Sunday, August 9, 2026

भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल

 भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल 


 विश्व मूलनिवासी दिवस पर विशेष 


 मनोज जोशी 


आज विश्व मूलनिवासी दिवस है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इस दिवस की अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संदर्भ हैं, लेकिन भारत में इसे समझने की दृष्टि हमारी अपनी होनी चाहिए। भारत में मूलनिवासी कौन है? इसका सबसे सहज उत्तर है, हम सब भारतवासी मूलनिवासी हैं।

भारत की धरती किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय की मातृभूमि नहीं है। यह हम सबकी मातृभूमि है। फिर मूलनिवासी की पहचान को किसी एक समाज तक सीमित करके बाकी भारतीयों को उससे अलग खड़ा करने की आवश्यकता ही क्या है?

भेदभाव का कहाँ सवाल,

हम सब भारत माँ के लाल।

यही इस दिन का भारतीय संदेश होना चाहिए।

हमारे वनवासी समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति है। उनकी भाषा, लोक परंपराएं, पर्व, नृत्य, कला और प्रकृति के साथ जीवन जीने की शैली भारत की अमूल्य धरोहर हैं। इस विशिष्टता का पूरा सम्मान होना चाहिए। उनके संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक हितों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा भी होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए यह मान लेना जरूरी नहीं कि केवल वही इस भूमि के मूलनिवासी हैं और शेष भारतीय कोई दूसरी श्रेणी हैं।

यहीं शब्दों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

औपनिवेशिक शासन ने भारत को समझने और उस पर शासन करने के लिए समाज को अनेक जातीय, नस्ली और सामाजिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया। जनगणना से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक भारतीय समाज को अलग-अलग खांचों में देखने की यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। स्वतंत्र भारत को इस विरासत से आगे बढ़कर अपनी सभ्यतागत दृष्टि से समाज को देखना चाहिए जहां विविधता का सम्मान हो, लेकिन विविधता को विभाजन में न बदला जाए।

भारत को जोड़ने वाली अवधारणा यह नहीं हो सकती कि पहले हम यह तय करें कि कौन ‘मूल’ है और कौन नहीं। 

वन में रहने वाला भी इस धरती का पुत्र है और गांव में रहने वाला भी। पहाड़ों में रहने वाला भी और मैदान में रहने वाला भी। शहर में रहने वाला भी उतना ही भारतवासी है जितना किसी दुर्गम वन क्षेत्र में सदियों से अपनी परंपराओं को सहेजकर रखने वाला परिवार।

स्थान अलग हो सकता है, जीवन-पद्धति अलग हो सकती है, पर मातृभूमि अलग नहीं होती।

यही कारण है कि वनवासी समाज को भारत की मुख्यधारा से अलग किसी समानांतर पहचान के रूप में देखने के बजाय भारतीय सभ्यता के अभिन्न अंग के रूप में देखने की आवश्यकता है। गोंड की परंपरा भी भारत की है, भील की भी, बैगा की भी और संथाल की भी। उसी प्रकार तमिल, मराठी, पंजाबी, असमिया, गुजराती, बंगाली और देश की असंख्य अन्य परंपराएं भी भारत की ही हैं।

हम अलग-अलग धाराएं हैं, लेकिन सभ्यता की नदी एक है।

मूलनिवासी शब्द को यदि अधिकार और सम्मान का प्रतीक बनाया जाए तो वह सकारात्मक है। लेकिन उसी शब्द के आधार पर समाज में यह भाव पैदा होने लगे कि कोई इस भूमि पर अधिक मूल है और कोई कम, तो हमें सावधान होना चाहिए। किसी भी भारतीय की भारतीयता को दूसरे की तुलना में कमतर नहीं माना जा सकता।

वनवासी समाज  हमारा अपना है। उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है। उसका गौरव भारत का गौरव है। उसके जंगल और पहाड़ भारत की धरोहर हैं। उसके लोकगीत, देवी-देवता, नायक और परंपराएं भारत माता के विराट स्वरूप का हिस्सा हैं।

इसीलिए मूलनिवासी दिवस को विभाजन की शब्दावली से निकालकर समरसता के उत्सव में बदलने की आवश्यकता है।

न यह किसी एक समाज का अधिकार कम करता है, न किसी की विशिष्ट पहचान मिटाता है। इसके विपरीत यह कहता है, अपनी पहचान पर गर्व कीजिए, अपनी परंपरा बचाइए, अपनी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाइए; लेकिन सबसे ऊपर उस मातृभूमि को याद रखिए जो हम सभी को एक सूत्र में बांधती है।


 कोई वन में, कोई नगर में, 

 कोई पर्वत, कोई मैदान। 

 बोली-वेश भले हों न्यारे, 

 सबकी माता हिंदुस्तान। 


 और इसलिए 

 किसे मूल और किसे पराया, 

 क्यों खींचें ऐसी दीवार? 

 माटी सबकी, माता सबकी, 

 भारत सबका एक परिवार। 

 भेदभाव का कहाँ सवाल, 

 हम सब भारत माँ के लाल।

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