Monday, August 31, 2026

संघ का सुंदर चेहरा और स्वयंसेवक होने का भ्रम

 संघ का सुंदर चेहरा और स्वयंसेवक होने का भ्रम


मनोज जोशी 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन से जो कहा, वह केवल वहां उपस्थित भारतीय समुदाय के लिए दिया गया भाषण नहीं था। वह दुनिया के सामने हिंदु जीवन-दृष्टि और संघ के वास्तविक हिंदुत्व की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी।

मेरे लिए तो इस कार्यक्रम में गर्व करने लायक एक और बात है कि अभाविप में मेरे वरिष्ठ पदाधिकारी रहे वैज्ञानिक डॉ. सुदेश अग्रवाल इस कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका में थे। पिछले दिनों एक पारिवारिक आयोजन में उनसे मुलाकात में इस कार्यक्रम की कार्ययोजना और उद्देश्य के बारे में सामान्य बातचीत भी हुई थी।


29 अगस्त को ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। सत्य एक है, उसकी अभिव्यक्ति के मार्ग अनेक हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई हिंदु यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं रहने चाहिए तो वह हिंदु नहीं रह जाता। हिंदु होने के लिए यह मानना आवश्यक है कि सभी मार्ग उसी सत्य की ओर जाते हैं और प्रत्येक मनुष्य की अपनी गरिमा है।

यह बात संघ के लिए नई नहीं है। संघ के हिंदुत्व में पूजा पद्धति कभी राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं रही। उसका मूल भाव उस भारतीय दर्शन में है, जो कहता है -

“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।”

अर्थात सत्य एक है, विद्वान उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।

डॉ. भागवत देश में अनेक अवसरों पर बता चुके हैं कि हिंदु होना किसी के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि सबको अपना मानने की साधना है। हिंदुत्व किसी समुदाय को मिटाने की घोषणा नहीं, संपूर्ण सृष्टि में एकत्व देखने की दृष्टि है। 

अर्चना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक “हिंदुत्व और गाँधी” में भी हिंदुत्व की यही परिभाषा लिखी गई है। न्यूयॉर्क से उन्होंने इसी विचार को संसार के सामने रखा कि संघ की दृष्टि पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने की है।

लेकिन इस संदेश को दुनिया से पहले भारत में उन लोगों को ध्यान से सुनना चाहिए, जो पिछले कुछ वर्षों में अचानक स्वयंभू स्वयंसेवक बन गए हैं।

इनमें से अनेक लोग कभी शाखा नहीं गए। आज भी नहीं जाते। और न ही संघ प्रेरित संगठनों से जुड़े हैं।संघ की प्रार्थना की दो पंक्तियां ठीक से नहीं गा सकते। गुरु पूर्णिमा पर संघ को एक रुपया गुरु दक्षिणा नहीं देते। संघ के सेवा, संयम, समरसता और अनुशासन से उनका कोई संबंध नहीं है। फिर भी सत्ता के निकट होने, पद पाने अथवा अपनी राजनीतिक पहचान चमकाने के लिए स्वयं को “बाल्यकाल से स्वयंसेवक” बताते हुए उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता।

उनकी कथनी और करनी का संघ की सीख से कोई मेल नहीं है। वे दिनभर मुसलमानों को गालियां देते हैं, मुस्लिम मुक्त समाज की बात करते हैं और सोशल मीडिया पर किसी समुदाय, राजनीतिक दल अथवा व्यक्ति विशेष के विरुद्ध विष उगलते रहते हैं। उन्हें लगता है कि हिंदु होने का सबसे बड़ा प्रमाण किसी मुसलमान से घृणा करना है।

डॉ. भागवत का संदेश ऐसे लोगों के लिए एक कसौटी है।

यदि हिंदु होने की पहली शर्त सभी मार्गों का सम्मान और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा को स्वीकार करना है तो घृणा फैलाने वाला व्यक्ति हिंदुत्व का प्रतिनिधि कैसे हो सकता है? यदि संघ का ध्येय समाज को संगठित करना है तो समाज को धर्म और जाति के नाम पर बांटने वाला उसका स्वयंसेवक कैसे कहलाएगा?

स्वयंसेवक होना कोई परिचय-पत्र नहीं, जीवन साधना है। शाखा केवल मैदान में एक घंटे का कार्यक्रम नहीं, व्यक्ति के भीतर अनुशासन, आत्मसंयम, सेवा और समाज के प्रति आत्मीयता उत्पन्न करने की प्रक्रिया है। संघ का गणवेश पहन लेना आसान है, लेकिन संघ को अपने आचरण में उतारना कठिन है।

विडंबना यह है कि संघ के विरोधियों से अधिक नुकसान कई बार वे लोग करते हैं, जो संघ का मुखौटा लगाकर अपने निजी नफरती एजेंडे को उसका विचार बताने लगते हैं। उनके शब्दों से समाज में संघ की वही छवि बनती है, जिसका संघ स्वयं प्रतिपादन नहीं करता। वे न हिंदु धर्म की व्यापकता समझते हैं, न संघ की साधना और न उस भारत को, जिसकी आत्मा विविधता में एकता है।

इसलिए सच्चे हिंदुओं, समर्पित स्वयंसेवकों और स्वयं संघ को ऐसे जबरिया बने स्वयंसेवकों से सतर्क रहना होगा। संघ का नाम किसी को गाली देने का अधिकार-पत्र नहीं है। हिंदुत्व किसी के प्रति घृणा की अनुमति नहीं देता।

डॉ. मोहन भागवत को सुनिए, उनके शब्दों का अर्थ समझिए और उन्हें अपने जीवन में उतारिए। संघ की आड़ में अपने नफरती एजेंडे को संघ का चेहरा मत बनाइए।

संघ का वास्तविक चेहरा घृणा का नहीं, आत्मीयता का है। वह चेहरा सचमुच बहुत सुंदर है।


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