Monday, August 17, 2026

केवल विषधर नहीं, सृष्टि की धारण-शक्ति भी है नाग

 केवल विषधर नहीं, सृष्टि की धारण-शक्ति भी है नाग

#मनोज_जोशी

नागपंचमी पर विशेष


हमारी बोलचाल में साँप प्रायः भय, विष और छल का प्रतीक बनकर आता है। चाणक्य नीति में दुर्जन की तुलना सर्प से करते हुए कहा गया है

दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।

सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे॥

अर्थात् दुर्जन और सर्प में सर्प बेहतर है, क्योंकि वह किसी अवसर पर ही डसता है, जबकि दुर्जन कदम-कदम पर हानि पहुँचाता है। इस श्लोक में भी ध्यान देने योग्य बात यह है कि सर्प की प्रकृति को मनुष्य की दुर्भावना से अलग रखा गया है। सर्प का दंश उसकी स्वाभाविक सुरक्षा-प्रवृत्ति है, जबकि दुर्जन जान-बूझकर और बार-बार आघात करता है।

लेकिन हिंदु संस्कृति में नाग की पहचान केवल विषधर के रूप में नहीं है। हमारे वेद, पुराण, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता नाग को दैवी शक्ति, सृष्टि की स्थिरता, तप, संरक्षण और प्रकृति-संतुलन से जोड़ते हैं। नागपंचमी इसी व्यापक दृष्टि को समझने का अवसर है।

शुक्ल यजुर्वेद में पृथ्वी, अंतरिक्ष और दिव्य लोकों में स्थित सभी सर्पों को प्रणाम करते हुए कहा गया है

नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु।

ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥

अर्थात् पृथ्वी पर रहने वाले, अंतरिक्ष में विचरण करने वाले और दिव्य लोक में स्थित सभी सर्पों को नमस्कार। यह मंत्र मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक घटक मानता है। जिन जीवों से हमें भय लगता है, उनके अस्तित्व और उनकी भूमिका को भी स्वीकार करना हिंदु चिंतन की विशेषता है।

श्रीमद्भगवद्गीता के विभूति योग में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं

“सर्पाणामस्मि वासुकिः”, अर्थात् सर्पों में मैं वासुकि हूँ। अगले ही श्लोक में वे कहते हैं

“अनन्तश्चास्मि नागानाम्”, अर्थात् नागों में मैं अनन्त हूँ। इस प्रकार नाग को भगवान अपनी विभूतियों में स्थान देते हैं।

वासुकि वही नागराज हैं जिन्हें समुद्र-मंथन में देवताओं और दानवों ने मंथन की रस्सी बनाया। अनन्त या शेषनाग सृष्टि की धारण-शक्ति के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु शेषनाग पर विराजते हैं और भगवान शिव के कंठ में नाग सुशोभित है। यह नाग पर विजय या उसके दमन का चित्र नहीं, बल्कि नियंत्रित शक्ति और सामंजस्य का संकेत है। विष को धारण करने वाले शिव के कंठ में विषधर का स्थान यह बताता है कि प्रचंड शक्ति जब मर्यादा में रहती है, तब वह विनाश नहीं, कल्याण का माध्यम बनती है।

महाभारत के आदिपर्व में शेषनाग का चरित्र और भी अर्थपूर्ण रूप में सामने आता है। वे अपने नाग भाइयों के आचरण से विरक्त होकर कठोर तप करते हैं। ब्रह्मा उनके संयम और तप से प्रसन्न होकर उन्हें पृथ्वी को धारण करने का दायित्व देते हैं। जिसे सामान्य दृष्टि केवल विषधर मानती है, हिंदु परंपरा उसी नाग में पृथ्वी का भार सँभालने वाली धैर्यवान शक्ति देखती है।

महाभारत का आस्तीक प्रसंग नागपंचमी के संदेश को और विस्तार देता है। राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई तो उनके पुत्र जनमेजय ने प्रतिशोध में संपूर्ण नागवंश के विनाश के लिए सर्पसत्र आरंभ कर दिया। तब ऋषि आस्तीक ने यज्ञ रुकवाकर नागों को सामूहिक विनाश से बचाया। यह कथा बताती है कि किसी एक के अपराध का दंड पूरे वंश अथवा पूरी प्रजाति को देना धर्मसम्मत नहीं हो सकता। प्रतिशोध की अग्नि जब समूची सृष्टि के संतुलन को नष्ट करने लगे, तब उसे रोकना ही धर्म है।

नागपंचमी का वास्तविक संदेश इसलिए केवल अनिष्ट से बचने के लिए नाग की पूजा करना नहीं है। यह उस जीव के अस्तित्व को स्वीकार करने का संस्कार है, जिससे मनुष्य स्वाभाविक रूप से भयभीत होता है। प्रकृति में सर्पों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे चूहों और अन्य जीवों की संख्या नियंत्रित कर कृषि तथा पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा करते हैं। उनके समाप्त होने का प्रभाव पूरी खाद्य-शृंखला पर पड़ता है।

इस पर्व पर श्रृद्धा के साथ वैज्ञानिक संवेदनशीलता भी आवश्यक है। नागों को पकड़ना, उनका प्रदर्शन करना अथवा उन्हें जबरन दूध पिलाना पूजा नहीं है। साँप का स्वाभाविक आहार दूध नहीं होता। सच्ची नागपूजा यही है कि उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहने दिया जाए, दिखाई देने पर 

प्रशिक्षित सर्पमित्र या वन विभाग की सहायता ली जाए और भय के कारण उनकी हत्या न की जाए।

हिंदु संस्कृति की विशेषता यही है कि वह प्रकृति की केवल सुंदर और सौम्य शक्तियों को प्रणाम नहीं करती; वह प्रचंड, विषैली और भय उत्पन्न करने वाली शक्तियों में भी दैवी तत्व देखती है। नागपंचमी हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति में जो हमारे अनुकूल नहीं है, वह आवश्यक रूप से अनुपयोगी या नष्ट कर देने योग्य नहीं है।

नाग केवल विषधर नहीं है। वह वासुकि के रूप में ईश्वर की विभूति, अनन्त के रूप में सृष्टि का आधार और आस्तीक की कथा में संरक्षण का अधिकारी भी है। नागपंचमी भय से पूजा का नहीं, भय के पार जाकर सह-अस्तित्व स्वीकार करने का पर्व है।


नमोऽस्तु सर्पेभ्यः।

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