्मों का धर्म कहा। यानी उनकी नजर में भी धर्म और संप्रदाय दोनों अलग-अलग बातें थीं। उन्होंने सत्य, अहिसा और सत्याग्रह जैसे प्रयोग हिंदुत्व की प्रेरणा से ही शुरू किए थे। वे गौरक्षा के हिमायती थे। वे धर्मांतरण के विरोधी थे, उन्होंने विवाह के लिए धर्म परिवर्तन का भी विरोध किया था। वे वर्ण व्यवस्था पर भरोसा करते थे। उन्होंने समाज के वंचित के प्रथक निर्वाचन की मांग को अस्वीकार कर दिया था, क्योंकि वे यह मानते थे कि इससे हिंदु समाज और हिंदु्स्थान दोनों बिखर जाएंगे। लेकिन वे छुआछूत के विरोधी थे और अजा- जजा वर्ग के लिए निर्वाचन में आरक्षण को उन्होंने स्वीकार किया।  वे रामराज्य के तो हिमायती थे ही जिस पर हम अगली कड़ियों में चर्चा करेंगे। अगर हिंदुत्व की बात हो और संघ की बात न हो तो बात वैसे ही अधूरी रह जाएगी। मैंने तो अपनी पहली कड़ी में ही यह साफ कर दिया था कि मेरी श्रृंखला संघ, गाँधीजी, हिंदुत्व और रामराज्य के आसपास रहेगी।

यदि आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के किसी जवाबदार स्वयंसेवक से वैचारिक चर्चा करेंगे। संघ साहित्य को पढ़ेंगे तो वह भी तो इन मुद्दों पर लगभग गाँधीजी की तरह बातें करते हैं। और विस्तार में जाएंगे तो संघ की शाखा में रोजाना एकात्मता स्तोत्रम में अन्य महापुरुषों के साथ महात्मा गाँधी को भी याद किया जाता है… गाँधीजी रामराज्य की बात करते हैं और संघ हिंदु राष्ट्र की… हम जब गाँधीजी के रामराज्य की चर्चा करेंगे तब संघ के हिंदु राष्ट्र पर भी बात करेंगे।


दूसरी ओर, जब गाँधीजी के नाम पर राजनीति करने वालों और खुद को गाँधीवादी कहने वालों को सुनो, पढ़ो तो ऐसा लगता है जैसे संघ और गाँधी दो विपरीत ध्रुव हैं।

ऐसे में यह जानना रोचक है कि आखिर स्वयं गाँधीजी संघ के बारे में क्या सोचते थे?

दिसंबर १९३४ में गाँधीजी जमनालाल बजाज के बुलावे पर वर्धा गए थे। गाँधीजी जिस घर में ठहरे थे, उसके ठीक सामने एक विशाल मैदान था जो जमनालाल बजाज की ही संपत्ति थी. उन दिनों उस मैदान पर संघ का शीत शिविर चल रहा था। बहुत स्पष्ट है कि गाँधीजी के सहयोगी जमनालाल बजाज संघ की भी मदद करते थे। कुछ दिन तक दूर से ही शिविर की गतिविधियां देखने पर गाँधीजी ने शिविर में जाने की इच्छा व्यक्त की। २५ दिसंबर, १९३४ को सुबह ६ बजे महात्मा गांधी आरएसएस के शिविर में पहुंच गए। संघ के उस शिविर की दो बातों ने महात्मा गाँधी को खासा प्रभावित किया था। पहली यह कि शिविर में गणवेश, भोजन और ठहरने का सारा प्रबंध और खर्च स्वयंसेवकों ने खुद ही उठाया था। और दूसरी  अस्पृश्यता तो दूर की बात, स्वयंसेवकों को आपस में एक-दूसरे की जाति मालूम तक नहीं थी। स्वयंसेवकों का भोजन एक साथ बना था और वे एक साथ भोजन कर रहे थे। उस दिन डॉ. हेडगेवार शिविर में उपस्थित नहीं थे। इसलिए वहाँ उनकी गाँधीजी से मुलाकात नहीं हो सकी। अगले दिन डॉ. हेडगेवार गाँधीजी से मिलने गए और दोनों के बीच लंबी चर्चा हुई।

१२सितंबर, १९४७ की प्रार्थना सभा (यानी आजादी के करीब एक माह बाद  में गांधीजी ने कहा था - "मैंने सुना था कि इस संस्था (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के हाथ भी खून से सने हुए हैं।गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिलाया कि यह बात झूठ है। उनकी संस्था किसी की दुश्मन नहीं है. उसका उद्देश्य मुसलमानों की हत्या करना नहीं है। वह तो सिर्फ अपनी सामर्थ्य-भर हिंदुस्तान की रक्षा करना चाहती है। उसका उद्देश्य शांति बनाए रखना है. गुरुजी ने मुझसे कहा कि मैं उनके विचारों को प्रकाशित कर दूं.।"बाद में इस बातचीत को महात्मा गांधी ने हरिजन में प्रकाशित भी किया।

फिर चार दिन बाद १६ सितंबर,१९४७ को वे दिल्ली में आरएसएस के कार्यक्रम में पहुंच गए। दिल्ली की एक मलिन बस्ती में यह कार्यक्रम था और गाँधीजी भी वहीं ठहरे हुए थे। यहां उन्होंने कहा था - ‘बरसों पहले मैं वर्धा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक शिविर में गया था। उस समय इसके संस्थापक श्री हेडगेवार जीवित थे। स्वर्गीय श्री जमनालाल बजाज मुझे शिविर में ले गए थे और वहां मैं उन लोगों का कड़ा अनुशासन, सादगी और छूआछूत की पूर्ण समाप्ति देखकर अत्यंत प्रभावित हुआ था। तब से संघ काफी बढ़ गया है। मैं तो हमेशा से यह मानता आया हूं कि जो भी संस्था सेवा और आत्मत्याग के आदर्श से प्रेरित है, उसकी ताकत बढ़ती ही है। लेकिन सच्चे रूप में उपयोगी होने के लिए त्यागभाव के साथ ध्येय की पवित्रता और सच्चे ज्ञान का संयोजन आवश्यक है।  ऐसा त्याग, जिसमें इन दो चीजों का अभाव हो, समाज के लिए अनर्थकारी सिद्ध हुआ है। महात्मा गांधी ने आगे कहा - ‘कुछ दिन पहले ही आपके गुरुजी (द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर) से मेरी मुलाकात हुई थी. मैंने उन्हें बताया था कि कलकत्ता और दिल्ली में संघ के बारे में क्या-क्या शिकायतें मेरे पास आईं थीं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिया कि यद्यपि वे संघ के प्रत्येक सदस्य के उचित आचरण की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, फिर भी संघ की नीति हिंदुओं और हिंदू धर्म की सेवा करना मात्र है और वह भी किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाकर नहीं। संघ आक्रमण में विश्वास नहीं रखता, लेकिन अहिंसा में उसका विश्वास नहीं है। वह आत्म-रक्षा का कौशल सिखाता है. प्रतिशोध लेना उसने कभी नहीं सिखाया।"

(आखिर गुरुजी की इस बात पर किसी व्यक्ति को क्या आपत्ति हो सकती है? )

 संभवत: गाँधीजी को संघ के करीब जाता देख कांग्रेस का एक धड़ा उनसे नाराज रहने लगा था। 15 नवंबर, 1947 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक में गांधीजी ने सितंबर में संघ के कार्यक्रम में कही बातों को यह कहते हुए दोहराया था मैं संघ के बारे में कई बातें सुनता हूं। लेकिन मैं उनके कार्यक्रम में गया हूं। अगले दिन 16 नवंबर 1947 को प्रार्थना सभा में गाँधीजी ने कहा – “मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया से मिला हूं. मैं इस संघ की एक बैठक में शामिल हुआ था, तबसे मुझे उसकी बैठक में जाने के लिए डांटा जाता रहा है।” प्रश्न यह है कि आखिर वह कौन था जो गाँधीजी को डॉट रहा था। 

आजादी के बाद हुए दंगों को रोकने के लिए 13 जनवरी, 1948 को महात्मा गाँधी ने उपवास की घोषणा कर दी थी। छह दिन बीतते-बीतते उनके पेट में तेज दर्द होना शुरू हो गया। 18 जनवरी को देश के विभिन्न संगठनों के सौ से अधिक प्रतिनिधियों ने गाँधीजी  की सभी सातों शर्तों को मानते हुए सांप्रदायिक सौहार्द्र स्थापित करनेवाले एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। . इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिनिधि भी शामिल थे। इस पर अपने संदेश में गाँधीजी ने कहा - ‘मेरी प्रतिज्ञा पूरी होने में जितना समय लगने की आशा थी वह दिल्ली के नागरिकों, जिनमें हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता भी सम्मिलित हैं,की सद्भावना के कारण उससे पहले ही पूरी हो गई.’।

(क्रमश:)



Sunday, November 8, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का रामराज्य (२४)

 

शादी के लिए धर्म परिवर्तन पर गाँधीजी के विचार 

 (गतांक से आगे)


31 अक्टूबर को खबर आई कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केवल शादी के लिए धर्म परिवर्तन को अवैध करार दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले ने लव जिहाद जैसे विषय पर चर्चा छेड़ दी है।  एक मित्र ने सलाह दी कि जब गाँधीजी के हिंदुत्व पर इतना अध्ययन कर रहे हो तो यह भी बताओ कि गाँधीजी के ऐसे मामले में क्या विचार थे ?
मैंने पहले कहा गाँधीजी तो सामान्य रूप से ही धर्म परिवर्तन के खिलाफ थे। मित्र की सलाह कहिए या दबाव  जब अध्ययन किया तो पता लगता है गाँधीजी हिंदू समाज के भीतर अंतरजातीय विवाह को सामाजिक समरसता के लिए जरुरी मानते थे और धर्म बदल कर विवाह उनके हिसाब से अनुचित था।
७जुलाई, १९४६ के 'हरिजन' में वे लिखते हैं, "यदि मेरा बस चले तो मैं अपने प्रभाव में आने वाली सभी सवर्ण लड़कियों को चरित्रवान हरिजन युवकों को पति के रूप में चुनने की सलाह दूं."
इसके ४ साल पहले ८ मार्च, १९४२ के 'हरिजन' में गांधी लिखते हैं, "जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, इस तरह के विवाह बढ़ेंगे, और उनसे समाज को फ़ायदा ही होगा. फ़िलहाल तो हम में आपसी सहिष्णुता का माद्दा भी पैदा नहीं हुआ है. लेकिन जब सहिष्णुता बढ़कर सर्वधर्म-समभाव में बदल जाएगी, तो ऐसे विवाहों का स्वागत किया जाएगा."
"आने वाले समाज की नवरचना में जो धर्म संकुचित रहेगा और बुद्धि की कसौटी पर ख़रा नहीं उतरेगा, वह टिक न सकेगा; क्योंकि उस समाज में मूल्य बदल जाएंगे. मनुष्य की कीमत उसके चरित्र के कारण होगी. धन पदवी या कुल के कारण नहीं."
"मेरी कल्पना का हिंदू धर्म कोई संकुचित संप्रदाय नहीं है. वह तो काल के समान ही पुरानी महान और सतत विकास की प्रक्रिया है. उसमें पारसी, मूसा, ईसा, मुहम्मद, नानक और ऐसे ही दूसरे धर्म-संस्थापकों का समावेश हो जाता है."
उसकी व्याख्या इस प्रकार है-
'विद्वद्भिः सेवितः सद्भिनित्यमद्वेषरागिभिः.
हृदयेनाम्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत..'

अर्थात् जिस धर्म को राग-द्वेषहीन ज्ञानी संतों ने अपनाया है और जिसे हमारा हृदय और बुद्धि ही स्वीकार करती है, वही सद्धर्म है.

"मैं हमेशा से इस बात का घोर विरोधी रहा हूं और अब भी हूं कि स्त्री-पुरुष सिर्फ़ विवाह के लिए अपना धर्म बदलें. धर्म कोई चादर या दुपट्टा नहीं कि जब चाहा ओढ़ लिया, जब चाहा उतार दिया. इस मामले में धर्म बदलने की कोई बात ही नहीं है."
(क्रमशः)

#मनोज_जोशी


Monday, November 2, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का रामराज्य (२३)

(गतांक से आगे)

सत्य, अहिंसा और महात्मा गाँधी

इस श्रृंखला की शुरुआत में ही मैंने एक बात कही थी कि हम महात्मा गाँधी को सत्य और अहिंसा का पुजारी कह कर अपना कर्तव्य पूरा कर लेते हैं। लेकिन क्या वास्तव में यह जानने की कोशिश की कि महात्मा गाँधी के लिए सत्य और अहिंसा का अर्थ क्या है?

क्या अहिंसा का अर्थ - एक झापड़ खाने पर दूसरा गाल आगे कर देना है? और प्रश्न तो यह भी है कि सत्य और अहिंसा में से किसी एक को चुनना पड़े तो महात्मा गाँधी किसे चुनेंगे?

इस सवाल के जवाब के लिए आपको महात्मा गाँधी द्वारा विभिन्न अवसरों पर व्यक्त विचारों को पढ़ना होगा। गाँधीजी के स्वयं के लिखे शब्दों को पढ़ कर ही हम समझ सकते हैं कि गाँधीजी सत्य को धर्म मानते थे। हिंदू संस्कृति के हिसाब से देखें तो जो सत्य नहीं है वह धर्म नहीं हो सकता। हमारे यहां कहा गया है जो धारण करने योग्य है वही धर्म है। ऐसे में असत्य तो धर्म हो ही नहीं सकता। यदि सत्य और अहिंसा में से किसी एक को चुनना होगा तो गाँधीजी कहते हैं कि वे सत्य को चुनेंगे। १७ अगस्त 1935 को हरिजन में उन्होंने लिखा -

“आदमी शरीर से कितना ही कमजोर हो, पर यदि पलायन लज्जा की बात है तो उसे मुकाबले पर डटे रहना चाहिए और कर्तव्यपालन करते हुए मृत्यु का वरण करना चाहिए। यही अहिंसा तथा वीरता है। वह कितना ही कमजोर हो, पर अपने शत्रु पर शक्ति भर वार करे और ऐसा करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो जाए यह वीरता है, यद्यपि यह अहिंसा नहीं है। यदि आदमी संकट का सामना करने के बजाए भाग खडा होता है, तो यह कायरता है। पहले मामले में, आदमी के हृदय में प्रेम अथवा दयालुता का भाव होगा। दूसरे और तीसरे मामले में, उसके हृदय में घृणा अथवा अविश्वास और भय के भाव होंगे ।”


गाँधीजी की अहिंसा को विस्तार से जानने समझने के लिए पढ़िए महात्मा गाँधी के स्वयं के विचार इन विचारों को पढ़ो तो ऐसा लगता है जैसे कोई धार्मिक संत प्रवचन दे रहे हैं। गाँधीजी ने अनेक अवसरों पर कहा कि “अहिंसा का मार्ग हिंसा के मार्ग की तुलना में कहीं ज्यादा साहस की अपेक्षा रखता है।” 

२८ जनवरी १९३९ को उन्होंने हरिजन में लिखा

“यदि मनष्य में ... गर्व और अहंकार हो तो उसमें अहिंसा नहीं टिक सकती। विनम्रता के बिना अहिंसा असंभव है। मेरा अपना अनुभव है कि जब-जब मैंने अहिंसा का आश्रय लिया है, किसी अदृष्ट शक्ति ने मेरा मार्गदर्शन किया है और मुझे उस पर आरूढ रखा है। यदि मैं अपनी ही इच्छा के बलबूते रहता तो बुरी तरह नाकामयाब हो गया होता। जब मैं पहली बार जेल गया तो काफी घबराया हुआ था। मैंने जेल-जीवन के बारे में बडी-बडी भयावह बातें सुनी थम्। लेकिन मुझे ईश्वर के संरक्षण में आस्था थी। हमारा अनुभव यह रहा कि जो लोग मन में प्रार्थना का भाव लेकर जेल गए थे, वे विजयी होकर लौटे, और जो अपनी ही शक्ति के बूते पर गए थे, वे नाकामयाब हो गए। जब आप यह कहते हैं कि ईश्वर आपको शक्ति दे रहा है, तो उसमें आत्मदया का कोई भाव नहीं होता। आत्मदया की बात तब पैदा होती है जब आपको दूसरों से मान्यता पाने की आकांक्षा हो। लेकिन यहां तो मान्यता का कोई प्रश्न ही नहीं है।”


.यंग इंडिया में २८ मई १९२४ को उन्होंने लिखा 

“मेरी अहिंसा इस बात की इजाजत नहीं देती कि खतरा सामने देखकर अपने प्रियजनों को असुरक्षित छोडकर खुद भाग जाओ। हिंसा और कायरतापूर्ण पलायन में से मैं हिंसा को ही तरजीह दूंगा। जिस प्रकार मैं किसी अंधे आदमी को सुंदर दृश्यों का आनंद लेने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता, उसी प्रकार कायर को अहिंसा का पाठ नहीं पढा सकता। अहिंसा तो वीरता की चरम सीमा है। मेरे अपने अनुभव में, मुझे हिंसा में विश्वास रखने वाले लोगों को अहिंसा की श्रेष्ठता सिद्ध करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। मैं वर्ष़ों तक कायर रहा और उन दिनों मुझे कई बार हिंसा पर उतारू होने की इच्छा हुई। जब मैंने कायरता को त्यागना आरंभ किया, तब अहिंसा की कं करने लगा। वे हिंदू जो खतरा सामने देखकर अपनी जिम्मेदारी छोडकर भाग खडे हुए, अहिंसक होने के नाते या वार करने से डरने की वजह से नहीं भागे बल्कि इसलिए भागे कि वे मरने या चोट खाने के लिए तैयार नहीं थे। खूंख्वार कुने को देखकर भाग जाने वाला खरगोश इसलिए नहीं भागता कि वह बडा अहिंसक है। वह बेचारा तो कुने को देखते ही भय से कांपने लगता है और अपनी जान बचाने के लिए भागता है।”

४अगस्त और ११ अगस्त १९२० को यंग इंडिया में उन्होंने लिखा - “समूची प्रजाति के नपुंसक हो जाने का खतरा उठाने के मुकाबले मैं हिंसा को हजार गुना बेहतर समझता हूं । पर मैं भारत को बेबस नहीं मानता। मैं स्वयं को बेबस प्राणी नहीं मानता... शक्ति शारीरिक क्षमता में निहित नहीं है । वह अदम्य इच्छा से उत्पन्न होती है ।”


यंग इंडिया और हरिजन  के विभिन्न अंकों सहित अन्य पत्र पत्रिकाओं में महात्मा गाँधी लिखते हैं -


“मैं स्वप्नंष्टा नहीं हूं। मैं स्वयं को एक व्यावहारिक आदर्शवादी मानता हूं। अहिंसा का धर्म केवल ऋषियों और संतों के लिए नहीं है। यह सामान्य लोगों के लिए भी है। अहिंसा उसी प्रकार से मानवों का नियम है जिस प्रकार से हिंसा पशुओं का नियम है। पशु की आत्मा सुप्तावस्था में होती है और वह केवल शारीरिक शक्ति के नियम को ही जानता है। मानव की गरिमा एक उच्चतर नियम आत्मा के बल का नियम के पालन की अपेक्षा करती है...’”


‘‘जिन ऋषियों ने हिंसा के बीच अहिंसा की खोज की, वे न्यूटन से अधिक प्रतिभाशाली थे। वे स्वयं वेलिंग्टन से भी बडे योद्धा थे। शस्त्रों के प्रयोग का ज्ञान होने पर भी उन्होंने उसकी व्यर्थता को पहचाना और श्रांत संसार को बताया कि उसकी मुक्ति हिंसा में नहीं अपितु अहिंसा में है।”


“मैं केवल एक मार्ग जानता हूं - अहिंसा का मार्ग। हिंसा का मार्ग मेरी प्रछति के विरुद्ध है। मैं हिंसा का पाठ पढाने वाली शक्ति को बढाना नहीं चाहता... मेरी आस्था मुझे आश्वस्त करती है कि ईश्वर बेसहारों का सहारा है, और वह संकट में सहायता तभी करता है जब व्यक्ति स्वयं को उसकी दया पर छोड देता है। इसी आस्था के कारण मैं यह आशा लगाए बैठा हूं कि एक-न-एक दिन वह मुझे ऐसा मार्ग दिखाएगा जिस पर चलने का आग्रह मैं अपने देशवासियों से विश्वासपूर्वक कर सकूंगा।”

“अहिंसा और सत्य का मार्ग तलवार की धार के समान तीक्ष्ण है। इसका अनुसरण हमारे दैनिक भोजन से भी अधिक महत्वपूर्ण है। सही ढंग से लिया जाए तो भोजन देह की रक्षा करता है, सही ढंग से अमल में लाई जाए तो अहिंसा आत्मा की रक्षा करती है। शरीर के लिए भोजन नपी-तुली मात्रा में और निश्चित अंतरालों पर ही लिया जा सकता है; अहिंसा तो आत्मा का भोजन है, निरंतर लेना पडता है। इसमें तृप्ति जैसी कोई चीज नहीं है। मुझे हर पल इस बात के प्रति सचेत रहना पडता है कि मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ रहा हूं और उस लक्ष्य के हिसाब से अपनी परख करती रहनी पडती है।”


“मैं जीवन भर एक 'जुआरी' रहा हूं। सत्य का शोध करने के अपने उत्साह में और अहिंसा में अपनी आस्था के अनवरत अनुगमन में, मैंने बेहिचक बडे-से-बडे दांव लगाए हैं। इसमें मुझसे कदाचित गलतियां भी हुई हैं, लेकिन ये वैसी ही हैं जैसी कि किसी भी युग या किसी भी देश के बडे-से-बडे वैज्ञानिकों से होती हैं।”


“मैंने अहिंसा का पाठ अपनी पत्नी से पढा, जब मैंने उसे अपनी इच्छा के सामने झुकाने की कोशिश की। एक ओर, मेरी इच्छा के दृढ प्रतिरोध, और दूसरी ओर, मेरी मूर्खता को चुपचाप सहने की उसकी पीडा को देखकर अंततः मुझे अपने पर बडी लज्जा आई, और मुझे अपनी इस मूर्खतापूर्ण धारणा से मुक्ति मिली कि मैं उस पर शासन करने के लिए ही पैदा हुआ हूं। अंत में, वह मेरी अहिंसा की शिक्षिका बन गई।”


“अहिंसा के मार्ग का पहला कदम यह है कि हम अपने दैनिक जीवन में परस्पर सच्चाई, विनम्रता, सहिष्णुता और प्रेममय दयालुता का व्यवहार करें। अंग्रेजी में कहावत है कि ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है। नीतियां तो बदल सकती हैं और बदलती हैं। किंतु अहिंसा का पंथ अपरिवर्तनीय है। अहिंसा का अनुगमन उस समय करना आवश्यक है जब तुम्हारे चारों ओर हिंसा का नंगा नाच हो रहा हो। अहिंसक व्यक्ति के साथ अहिंसा का व्यवहार करना कोई बडी बात नहीं है। वस्तुतः यह कहना कठिन है कि इस व्यवहार को अहिंसा कहा भी जा सकता है या नहीं। लेकिन अहिंसा जब हिंसा के मुकाबले खडी होती है, तब दोनों का फर्क पता चलता है। ऐसा करना तब तक संभव नहीं है जब तक कि हम निरंतर सचेत, सतर्क और प्रयासरत न रहें”


“अहिंसा उच्चतम कोटि का सव्यि बल है। यह आत्मबल अर्थात हमारे अंदर बैठे ईश्वरत्व की शक्ति है। अपूर्ण मनुष्य उस तत्व को पूरी तरह नहीं पकड सकता - वह उसके संपूर्ण तेज को सहन नहीं कर पाएगा, किंतु उसका अत्यल्प अंश भी हमारे अंदर सव्यि हो जाए तो उसके अद्भुत परिणाम निकल सकते हैं।”


“अहिंसा के प्रति मेरा प्रेम सभी लौकिक अथवा अलौकिक वस्तुओं से बढकर है। इसकी बराबरी केवल सत्य के प्रति मेरे प्रेम के साथ की जा सकती है जो मेरी दृष्टि में अहिंसा का समानार्थक है; केवल अहिंसा के माध्यम से ही मैं सत्य को देख और उस तक पहुंच सकता हूं।”


“...अहिंसा के बिना सत्य का शोध और उसकी प्राप्ति असंभव है। अहिंसा और सत्य एक-दूसरे से इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि उन्हें पृथक करना प्रायः असंभव है। वे सिक्के, बल्कि कहिए कि धातु की चिकनी और बिना छाप वाली चव्का के दो पहलू हैं। कौन बता सकता है कि सीधा पहलू कौन-सा है और उल्टा कौन-सा ? फिर भी, अहिंसा साधन है और सत्य साध्य है। साधन वही है जो हमारी पहुंच के भीतर हो और इस प्रकार अहिंसा हमारा सर्वोपरि कर्तव्य है। यदि हम साधन को ठीक रखें तो देर-सबेर साध्य तक पहुंच ही जाएंगे। एक बार इस मुद्दे को समझ जाएं तो अंतिम विजय असंदिग्ध है।

“ अहिंसा  कायरता की आड नहीं है, बल्कि यह वीर का सर्वोच्च गुण है। अहिंसा के व्यवहार के लिए तलवारबाजी से ज्यादा वीरता की जरूरत है। कायरता और अहिंसा का कोई मेल नहीं है। तलवारबाजी को छोडकर अहिंसा को अपनाना संभव है, और कभी-कभी आसान भी है। अतः अहिंसा की पूर्वशर्त यह है कि अहिंसक व्यक्ति में वार करने की क्षमता हो। अहिंसा मनुष्य की प्रतिशोध लेने की भावना का सचेतन और जाना-बूझा संयमन है। लेकिन निष्व्यि, स्त्रSण और विवश अधीनता से तो प्रतिशोध ही हर हालत में श्रेष्ठ है। क्षमा और भी । उंची चीज है। प्रतिशोध दुर्बलता है। प्रतिशोध की भावना काल्पनिक अथवा वास्तविक हानि की आशंका के कारण उत्पन्न होती है। कुना डर के कारण भौंकता और काटता है। जो आदमी दुनिया में किसी से नहीं डरता, वह उस व्यक्ति पर वेधित होने की तकलीफ क्यों उठाना चाहेगा जो उसे नुकसान पहुंचाने का निरर्थक प्रयास कर रहा है ? सूर्य उन बच्चों से प्रतिशोध नहीं लेता जो उस पर धूल उछालते हैं। धूल उछालने के प्रयास में बच्चे खुद ही गंदे हो जाते हैं।”

“यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम बडे पैमाने पर वीर की अहिंसा से परिचित नहीं हैं। लोगों को, बडे जन-समूहों की तो बात छोडिए, छोटे-छोटे वर्ग़ों द्वारा अहिंसा के प्रयोग के विषय में भी संदेह है। वे अहिंसा के व्यवहार को असाधारण व्यक्तियों तक सीमित मानते हैं। यदि यह केवल व्यक्तियों के लिए ही सुरक्षित है तो फिर, मानव जाति के लिए इसका क्या उपयोग?”


“'पाप से घृणा करो, पापी से नहीं', एक ऐसा नीतिवचन है जिसे समझना तो काफी आसान है, पर जिस पर आचरण शायद ही कभी किया जाता है। इसीलिए दुनिया में घृणा का विष फैलता चला जा रहा है।”

“मैं अहिंसा को केवल व्यक्तिगत सद्गुण नहीं मानता। यह एक सामाजिक सद्गुण भी है जिसका विकास अन्य सद्गुणों की तरह ही किया जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि पारस्परिक व्यवहार में समाज प्रायः अहिंसा की अभिव्यक्ति से ही संचालित होता है । मेरा कहना सिर्फ यह है कि इसका और बडे पैमाने राष्टींय तथा अंतर्राष्टींय पर विस्तार किया जाना चाहिए ।”

“अहिंसा ऐसे व्यक्ति को नहीं सिखाई जा सकती जो मरने से भय खाता है और जिसमें प्रतिरोध की शक्ति ही नहीं है। लाचार चूहे को, जो हमेशा बिल्ली का शिकार बनता है, अहिंसक नहीं कहा जा सकता। उसका बस चले तो जरूर बिल्ली को खा जाए, पर वह उसे देखते ही भाग खडा होता है। हम उसे कायर नहीं कहते, क्योंकि प्रकृति ने उसे जैसा बनाया है वह वैसा ही व्यवहार करता है।”


“मैं यह नहीं कहता कि 'भारत पर आव्मण करने वाले लुटेरों, चोरों या राष्टों से निपटने के लिए हिंसा का सहारा मत लो।' लेकिन इसमें अच्छी तरह कामयाब होने के लिए हमें अपने ।पर संयम रखना सीखना चाहिए। जरा-जरा-सी बात पर पिस्तौल उठा लेना मजबूती नहीं, बल्कि कमजोरी की निशानी है। आपसी घूंसेबाजी हिंसा का नहीं, बल्कि नामर्दगी का अभ्यास है ।”


“यदि युद्ध स्वयं एक अनैतिक छत्य है तो यह नैतिक समर्थन या आशीर्वाद के योग्य कैसे माना जा सकता है ? मैं सभी प्रकार के युद्धों को पूरी तरह गलत मानता हूं। लेकिन हम दो युद्धरत पक्षों के इरादों की छानबीन करें तो संभवतः यह पाएंगे कि उनमें से एक सही है और दूसरा गलत। उदाहरण के लिए, यदि 'अ' देश 'ब' देश पर कब्जा करना चाहता है तो स्पष्टतया यह 'ब' देश पर अन्याय है। दोनों देश सशस्त्र संघर्ष करेंगे। मैं हिंसक संघर्ष में विश्वास नहीं करता, फिर भी, 'ब' देश, जिसका पक्ष न्यायोचित है, मेरी नैतिक सहायता और आशीर्वाद का पात्र होगा ।”


अहिंसा पर गाँधीजी का स्वयं का लिखा इतना उपलब्ध है कि ऐसी एक नहीं कई पोस्ट छोटी पड़ जाएं। मैंने पूर्व में जैसा कहा था कि गाँधीजी पर जैन पंथ और बौद्ध पंथ का प्रभाव था। वह उनके इन विचारों में स्पष्ट झलकता भी है।

(क्रमश:)