Sunday, August 9, 2026

एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक

 एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक 


संस्कृत की सुभाषित परंपरा का एक प्रसिद्ध श्लोक है,

 पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।

शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा पुरुषःपञ्चलक्षणः॥


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने युवाओं से बातचीत में इस सुभाषित का उल्लेख किया।


अगर इसे आज की जिंदगी और मैनेजमेंट की भाषा में समझें, तो मेरी समझ से यह एक तरह से लीडरशिप का पाँच सूत्रीय मॉडल है।


1.पहला सूत्र है - संसाधन सही जगह लगाइए। “पात्रे त्यागी” का मतलब सिर्फ दान देना नहीं है। इसका अर्थ है कि आपका समय, पैसा, ऊर्जा और भरोसा उस व्यक्ति या काम पर लगे, जहां उसका सही उपयोग हो। अच्छे मैनेजर और अच्छे इंसान की पहचान यही है कि वह केवल देता नहीं, बल्कि सही जगह देता है।


2.दूसरा सूत्र - टैलेंट और अच्छाई को पहचानिए। “गुणे रागी” कहता है कि अच्छे गुणों से प्रेम होना चाहिए। किसी टीम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि कौन आपके करीब है, बल्कि यह है कि कौन योग्य है, कौन मेहनती है और कौन बेहतर काम कर रहा है। जो व्यक्ति गुणों की कद्र करता है, उसके आसपास अच्छे लोग अपने-आप जुड़ने लगते हैं।


3.तीसरा सूत्र - सफलता अकेले मत रखिए। “संविभागी च बन्धुषु” का सीधा संदेश है कि उपलब्धि, अवसर और श्रेय साझा कीजिए। किसी भी टीम में भरोसा तब बनता है, जब नेता सफलता का श्रेय बाँटता है और मुश्किल समय की जिम्मेदारी खुद भी लेता है।


4.चौथा सूत्र - जानकारी नहीं, समझ विकसित कीजिए। “शास्त्रे बोद्धा” का अर्थ है विषय को समझना। आज हमारे पास जानकारी की कमी नहीं है। फर्क इस बात से पड़ता है कि कौन उस जानकारी का सही अर्थ निकालता है, सही निर्णय लेता है और उसे काम में बदलता है। यही ज्ञान और सिर्फ सूचना के बीच का अंतर है।


5.पाँचवां सूत्र - संकट में नेतृत्व दिखाइए। “रणे योद्धा” का अर्थ केवल युद्ध नहीं है। जीवन और कामकाज में असली रण वह समय है जब परिस्थितियां आपके पक्ष में न हों। दबाव हो, असफलता सामने हो या कठिन फैसला लेना पड़े। अच्छे समय में सब नेतृत्व कर सकते हैं, लेकिन लीडर की असली पहचान संकट के समय होती है।


यही इस श्लोक की आधुनिक उपयोगिता है। सही जगह निवेश, प्रतिभा की पहचान, सफलता की साझेदारी, गहरी समझ और संकट में साहस -ये पाँच गुण किसी व्यक्ति को केवल सफल नहीं, बल्कि प्रभावी लीडर बनाते हैं।

भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल

 भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल 


 विश्व मूलनिवासी दिवस पर विशेष 


 मनोज जोशी 


आज विश्व मूलनिवासी दिवस है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इस दिवस की अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संदर्भ हैं, लेकिन भारत में इसे समझने की दृष्टि हमारी अपनी होनी चाहिए। भारत में मूलनिवासी कौन है? इसका सबसे सहज उत्तर है, हम सब भारतवासी मूलनिवासी हैं।

भारत की धरती किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय की मातृभूमि नहीं है। यह हम सबकी मातृभूमि है। फिर मूलनिवासी की पहचान को किसी एक समाज तक सीमित करके बाकी भारतीयों को उससे अलग खड़ा करने की आवश्यकता ही क्या है?

भेदभाव का कहाँ सवाल,

हम सब भारत माँ के लाल।

यही इस दिन का भारतीय संदेश होना चाहिए।

हमारे वनवासी समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति है। उनकी भाषा, लोक परंपराएं, पर्व, नृत्य, कला और प्रकृति के साथ जीवन जीने की शैली भारत की अमूल्य धरोहर हैं। इस विशिष्टता का पूरा सम्मान होना चाहिए। उनके संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक हितों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा भी होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए यह मान लेना जरूरी नहीं कि केवल वही इस भूमि के मूलनिवासी हैं और शेष भारतीय कोई दूसरी श्रेणी हैं।

यहीं शब्दों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

औपनिवेशिक शासन ने भारत को समझने और उस पर शासन करने के लिए समाज को अनेक जातीय, नस्ली और सामाजिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया। जनगणना से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक भारतीय समाज को अलग-अलग खांचों में देखने की यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। स्वतंत्र भारत को इस विरासत से आगे बढ़कर अपनी सभ्यतागत दृष्टि से समाज को देखना चाहिए जहां विविधता का सम्मान हो, लेकिन विविधता को विभाजन में न बदला जाए।

भारत को जोड़ने वाली अवधारणा यह नहीं हो सकती कि पहले हम यह तय करें कि कौन ‘मूल’ है और कौन नहीं। 

वन में रहने वाला भी इस धरती का पुत्र है और गांव में रहने वाला भी। पहाड़ों में रहने वाला भी और मैदान में रहने वाला भी। शहर में रहने वाला भी उतना ही भारतवासी है जितना किसी दुर्गम वन क्षेत्र में सदियों से अपनी परंपराओं को सहेजकर रखने वाला परिवार।

स्थान अलग हो सकता है, जीवन-पद्धति अलग हो सकती है, पर मातृभूमि अलग नहीं होती।

यही कारण है कि वनवासी समाज को भारत की मुख्यधारा से अलग किसी समानांतर पहचान के रूप में देखने के बजाय भारतीय सभ्यता के अभिन्न अंग के रूप में देखने की आवश्यकता है। गोंड की परंपरा भी भारत की है, भील की भी, बैगा की भी और संथाल की भी। उसी प्रकार तमिल, मराठी, पंजाबी, असमिया, गुजराती, बंगाली और देश की असंख्य अन्य परंपराएं भी भारत की ही हैं।

हम अलग-अलग धाराएं हैं, लेकिन सभ्यता की नदी एक है।

मूलनिवासी शब्द को यदि अधिकार और सम्मान का प्रतीक बनाया जाए तो वह सकारात्मक है। लेकिन उसी शब्द के आधार पर समाज में यह भाव पैदा होने लगे कि कोई इस भूमि पर अधिक मूल है और कोई कम, तो हमें सावधान होना चाहिए। किसी भी भारतीय की भारतीयता को दूसरे की तुलना में कमतर नहीं माना जा सकता।

वनवासी समाज  हमारा अपना है। उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है। उसका गौरव भारत का गौरव है। उसके जंगल और पहाड़ भारत की धरोहर हैं। उसके लोकगीत, देवी-देवता, नायक और परंपराएं भारत माता के विराट स्वरूप का हिस्सा हैं।

इसीलिए मूलनिवासी दिवस को विभाजन की शब्दावली से निकालकर समरसता के उत्सव में बदलने की आवश्यकता है।

न यह किसी एक समाज का अधिकार कम करता है, न किसी की विशिष्ट पहचान मिटाता है। इसके विपरीत यह कहता है, अपनी पहचान पर गर्व कीजिए, अपनी परंपरा बचाइए, अपनी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाइए; लेकिन सबसे ऊपर उस मातृभूमि को याद रखिए जो हम सभी को एक सूत्र में बांधती है।


 कोई वन में, कोई नगर में, 

 कोई पर्वत, कोई मैदान। 

 बोली-वेश भले हों न्यारे, 

 सबकी माता हिंदुस्तान। 


 और इसलिए 

 किसे मूल और किसे पराया, 

 क्यों खींचें ऐसी दीवार? 

 माटी सबकी, माता सबकी, 

 भारत सबका एक परिवार। 

 भेदभाव का कहाँ सवाल, 

 हम सब भारत माँ के लाल।

Wednesday, April 5, 2023

प्लास्टिक की पन्नी और मन्नत : हिंदु संस्कृति की परंपरा में विकृति



प्लास्टिक की पन्नी और मन्नत : हिंदु संस्कृति की परंपरा में विकृति

#मनोज_जोशी



 


पिछले सप्ताह संयोग से चैत्र शुक्ल अष्टमी पर यानी बुधवार को कर्फ्यू वाली माता के मंदिर में दर्शन के लिए परिवार के साथ पहुंच गया। बिना किसी योजना के ऐसे पहुंचा जैसे स्वयं माता ने बुलाया हो। और यहाँ शेर के पाँव में बड़ी संख्या में पन्नी बंधी हुईं दिखी। याद आया कि कुछ दिन पहले ही Dainik Bhaskar में खबर छपी थी कि मन्नत के लिए यहाँ लोग शेर के पाँव में प्लास्टिक की पन्नी बांध रहे हैं। कलावा और चुनरी बांधना तो सुना था, प्लास्टिक की पन्नी की बात पहली बार सुनी तो अजीब सा लगा। और फिर उस दिन देख लिया तो मन खिन्न हो गया।

आखिर पन्नी बांधने की परंपरा कहाँ से आ गई।

मुझे अपने बचपन की दो घटनाएं याद आ गईं। 

1.घर के पास कालीजी का मंदिर था और उसी में हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित हो गई थी। कई मित्र खास तौर से गणित की परीक्षा वाले दिन हनुमान जी के दर्शन करने जाते और उनसे परीक्षा में पास कराने की प्रार्थना करते। अपने राम को कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई। बाद के वर्षों में उस मंदिर में और शहर के दूसरे हनुमान मंदिरों में चिट्ठियां चिपकने लगीं।

यह चिट्ठी परिणाम को कितना प्रभावित करती है पता नहीं ... लेकिन भक्त और भगवान के रिश्ते में भावनात्मक लगाव इतना होता है कि इस चिट्ठी को आस्था और विश्वास का प्रकटीकरण मानकर स्वीकार कर लिया।

और फिर इसमें कोई बुराई भी नहीं। भक्त अपने ढंग से अपने मन की बात भगवान से कहा रहा है। कई बार तो यह चिट्ठियां बहुत मार्मिक भी होती हैं।


2. यह किस्सा बिल्कुल प्लास्टिक की पन्नी जैसा ही है। घर पर माँ के स्पष्ट निर्देश थे कि भगवान को चीनी के बर्तन में भोग नहीं लगेगा। वो कहती थीं चीनी का बर्तन शुद्ध नहीं है, भगवान उसके भोग को स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन बचपना तो बचपना होता है, जैसा कहा वैसा मान लिया तो काहे के बच्चे। अपने राम ने एक दिन पूजा की और चीनी की प्लेट में भोग लगा दिया। पता नहीं क्या हुआ वह चीनी की प्लेट नीचे गिर कर टूट गई और भोग सामग्री जमीन पर फैल गई। उस घटना से यह बात मन में कहीं बैठ गई कि वाकई चीनी के बर्तन में भगवान भोग स्वीकार नहीं करते।

अब वापस पन्नी वाली बात पर आता हूँ।‌ यह तो हम सब जानते हैं कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए घातक है। और जो पर्यावरण के लिए घातक है उसे ईश्वर कैसे स्वीकार करेंगे ? हम तो हिंदु संस्कृति के वाहक हैं। प्रकृति के हर अंग पेड़ पौधे पशु पक्षी सब में देवताओं का वास मानने वाला हिंदु समाज उस पॉलिथीन को बांध कर मन्नत मांग रहा है जिसके खाने से गौ माता बीमार पड़ रहीं हैं। गौ माता में तो सभी देवताओं का वास हैं। और केवल गौ माता क्यों भगवान विष्णु के दशावतार का ध्यान कीजिए मछली से लेकर मानव तक सब में विष्णु अवतार का अंश मौजूद हैं। 

आखिर इसका आधार क्या है? और दुख का विषय यह है कि यह उस मंदिर में हो रहा है जिसकी स्थापना के लिए हमारी पुरानी पीढ़ी ने संघर्ष किया, कर्फ्यू लगा इसीलिए तो कर्फ्यू वाली माता का मंदिर नाम प्रचलित हुआ।

और मंदिर की स्थापना क्यों होती है ? संस्कृति की रक्षा के लिए ही ना ? फिर यह पन्नी बांध कर क्या हम रक्षा कर रहे हैं? इस पर विचार नितांत आवश्यक है।

हिंदु religion नहीं संस्कृति है, जीवनशैली है। यह परिवर्तनशील है इसीलिए युगों तक अक्षुण्ण है। इसकी अक्षुण्णता को बनाए रखने के लिए विकृतियों को भी रोकना होगा।


एक गीत जिसने १९८० के दशक के अंतिम वर्षों में मुझे प्रेरणा दी उसके बोल थे

"रुढ़ियों को तोड़ दो, परंपराएं मोड़ दो

जिसमें देश का भला न हो

वो हर काम छोड़ दो"

मुझे लगता है इसमें एक बात और जोड़ना पड़ेगी

"विकृतियों को रोक दो"

Monday, February 6, 2023

‘परंम् वैभवम नेतुमेतत्वस्वराष्ट्रं’

‘परंम् वैभवम नेतुमेतत्वस्वराष्ट्रं’


यानी राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाना है. अगर आप मुझसे पूछें कि यह कैसे होगा? तो मेरा स्पष्ट मत यह है कि जाति व्यवस्था को समाप्त करना होगा और इसकी शुरुआत जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करके होगी।

एक ही मंदिर, एक जलाशय, सबका एक श्मशान हो। जब तक यह एकता नहीं आएगी। जाति के आधार पर श्रेष्ठता और निम्नता के भाव जब तक समाप्त नहीं होंगे, हम परम वैभव के लक्ष्य को नहीं पा सकते। हमारे सांस्कृतिक इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं जो साबित करते हैं कि प्राचीन वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी, जन्म आधारित नहीं। बाद में यह जन्म आधारित जाति व्यवस्था में बदल गई।

अक्तूबर, 2003 में नागपुर में अपने विजयादशमी उद्बोधन में संघ के पांचवें सरसंघचालक सुदर्शन जी ने कथित दलित समस्या पर कहा, 'अपने ही समाज के एक वर्ग को दलित जैसे घृणित शब्द से संबोधित करना कहां तक उचित है? वास्तव में जो लोग विकास के निम्न स्तर पर हैं उनमें ऊपर उठने का आत्मविश्वास जगाना पहली आवश्यकता है। हमारी सोच यह है कि यह कार्य समाज को स्वयं करना होता है और यह कार्य तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित नेता लोग नहीं कर सकते। इस कार्य को सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व को अपने हाथ में लेना चाहिए।'

संघ के चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया एक जगह लिखते हैं -'इस देश का हिन्दू समाज हजारों वर्षों तक समृद्धि एवं वैभव का जीवन जीने के बाद ईसा की नवमी और दशमी शताब्दियों में ऐसी रुढ़िग्रस्त अवस्था में पहुंच गया जहां गुण-कर्म पर आधारित वर्ण एवं जाति व्यवस्था को ऊंच-नीच का पर्याय मानकर हमारे ही लोगों ने राष्ट्र के उत्थान में बाधाएं खड़ी कर दीं। परिणामत: हिन्दू समाज अनेक प्रकार से विभक्त हो गया और राष्ट्र को निरंतर आठ सौ वर्षों तक परकीयों की दासता सहनी पड़ी।'

संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस का तो यह वाक्य प्रसिद्ध है - "यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है तो संसार में कुछ भी पाप नहीं है।"

बालासाहब देवरस ने 1986 राष्ट्रीय सेविका समिति के स्वर्ण जयंती समारोह में दिए भाषण में कहा था 'जाति-व्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिए. हिंदू समाज की जातिप्रथा समाप्त होने पर सारा संसार हिंदू समाज को वरण करेगा. इसके लिए भारतीय महिला समाज को पहल अपने हाथ में लेकर अपने घर से ही अंतरजातीय और अंतरप्रांतीय विवाह की शुरुआत करनी चाहिए.'

द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी कहते थे - ‘चातुर्वर्ण्य में न तो किसी वर्ण का अस्तित्व है और न ही किसी जाति का. आज तो हम सभी का एक ही वर्ण और एक ही जाति है और वह है हिंदू.’

संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने कहा ‘हम अस्पृश्यता दूर करने की बात नहीं करते बल्कि हम स्वयंसेवकों को इस प्रकार विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम सभी हिंदू हैं और एक ही परिवार के सदस्य हैं. इससे किसी भी स्वयंसेवक में इस तरह का विचार नहीं आता है कि कौन किस जाति का है?’

#मनोज_जोशी

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Friday, January 13, 2023

गाँधी - गोडसे : आखिर वैचारिक असहमति हत्या का अधिकार तो नहीं देती


 #मनोज_जोशी 

फिल्म डायरेक्टर राजकुमार संतोषी की आने वाली फिल्म गांधी-गोडसे एक युद्ध का ट्रेलर रिलीज होने के दो दिन बाद ही इसका विरोध शुरु हो गया है। और इस विरोध के साथ ही गांधीजी और गोडसे को लेकर चलने वाली बहस एक बार फिर आम हो गई है। 

पिछले महीने मेरी पुस्तक "हिंदुत्व और गाँधी" का लोकार्पण हुआ है। इस पुस्तक के लेखन के लिए जब मैं अध्ययन कर रहा था तो स्वाभाविक रूप से गोडसे के बारे में काफी कुछ समझा और पढ़ा। 

लेकिन अंत में मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि गोडसे का पक्ष सामने लाना और उस पर चर्चा करना वास्तव में हिंदुत्व का नुक़सान ही है। और यही वज़ह है कि मैंने अपनी पुस्तक में गोडसे का जिक्र नहीं किया, बल्कि मैं उसका नाम भी लेना उचित नहीं समझता।

लेकिन इस विवाद को देखते हुए आज कुछ ऐसी बातें जो किताब में नहीं लिखी और कुछ ऐसी जो उसमें लिखी है सब मिलाकर अपनी बात कहना चाहता हूं। 

यह बात सही है कि नाथूराम गोडसे के बयान वाले दिन यानी ८ नवम्बर १९४८ को अदालत में काफी भीड़ थी और गोडसे का बयान सुनते हुए अदालत में मौजूद लोगों की आँखें नम हो गई थी। १० फरवरी १९४९ को गोडसे को फाँसी की सजा सुनाते हुए जस्टिस जीडी खोसला ने लिखा कि .."मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित दर्शकों को संगठित कर ज्यूरी बना दिया जाता। इसके साथ ही उन्हें नाथूराम गोडसे पर फैसला सुनाने को कहा जाता, तो भारी बहुमत के आधार पर गोडसे 'निर्दोष' (Not Guilty) करार दिया जाता। 

लेकिन मेरी मान्यता है कि इतने भर से गोडसे का अपराध तो कम नहीं हो जाता। यह भी सच है कि गाँधीजी विभाजन को नहीं रोक पाए और विभाजन के बाद और पहले गाँधीजी के कई फैसलों से हम असहमत हो सकते हैं। लेकिन इस असहमति का अर्थ क्या है कि हम जिससे असहमत हैं उसकी हत्या कर दें। यह तो जंगलराज ही होगा। एक तथ्य यह भी है कि गाँधीजी स्वयं इस आजादी से खुश नहीं थे और वह दिल्ली में हुए आजादी के जश्न में शामिल नहीं हुए थे।‌ शायद वे विभाजन को मन से स्वीकार नहीं कर सके थे । इसलिए ऐसी व्यवस्था चाहते थे कि दोनों देशों में बिना पासपोर्ट वीजा के आना-जाना हो सके

यदि आप हिंदुत्व की बात करें तो एक परिभाषा यह भी है - जिसका ह्रदय इंदु यानी चंद्रमा के समान पवित्र है वह हिंदु है। चंद्रमा के समान पवित्र हृदय वाला व्यक्ति तो असहमति पर हत्या नहीं करेगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ विचारक स्व एमजी वैद्य के एक बयान का मैंने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है। एमजी वैद्य ने कहा है ...'मैं नाथूराम गोडसे का सम्मान करने और उन्हें सम्मान देने के खिलाफ हूँ. वह एक हत्यारा है। इसके आगे वे और भी महत्वपूर्ण बात कहते हैं - 'कुछ लोग कहते हैं कि इससे (गोडसे के महिमामंडन) हिंदुत्व का गौरव बढ़ेगा। नहीं इससे हिंदुत्व का नाम खराब होगा...मैं तो यहां तक कहता हूं कि गांधी की हत्या से हिंदुत्व को नुकसान पहुंचा है।'

वैद्य ने गाँधीजी के विचारों को लेकर असहमति को भी स्वीकारा और कहा, 'महात्मा गांँधी ने अपने जीवनकाल में आजादी के बारे में जागरूकता फैलाई। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम उनकी सभी नीतियों से सहमत हों। लेकिन विचारों की लड़ाई को विचार से लड़ा जाना चाहिए, इसके लिए खून की होली खेलने की इजाजत नहीं दी जा सकती।'

कुछ और तथ्य जिनका पुस्तक में जिक्र है वह भी दोहराना चाहूंगा। महात्मा गाँधी की हत्या की जानकारी मिलने पर गुरु गोलवलकर जी की पहली प्रतिक्रिया थी "यह देश का दुर्भाग्य है।" उन्होंने 13 दिन तक शोक मनाने की घोषणा की।‌ 

इसके बावजूद संघ पर प्रतिबंध लगा। गाँधीजी की हत्या के पाँचवें दिन संघ पर हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने का आरोप लगाकर ४ फरवरी १९४८ को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

११ जुलाई १९४९ को यह प्रतिबंध उठा लिया गया, जबकि गाँधीजी की हत्या पर अदालत का फैसला संघ से प्रतिबंध हटाने के लगभग ४ महीने बाद ८ नवंबर १९४९ को आया। क्या इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि सरकार को अपनी गलती का एहसास हो गया था।

 यदि आप गांधी जी की हत्या को लेकर आज भी संघ पर आरोप लगाते हैं या गोडसे को संघ से जोड़ते हैं तो यह सुप्रीम कोर्ट का अपमान है और उस समय की सरकार का अपमान है। संघ तो आज भी रोजाना अपने प्रातः स्मरण में गाँधीजी को याद करता है।

बात यहीं खत्म नहीं होती मैं तो यह पूछना चाहता हूँ कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के नाती जीवी केतकर पर गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र की जानकारी होने का आरोप लगाते समय लोगों को शर्म नहीं आई क्या? उन पर हत्या के षड्यंत्र की जानकार छिपाने के आधार पर रासुका लगाई गई। इसके बाद एक आयोग बना। आयोग की रिपोर्ट केतकर के साथ सावरकर और संघ को भी निर्दोष साबित करती है।

(फोटो साभार गूगल)





Thursday, July 7, 2022

सवाल यह है कि इन सवालों के जवाब कौन देगा

सवाल यह है कि इन सवालों के जवाब कौन देगा

#मनोज_जोशी

बुधवार को भोपाल में नगर निगम चुनाव के लिए मतदान हो गया। अब हर जुबान पर दो ही प्रश्न हैं। महापौर कौन बन रहा है ?और परिषद किसकी बनेगी ? वैसे सैद्धांतिक बात तो यह है कि अगर यह पता ही होता तो चुनाव क्यों कराते? सीधे ही महापौर और हर वार्ड में पार्षद घोषित कर देते 😊  इसी प्रश्न का जवाब तलाशने के लिए ही तो चुनाव हुआ है। मतगणना होगी और सच सामने आ जाएगा।


लेकिन इस पूरे चुनाव में और खास तौर से मतदान वाले दिन के माहौल को देखकर मेरे मन में कुछ बातें हैं। कांग्रेस के बारे में तो शुरू से यही कहा जाता है कि वहां कैंडिडेट चुनाव लड़ता है और इस बात से कोई भी इनकार नहीं करेगा कि महापौर पद के लिए  कांग्रेस के पास विभा पटेल से बेहतर कोई और उम्मीदवार नहीं था।

लेकिन भाजपा में तो ऐसा ही कहा जाता रहा है कि संगठन चुनाव लड़ता है। देवतुल्य कार्यकर्ताओं के इस संगठन में लगी हुई घुन नेताओं को दिखे या ना दिखे आम आदमी को तो दिखने लगी है। मतदाता सूची में अपना नाम तलाशने के लिए लोग यहां-वहां भटक रहे थे और नाम नहीं मिलने पर निराश और नाराज़ होकर लौट रहे थे। जिन इलाकों को भाजपा का कोर वोटर वाला इलाका माना जाता है, वहां भी सैकड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब हो गए। मेरा मन यह प्रश्न पूछ रहा था कि जिस पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष भी खुद को अपने बूथ की मतदाता सूची का पन्ना प्रभारी बताता है, उस देवतुल्य कार्यकर्ता को यह क्यों नहीं पता चला कि उसके पन्ने से लोगों के नाम कट गए हैं। आखिर देवतुल्य यानी देवता के समान का वह कार्यकर्ता कहां अपनी पूजा करा रहा था ? या मंच से जिसे देवतुल्य कहा जाता है उसे भक्त तो छोड़िए चाटुकार बनने के लिए मजबूर कर दिया गया है। गले में गमछा डाल कर पार्टी के बड़े नेताओं के आसपास चक्कर लगाना, दिन भर नेता जी के बंगले के बाहर या प्रदेश कार्यालय में खड़े होकर गपशप करना और हमेशा राजनीतिक समीकरणों पर ही चर्चा करना यही राजनीतिक गतिविधि रह गई है। पार्टी के कार्यक्रम आते हैं, पैसा देकर फ्लेक्स बन जाते हैं, ठेकेदार उन्हें लगा देता है और सत्ता में है इसलिए किसी न किसी बहाने से प्रशासन भीड़ जुटा देता है। नतीजा उस कार्यकर्ता का अपने क्षेत्र की जनता या मतदाता से सीधा संपर्क ही नहीं हो पाता। कुल मिलाकर इस सब में हुआ यह कि जब मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा था तब बड़े नेता जी ने ध्यान नहीं दिया और कार्यकर्ता को आदेश नहीं मिला इसलिए उसने कुछ नहीं किया। कुछ शातिर दिमाग लोगों ने अपने विरोधियों के नाम कटवा दिए। पार्टी के भीतर मची सिर फुटौव्वल का एक उदाहरण ऐसा भी है जिसमें प्रबल दावेदार का नाम ही मतदाता सूची से कटवा दिया गया जब तक वह जागे तब तक देर हो चुकी थी नतीजा टिकट मिलने के बाद भी वापस करना पड़ा। पार्षदों के टिकट वितरण में किस क्षेत्र में किस नेता ने, किसके लिए, कितना जोर लगाया और अपने मनपसंद उम्मीदवार को टिकट नहीं मिलने पर पूरे प्रचार के दौरान उन नेता जी ने और उनसे जुड़े कार्यकर्ताओं ने कितना काम किया इसका विश्लेषण करेंगे तो हर विधानसभा क्षेत्र में मतदान के प्रतिशत की हकीकत सामने आ जाएगी।

प्रशासन ही सब कुछ करेगा इस मानसिकता के नतीजे का व्यक्तिगत उदाहरण देता हूं। महापौर और पार्षदों के लिए पहली बार हुए आरक्षण के समय जब मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा था, मुझे अपना नाम मतदाता सूची में नहीं मिला। मैंने आवेदन दिया और वार्ड 82 में नाम जुड़ गया, जबकि मैं वार्ड 83 में निवास करता हूं। सभी संबंधित अधिकारियों को बताने के बावजूद मुझे भी कल वार्ड 82 में वोट डालने जाना पड़ा। मेरे पते के आधार पर वहां नाम नहीं मिल रहा था क्योंकि पता तो 83 नंबर का था। कुछ देर मशक्कत के बाद नाम मिला और मैं वोट डाल पाया। सवाल यह है कि वार्ड 82 के पार्षद प्रत्याशी से मेरा क्या लेना देना ? और इस उदाहरण से यह भी समझ में आता है कि प्रशासन ने नाम जोड़ने घटाने में कितनी रूचि ली होगी।

इसी तरह की एक और बात। निर्वाचन आयोग ने नियम बना दिया है कि पर्चियां भी बीएलओ बांटेंगे। बीएलओ यानी सरकारी बाबू जिनकी आदत दफ्तर में बैठकर काम करने की है वह चाह कर भी घर-घर घूम कर पर्चियां नहीं बांट सकते। यदि राजनीतिक कार्यकर्ता घर-घर जाकर पर्चियां बांटें तो इसमें क्या परेशानी है ? यह मेरे समझ में तो नहीं आता। 

चुनाव परिणाम चाहे जो हों लेकिन सभी प्रश्न जवाब मांगेंगे। आखिर सवा साल बाद विधानसभा के चुनाव भी होना है। 



Monday, October 25, 2021

बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं.....

 बचपन जैसी दिवाली  मनाते हैं.....


हुई करवा चौथ अब साफ़-सफाई में जुट जाते हैं

चूने और नील वाली बात हुई पुरानी तो क्या,

बाजार से ऑइल पेंट लाकर खुद पुताई करते हैं

अलमारी खिसकाएं शायद कोई खोई चीज़ 

वापस  मिल जाए, और हम मुस्कराएं

जैसे बचपन में खिलौना मिल जाता था

और हम इठलाते थे

आओ, बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

घर का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं 

दौड़- दौड़  के घर का हर सामान लाते हैं 

कुछ पैसे पटाखों के लिए बचाते हैं

आओ, बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

बैरागढ़ जाकर थोक की दुकान से पटाखे लाते है

मुर्गा ब्रांड , लक्ष्मी बम और रस्सी बम और सांप की गोली लेकर आते हैं

दो -तीन दिन तक पटाखे  छत धूप में सुखाते हैं

बार-बार सब दोस्तों के पटाखे गिनते जाते है

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं 

मोहल्ले से निकल कर न्यू मार्केट की रौनक देखने जाते हैं

दुकान पर रखी  चीजों को उठाते हैं

और रेट पूछकर वापस रख देते हैैं

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं 

बिजली की सिरीज़ और कैंडल लटकाते है

याद करो

केसे सिरीज बनाते थे, छत से लटकाते थे

मास्टर  बल्ब लगाते थे

टेस्टर रखकर पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते थे

एक बार फिर दो-चार बिजली के झटके भी  खाते हैं

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

धनतेरस के दिन कटोरदान लेकर आते हैं

घर पर बने चकली गुजिया  खाते हैं

प्रसाद की  थाली   पड़ोस में  देने जाते हैं

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

खील में से  धान बिनवाते हैं 

खांड  के खिलोने के साथ धान खाते है 

अन्नकूट की तैयारी में हाथ बंटाते हैं

नए नए पकवान खाते हैं

भैया-दूज के दिन बहन से तिलक करवाते हैं 

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

दिवाली बीत जाने पर बिन फूटे पटाखों का बारूद जलाते हैं घर की छत पे जले हुए राकेट पाते हैं 

बचपन के सारे दोस्त इकट्ठा हो जाते हैं

 चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं