Wednesday, June 9, 2021

बिरसा तुम्हें आना होगा

"यह धरती हमारी है, हम इसके रक्षक हैं। हर अन्याय के खिलाफ उलगुलान। यही पुरखों का रास्ता है।अप्राकृतिक ताकतों के खिलाफ एकजुट हो जाओ। उठो प्रकृति नेतुम्हे जीने के लिए सभी हथियार दिये हैं। मैं सभी दिशाओ से पुकार रहा हूँ।" - बिरसा मुंडा


वनवासी समाज के भगवान बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है। बिरसा यानी एक ऐसा योद्धा, स्वतन्त्रता सेनानी , समाज सुधारक जिसके बारे में वनवासी आज भी मानते हैं कि वह लौट कर आएगा।

1895 से 1900 तक बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ‘ऊलगुलान’ चला. आदिवासियों को लगातार जल-जंगल-ज़मीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किया जाता रहा और वे इसके खिलाफ आवाज उठाते रहे।

 बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन के हक  की लड़ाई छेड़ी । बिरसा ने सूदखोर महाजनों के ख़िलाफ़ भी आंदोलन का ऐलान किया. ये महाजन, जिन्हें वे दिकू कहते थे, क़र्ज़ के बदले उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेते थे. यह सामान्य विद्रोह नहीं बल्कि वनवासी अस्मिता और संस्कृति  के संरक्षण के साथ साथ स्वायत्तता का संग्राम था।

बिरसा ने छापामार लड़ाई का सहारा लिया. रांची और उसके आसपास के इलाकों में पुलिस में  बिरसा का आतंक हो गया। जब बिरसा पकड़ में नहीं आए तो  अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने के लिए पांच सौ रुपये का इनाम रखा था जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी.  बिरसा की ही जाति के लोगों ने उन्हें पकड़वा दिया।

‘उलगुलान’ के रुमानीवाद को साहित्य और जंगल से निकलकर साम्यवाद के हाथों में लाने वाले चारू मजुमदार, कनु सान्याल और जगत संथाल ने इसे नक्सलवाद का रंग दे दिया। ‘नक्सलवाद’ शब्द पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से निकला। पं. बंगाल के हाल के विधानसभा चुनाव के परिणाम चाहे जो रहा हो, लेकिन एक बात जिस पर शायद कम ही लोगों का ध्यान गया कि नक्सलबाड़ी के लोगों ने भी अब कम्युनिज्म को नकार दिया है।

बिरसा मुंडा के जीवन और उनके संघर्ष को समझेंगे तो पता चलेगा कि बिरसा मुंडा वनवासियों को उनके अधिकार दिलाने के साथ उन्हें संस्कृति से भी जोड़ कर रखना चाहते थे।

 बिरसा का जन्म वर्तमान झारखण्ड प्रदेश के  अड़की प्रखंड अंतर्गत ग्राम – उलीहातु में 15 नवंबर 1875 को हुआ था।  बिरसा के जन्म के बहुत दिन पहले ही उसके बड़े पिता कानू उलिह्तू में ईसाई बन चुके थे। इनका मसीही नाम पौलूस था। बिरसा के पिता सुगना और उसके छोटे भाई फसना ने बम्बा में जाकर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। यहाँ तक की सुगना तो जर्मन ईसाई मिशन के प्रचारक भी बन गए थे। इसलिए बिरसा भी अपने पिता के साथ ईसाई हो गये। सुगना का मसीही नाम मसीहदस  और बिरसा का दाऊद मुंडा पड़ा।

बिरसा अपनी मौसी का बड़ा प्यारा था। वे उसे अपने साथ अपने गांधी खटंगा ले गईं । यहाँ एक ईसाई प्रचारक से उनका संपर्क हुआ। वह प्रचारक मुंडाओं की पुरानी धर्म (पंथ/ संप्रदाय/ उपासना पद्धति  ) व्यवस्था की आलोचना किया करता था। यह बिरसा को अच्छा नहीं लगा। नाराज बिरसा वहां से  बुडजो स्थित जर्मन मिशन स्कूल में भर्ती हो गया और  निम्न प्राथमिक (lower primary) की शिक्षा के लिए जर्मन ईसाई मिशन स्कूल चाईबासा में एडमिशन ले लिया । यह 1886 से 1890 के बीच का घटनाक्रम है। उस समय जर्मन – लूथेरन और रोमन कैथोलिक ईसाईयों के भूमि आन्दोलन चल रहे थे। एक दिन चाईबासा मिशन में उपदेश देते हुए डॉ. नोट्रेट ने ईश्वर के राज्य के सिद्धांत पर उपदेश दिया।  डॉ. नोट्रोट ने वनवासियों से कहा  कि यदि वे ईसाई बने रहेंगे और और उनके निर्देशों का पालन करते रहेंगे तो उनकी छिनी हुई जमीन वापस कर दी जाएगी। यह बात बिरसा और अन्य लोगों को नागवार गुजरी। बिरसा ने उसी समय डॉ. नोट्रोट और मिशनरियों की  बहुत ही तीखे शब्दों में आलोचना की। इसका नतीजा यह हुआ कि बिरसा को स्कूल से निकाल दिया गया। इस घटना के बाद बिरसा ने नारा दिया -  "साहब - साहब एक टोपी हे।"  यानी  गोरे अंग्रेज और मिशनरी एक जैसे हैं । । बिरसा ने1890 में चाईबासा छोड़ दिया और जर्मन ईसाई मिशन की सदस्यता भी छोड़ दी। उसने रोमन कैथोलिक मिशन धर्म (religion ) स्वीकार किया। पर बाद में उस religion के प्रति भी उनके मन में विरक्ति आने लगी। आखिरकार वे अपने  पुराने धर्म (पंथ)  की ओर लौट आये। और इसके बाद अपनी संस्कृति और पंथ पर जोर देने लगे।

बिरसा की मुलाकात आनंद पाण्ड नाम के एक व्यक्ति से हुई , जिसने उनका जीवन बदल दिया । आनंद पांड स्वांसी जाति का एक धार्मिक व्यक्ति था।  बिरसा ने उनसे  वैष्णव पंथ के प्रारम्भिक सिद्धांतों और रामायण महाभारत की कथाओं का श्रवण कर ज्ञान हासिल किया। इसी दौरान एक वैष्णव साधु से उनकी मुलाकात हुई। साधु ने उन्हें  तीन महीने तक उपदेश दिए। साधु से प्रभावित होकर बिरसा ने मांस खाना छोड़ दिया और जनेऊ धारण कर शुद्धता और धर्म परायणता का जीवन व्यतीत करने लगा। वह तुलसी की पूजा करने लगा और माथे पर चन्दन का टीका लगाना शुरू किया। यही नहीं उन्होंने गो – वध भी रूकवाया।

वनवासी समाज के भगवान माने जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा ने नारा दिया था " साहब- साहब एक टोपी हे।" यानी गोरे अंग्रेज और मिशनरी एक जैसे हैं । यही नहीं बिरसा अनुयायी जोर - शोर से नारे लगाते थे ;हेन्दे राम्बड़ा रे केच्चे, केच्चे, पूंडी राम्बड़ा रे केच्चे – केच्चे।" यानी काले ईसाइयों और गोरे  ईसाइयों का सिर काट दो। परंतु कोई ईसाई नहीं मारा गया। 


कवि भुजंग मेश्राम की इन पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करुंगा 


‘बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा


घास काटती दराती हो या लकड़ी काटती कुल्हाड़ी


यहां-वहां से, पूरब-पश्चिम, उत्तर दक्षिण से


कहीं से भी आ मेरे बिरसा


खेतों की बयार बनकर


लोग तेरी बाट जोहते.’


#मनोज_जोशी

Monday, April 26, 2021

समाज परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव

 समाज परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव 

मनोज जोशी 

कोरोना की इस महामारी और खासतौर से दूसरी लहर ने हमारे तंत्र यानी सिस्टम की खामियों को एक बार फिर सामने लाकर रख दिया है। सिस्टम की इन खामियों को लेकर सोशल मीडिया पर एक अजीबोगरीब युद्ध छिड़ा हुआ है। ‌ मैं भी सिस्टम की खामियों से दुखी हूं और पिछली कम से कम 4 पोस्ट में मेरा यह गुस्सा और दुख जाहिर कर चुका हूं। 

लेकिन इसके आगे एक और पहलू है जिसकी चर्चा होनी चाहिए। लोग पूछ रहे हैं कि सरकार ने यानी सिस्टम ने कोरोना की इस दूसरी लहर की तैयारी क्यों नहीं करी ? यदि बहुत गहराई से सोचें तो आग लगने पर कुआं खोदना यह हमारे सिस्टम का चरित्र बना हुआ है और हमने इसे ऐसा ही स्वीकार भी कर रखा है। जब कोई समस्या या मुद्दा सामने खड़े होता है तभी हम उसका निदान खोजते हैं। पहले से तैयारी यह हमारे सिस्टम का चरित्र ही नहीं है। आज महामारी का समय है इसलिए स्वास्थ्य को लेकर बात हो रही है, लेकिन क्या स्वास्थ्य के अलावा अन्य क्षेत्रों में सिस्टम ठीक काम कर रहा है ? कल्पना कीजिए कि हमारा सिस्टम आज से 5 साल बाद आने वाली किसी समस्या के निराकरण के लिए आज से प्रयास शुरु करता है तो क्या उसकी आलोचना नहीं होगी ? हम ही लोग कहेंगे जब होगा तब देखेंगे अभी तो आज की स्थिति से निपटा जाए।

यह बिल्कुल सही है कि नेताओं ने अपनी रैलियों और सभाओं या पार्टियों की बैठकों में कोरोना प्रोटोकॉल का ध्यान नहीं रखा। लेकिन यह भी सही है कि समाज का बड़ा वर्ग भी उसे भूल सा गया था। दुकानों के आगे बनने वाले गोले और काउंटर के सामने बंधने वाली रस्सी तो गायब हो ही गई थी। हम लोग भी मास्क के बिना सर्वजनिक स्थानों पर घूम रहे थे। जैसे हम वैसे हमारे नेता और वैसा ही हमारा सिस्टम। हमारी और सिस्टम की दोनों की खामियों को मिलाकर समस्या ने विकराल रूप ले लिया और कई ऐसे लोग शिकार हो गए जो बेचारे 100% से भी अधिक सतर्कता बरतते थे। 

जब हम देश के और प्रदेश के चुनाव परिणामों पर नजर डालेंगे तो पता लगेगा कि हमने कई बार व्यवस्था में यानी सिस्टम में परिवर्तन के लिए सत्ता परिवर्तन किया। 1977 में जनता पार्टी की सरकार आई लोगों को उम्मीद थी की व्यवस्था बदलेगी सिस्टम बदलेगा। जब सिस्टम नहीं बदला तो 1980 में जनता ने जनता पार्टी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। मप्र में 1977 के बाद 1990 के सत्ता परिवर्तन में भी अपेक्षित व्यवस्था परिवर्तन नहीं दिखा। 2003 आते-आते जब लोग पूरी तरह निराश हो गए और उन्हें उमा भारती के रूप में नया नेतृत्व नजर आया तो फिर सत्ता परिवर्तन हुआ। भाजपा को व्यवस्था परिवर्तन के लिए प्रदेश के लोगों ने तीन अवसर दिए। इस बीच केंद्र की यूपीए सरकार के दो कार्यकालों से आई निराशा के कारण केंद्र में भी मोदी सरकार बन गई। लेकिन इतने सबके बावजूद क्या व्यवस्था यानी सिस्टम में बदलाव हुआ है? इस प्रश्न पर जब गंभीरता से विचार करेंगे तो जवाब मिलेगा कि इन वर्षों में कुछ चीजें बदली है, लेकिन वह उतनी ही है जितना समाज में बदलाव आया है। मेरी बहुत स्पष्ट मान्यता है कि चाहे अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की बात हो या धारा 370 को निष्प्रभावी करने का मुद्दा हो या ऐसा और कोई विषय हो सब पर सरकार या सिस्टम तभी निर्णायक स्थिति में आया है जब समाज में उसको लेकर स्पष्ट मत बन चुका था।

 समस्या के दौरान ही हमारे समाज की ताकत सामने आती है। लाल बहादुर शास्त्री जी के आह्वान पर सोमवार का उपवास इसका एक बड़ा उदाहरण है। वर्तमान समय में पिछले साल लॉक डाउन के दौरान जहां लोग बड़े पैमाने पर भोजन, राशन आदि की व्यवस्था कर रहे थे, वही अब समाज का बड़ा वर्ग इंजेक्शन, ऑक्सीजन, दवाई और अस्पताल के इंतजाम में लगा हुआ है। लोगों ने छोटे-छोटे व्हाट्सएप ग्रुप और फेसबुक ग्रुप बना लिए हैं। किसी को भी कहीं से भी किसी भी तरह की मदद की जरूरत होती है तो वह सूचना एक साथ कई जगह घूमती है और कई लोग मदद के लिए आगे आ जाते हैं। गौर से देखेंगे तो हमारे आसपास ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो अपना नियमित कामकाज छोड़कर इस समय सेवा में लगे हुए हैं, इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो बार-बार अस्पताल का चक्कर लगाने के कारण संक्रमित हो गए। 

बस समाज की इसी ताकत को बचाए रखने और बढ़ाने की जरूरत है। अक्सर कहा जाता है कि सरकार अकेले कुछ नहीं कर सकती। उसे समाज का सहयोग चाहिए होता है। मैं इसके आगे कहता हूं, और यह पहली बार नहीं कह रहा हूं पहले भी कह चुका हूं कि सरकार को सब कुछ करने की जरूरत भी नहीं है। 

केवल सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन हो रहा होता तो अब तक हमारी व्यवस्था हमारा सिस्टम ठीक हो चुका होता। लेकिन 137 करोड़ आबादी वाले इस प्राचीन देश में यह संभव नहीं है। यहां तो समाज परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव है। इस समाज परिवर्तन के यज्ञ में आहुति देने के लिए तैयार रहें।

#मनोज_जोशी 

(हनुमान जयंती, 5123,युगाब्द तदानुसार 27 अप्रैल 2021)


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Tuesday, April 20, 2021

आरोग्य के लिए रामचरितमानस का अध्ययन करें

 

आरोग्य के लिए रामचरितमानस का अध्ययन करें

- #मनोज_जोशी 


आज रामनवमी है। रामनवमी यानी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म दिन ! लगातार दूसरे साल यह पर्व ऐसे समय आया है जब न केवल भारत बल्कि पूरा विश्व एक महामारी से लड़ रहा है। रामनवमी की शुभकामनाएं देते हुए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आरोग्य के लिए रामचरितमानस का अध्ययन कीजिए ‌‌। आप सोच रहे होंगे भला रामचरितमानस का आरोग्य से क्या रिश्ता ?

मैं एक दिन एक कथावाचक के प्रवचन सुन रहा था, उन्होंने कहा जिस घर में रामचरितमानस होती है वहां आरोग्य होता है। कथावाचक ने घर के सभी सदस्यों को मानस का अध्ययन करने की सलाह दी। मैं भी यही सोच रहा था कि मानस का आरोग्य से क्या रिश्ता?

कथावाचक ने भी बहुत विस्तार में बताने की बजाए केवल राम की भक्ति की बात करी। लेकिन उनके इस कथन के बाद मैंने मानस को जब आरोग्य की दृष्टि से देखा तो समझ आया कि रामचरितमानस में कम से कम 40 ऐसी वन औषधियों का जिक्र है जो अलग-अलग रोगों में उपयोग में आ सकती हैं। श्री राम के युग में भारत में एक विशिष्ट चिकित्सा पद्धति विकसित थी। 

जरा यह उदाहरण देखिए - 

सती अहिल्या को श्रीराम पाषाण (वास्तव में कई वर्षों से कोमा) अवस्था से चरण धूलि से स्वस्थ अवस्था में लाते हैं।

“ जे पद परसि तरी रिषिनारी।

दंडक कानन पावनकारी।। ”

भक्ति भाव में हम इसे श्रीराम का चमत्कार मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में यह किसी चमत्कार का परिणाम नहीं था। इस भक्ति में हम यह भूल जाते हैं कि श्री राम जब विश्वामित्र जी श्रीराम विद्या ग्रहण कर रहे थे तो उन्होंने श्रीराम को ऐसी औषधियों की शिक्षा दी थी जो बिना भोजन तथा जल के शरीर को स्वस्थ रख सकती है।

“ तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही।

विद्यानिधि कहुँ विद्या दीन्ही।।

जाते लाग ना छुधा पिपासा।

अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।। ”


लंका में युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी का मूर्छित हो जाना और संजीवनी बूटी से उनके इलाज का पूरा प्रसंग तो सभी जानते हैं। इस प्रसंग में एक खास बात जिसका आम तौर पर जिक्र नहीं होता वह या कि लक्ष्मण जी का उपचार लंका के राज वेद्य सुषेण वैद्य ने किया था। यानी उस समय चिकित्सक युद्ध के दौरान घायल दुश्मन का भी इलाज करते थे।

 इसके अलावा श्री राम के जन्म से पहले की कथा को याद कीजिए। महाराज दशरथ एक यज्ञ करते हैं और उस यज्ञ के प्रसाद स्वरूप खीर तीनों महारानियों को ग्रहण कराते हैं। यह यज्ञ भी विश्वामित्र ही संपन्न कराते हैं। तार्किक बुद्धि से विचार कीजिए यह प्रसाद एक औषधि ही थी जिसे केवल महारानियों को ही ग्रहण कराया गया। आप जब अगली बार मानस का अध्ययन करें तो पाएंगे कि अनेक अवसरों पर तुलसीदास जी ने विभिन्न फल फूल आदि के गुणों का वर्णन किया है। कई जगहों पर उन्होंने मनुष्य के स्वभाव,कर्तव्य आदि की व्याख्या करने के लिए इनका सहारा लिया है। 


!! सर्वे संतु निरामया !!

रामनवमी पर यही शुभकामना


*चित्र मेरे निवास पर बेटे रुद्रांश द्वारा तैयार श्रीराम की झांकी का


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- मनोज जोशी (भोपाल) रामनवमी युगाब्द 5123 तदनुसार दिनांक 21 अप्रैल 2021

Friday, April 2, 2021

हिंदुत्व और महात्मा गांँधीजी का रामराज्य (५०)

(गतांक से आगे)

महात्मा गाँधीजी की रामराज्य की अवधारणा हिंदू राष्ट्र के बहुत करीब

-#मनोज_जोशी

हमने पिछली दो- तीन कड़ी में देखा कि हिंदू और हिंदुत्व के साथ हिंदू राष्ट्र की अवधारणा की गलत व्याख्या करके उसे रिलीजन से जोड़ा गया। इसी तरह गाँधीजी की रामराज्य की अवधारणा को जब हम देखते हैं तो पता चलता है कि वह भी रिलीजन पर आधारित नहीं है। आरएसएस की स्थापना से ४ साल पहले असहयोग आंदोलन के दौरान २२ मई, १९२१ को ‘नवजीवन’ में महात्मा गाँधी ने रामराज्य को लेकर जो कुछ लिखा वह पढ़ लीजिए। डॉ हेडगेवार और महात्मा गाँधीजी दोनों के विचारों में समानता ही नजर आएगी।

गाँधी जी लिखते हैं -‘कुछ मित्र रामराज्य का अक्षरार्थ करते हुए पूछते हैं कि जब तक राम और दशरथ फिर से जन्म नहीं लेते तब तक क्या रामराज्य मिल सकता है? हम तो रामराज्य का अर्थ स्वराज्य, धर्मराज्य, लोकराज्य करते हैं। वैसा राज्य तो तभी संभव है जब जनता धर्मनिष्ठ और वीर्यवान् बने. ...अभी तो कोई सद्गुणी राजा भी यदि स्वयं प्रजा के बंधन काट दे, तो भी प्रजा उसकी गुलाम बनी रहेगी। हम तो राज्यतंत्र और राज्य नीति को बदलने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं; बाद में हमारे सेवक के रूप में अंग्रेज रहेंगे या भारतीय हमें इसकी चिंता नहीं करनी पड़ेगी। हम अंग्रेज जनता को बदलने का प्रयास भी नहीं करते।हम तो स्वयं अपने-आप को बदलने का प्रयास कर रहे हैं।'

अब जरा संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार के विचारों को ध्यान कर लीजिए। वे भी हिंदू समाज की कमजोरियों को दूर करने की बात करते हुए कहते थे कि इन हालात में यदि हम आजाद हो भी गए तो भी वह बेमानी होगी।


भावनगर में गाँधीजी ने कहा - राम के वंशज समाप्त नहीं हुए हैं

भावनगर में ८ जनवरी १९२५ को काठियावाड़ राजनीतिक सम्मेलन में रामराज्य को लेकर महात्मा गाँधी ने कहा `राम ने एक कुत्ते के साथ भी न्याय किया। राम ने सत्य के लिए अपना राजपाट छोड़कर वन गमन किया जो कि सारी दुनिया के राजाओं के लिए मर्यादा का पाठ है। उन्होंने एक पत्नीव्रत का पालन करते हुए यह दर्शाया कि राजवंश से संबद्ध होने के बावजूद कोई गृहस्थ व्यक्ति पूर्ण आत्मसंयम का पालन कर सकता है। राम को जनमत जानने के लिए आज की तरह मतदान की आवश्यकता नहीं थी बल्कि वे अंतरज्ञान के माध्यम से ही लोगों के हृदय की बात जान लेते थे। राम की प्रजा बहुत प्रसन्न थी। इस तरह का रामराज्य आज भी कायम किया जा सकता है। राम के वंशज समाप्त नहीं हुए हैं।’


रामराज्य का मतलब ईश्वर का राज

उन्होंने १९ सितंबर १९२९ को `यंग इंडिया’ में लिखाः----,`रामराज्य से मेरा मतलब हिंदू राज नहीं है।" (यहाँ गाँधीजी हिंदू शब्द का उपयोग रिलीजन के ‌रूप में कर रहे हैं) वे आगे लिखते हैं- " मेरे रामराज्य का अर्थ है- ईश्वर का राज्य। मेरे लिये, राम और रहीम एक ही हैं; मैं सत्य और धार्मिकता के ईश्वर के अलावा किसी और ईश्वर को स्वीकार नहीं करता। चाहे मेरी कल्पना के राम कभी इस धरती पर रहे हो या न रहे हो, रामायण का प्राचीन आदर्श निस्संदेह सच्चे लोकतंत्र में से एक है, जिसमें एक बहुत बुरा नागरिक भी एक जटिल और महंगी प्रक्रिया के बिना त्वरित न्याय को लेकर आश्वस्त हो।"

रामराज्य यानी धर्म राज्य और रामराज्य ही सबसे बेहतर लोकतंत्र का उदाहरण

२० मार्च, १९३० को ‘नवजीवन’ में ‘स्वराज्य और रामराज्य’ शीर्षक से एक लेख में गाँधीजी ने कहा था- ‘स्वराज्य के कितने ही अर्थ क्यों न किए जाएं, तो भी मेरे नजदीक तो उसका त्रिकाल सत्य एक ही अर्थ है, और वह है रामराज्य। यदि किसी को रामराज्य शब्द बुरा लगे तो मैं उसे धर्मराज्य कहूंगा। रामराज्य शब्द का भावार्थ यह है कि उसमें गरीबों की संपूर्ण रक्षा होगी, सब कार्य धर्मपूर्वक किए जाएंगे और लोकमत का हमेशा आदर किया जाएगा. ...सच्चा चिंतन तो वही है जिसमें रामराज्य के लिए योग्य साधन का ही उपयोग किया गया हो. यह याद रहे कि रामराज्य स्थापित करने के लिए हमें पाण्डित्य की कोई आवश्यकता नहीं है. जिस गुण की आवश्यकता है, वह तो सभी वर्गों के लोगों- स्त्री, पुरुष, बालक और बूढ़ों- तथा सभी धर्मों के लोगों में आज भी मौजूद है. दुःख मात्र इतना ही है कि सब कोई अभी उस हस्ती को पहचानते ही नहीं हैं. सत्य, अहिंसा, मर्यादा-पालन, वीरता, क्षमा, धैर्य आदि गुणों का हममें से हरेक व्यक्ति यदि वह चाहे तो क्या आज ही परिचय नहीं दे सकता?’


भोपाल में कहा - मेरे लिए राम और रहीम एक

सितंबर १९२९ में भोपाल में एक सभा में भी गाँधीजी ने रामराज्य की बात कही थी। गाँधी भवन न्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तक मध्यप्रदेश के गाँधीधाम में लिखा है कि गांधीजी ने रामराज्य की पूरी व्याख्या करते हुए कहा था कि मुसलमान भाई इसे अन्यथा न लें, रामराज्य का मतलब है-ईश्वर का राज्य। मेरे लिए राम और रहीम में कोई अंतर नहीं है। उन्होंने कहा था कि जिस रामराज्य की कहानी हमें सुनने को मिलती है वह प्रजातंत्र का आदर्श है।

गाँधीजी ने कुछ अन्य अवसरोंं पर कहा था - "मैं अपने मुस्लिम मित्रों को सचेत करता हूं कि मेरे रामराज्य शब्द के प्रयोग पर वे किसी प्रकार की गलतफहमी में न आएं। मेरे लिए रामराज्य का अर्थ हिंदू राज नहीं है। मेरे लिए रामराज्य का अर्थ दैवीय शासन है। एक प्रकार से ईश्वर का राज्य है। मेरे लिए राम और रहीम एक ही हैं। मैं सत्य के अलावा और किसी को ईश्वर नहीं मानता। मेरी कल्पना के राम कभी इस धरती पर आए थे या नहीं लेकिन रामराज्य का प्राचीन आदर्श निस्संदेह एक प्रकार से सच्चे लोकतंत्र का नमूना है। वह ऐसी शासन व्यवस्था है जहां पर सबसे सामान्य नागरिक को भी लंबी और महंगी प्रक्रिया से गुजरे बिना त्वरित न्याय की उम्मीद बनी रहती है।"

अगस्त १९३४ में अमृत बाज़ार पत्रिका में उन्होंने कहा, 'मेरे सपनों की रामायण, राजा और निर्धन दोनों के लिये समान अधिकार सुनिश्चित करती है।'फिर २ जनवरी १९३७ को हरिजन में उन्होंने लिखा, 'मैंने रामराज्य का वर्णन किया है, जो नैतिक अधिकार के आधार पर लोगों की संप्रभुता है।’


मुस्लिम और ईसाई रिलीजन के लोगों की समझ के लिए वे रामराज्य को खुदाई राज या परमात्मा का राज भी कहने लगे थे।


गाँधीजी ने १९४६ में हरिजन में लिखाः----


`( मैं रामराज्य शब्द का प्रयोग इसलिए करता हूं) क्योंकि यह एक सुविधाजनक और सार्थक अभिव्यक्ति वाला मुहावरा है। इसके विकल्प में कोई दूसरा शब्द नहीं है जो लाखों लोगों तक मेरी बात को इतने प्रभावशाली ढंग से पहुंचा दे। जब मैं सीमांत प्रांत का दौरा करता हूं या मुस्लिम बहुल सभा को संबोधित करता हूं तो मैं अपने भाव को व्यक्त करने के लिए खुदाई राज शब्द का प्रयोग करता हूं। जब मैं ईसाई जनता को संबोधित करता हूं कि तब मैं धरती पर परमात्मा के राज की बात करता हूं।’

२६ फरवरी, १९४७ को एक प्रार्थना-सभा में महात्मा गाँधी ने कहा" मैंने अपने आदर्श समाज को रामराज्य का नाम दिया है. कोई यह समझने की भूल न करे कि राम-राज्य का अर्थ है हिन्दुओं का शासन. मेरा राम खुदा या गॉड का ही दूसरा नाम है। मैं खुदाई राज चाहता हूं जिसका अर्थ है धरती पर परमात्मा का राज्य. ...ऐसे राज्य की स्थापना से न केवल भारत की संपूर्ण जनता का, बल्कि समग्र संसार का कल्याण होगा।'

पिछले 7 महीने से जारी इस श्रंखला की 50 वीं कड़ी तक आते-आते इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि जिन महात्मा गांधी को "रघुपति राघव राजा राम" और "वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाने रे" प्रिय थे स्वाभाविक रूप से वे मन और वचन से हिंदुत्व की मूल अवधारणा के काफी करीब थे।

दोनों की कार्यपद्धति में जरूर कुछ अंतर नजर आता है, लेकिन इस अंतर को बढ़ा चढ़ा कर पेश करके हम केवल उन विघ्न संतोषी लोगों के एजेंडे को ही पूरा करेंगे जिनके विचार की जड़ें भारत में नहीं है।

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अध्ययन के लिए अल्प विराम……

"हिंदुत्व और महात्मा गांँधीजी का रामराज्य" विषय पर यह अध्ययन तब तक बेमानी है जब तक रामराज्य की अवधारणा की प्रासंगिकता पर चर्चा ना हो। अब मैं वाल्मीकि रामायण में राम राज्य के वर्णन और वर्तमान संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता पर अध्ययन शुरू कर रहा हूँ। इस बारे में अध्ययन के लिए इस श्रृंखला को अल्प विराम देता हूं। कुछ ही दिनों में "वर्तमान युग में रामराज्य की प्रासंगिकता" इस विषय पर भी मेरा लेखन किसी न किसी रूप में सामने आएगा।

इस श्रृंखला के लिए अनेक मित्रों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मुझे जो सहयोग प्रदान किया है और जो मेरा उत्साहवर्धन किया है के लिए सबका आभार व्यक्त करता हूं।

(समाप्त)


(यह श्रृंखला मेरे ब्लॉग www.mankaoj.blogspot.com 

और एक अन्य न्यूज़ वेबसाइट www.newspuran.com पर भी उपलब्ध है)




Monday, March 29, 2021

हिंदुत्व और महात्मा गांँधी जी का रामराज्य (४९)

(गतांक से आगे)

आखिर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा क्या है ?

#मनोज_जोशी


रामराज्य और उसमें भी गांधीजी के विचार जानने से पहले मुझे लगता है कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर भी चर्चा होनी चाहिए, तभी हम यह समझ सकेंगे कि दोनों में अंतर क्या है और दोनों में समानता क्या है ?

इस कड़ी में चर्चा करते हैं कि आखिर हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा क्या है ? 

१९२५ में आरएसएस की स्थापना के साथ डॉ हेडगेवार ने जोर देकर कहा - " हां मैं कहता हूँ कि भारत हिंदू राष्ट्र है।" यानी डॉक्टर हेडगेवार ने यह नहीं कहा कि भारत को हिंदु राष्ट्र बनाना है उन्होंने कहा भारत हिंदू राष्ट्र है। 


संघ की प्रार्थना कहती है 


प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता

इमे सादरं त्वां नमामो वयम्

त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्

शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।


प्रार्थना के इस भाग का हिंदी में अर्थ है


"सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के घटक के रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ। आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें इस कार्य को पूरा करने किये आशीर्वाद दे। हमें ऐसी अजेय शक्ति दीजिये कि सारे विश्व मे हमे कोई न जीत सकें और ऐसी नम्रता दें कि पूरा विश्व हमारी विनयशीलता के सामने नतमस्तक हो। यह रास्ता कांँटों से भरा है, इस कार्य को हमने स्वयं स्वीकार किया है और इसे सुगम कर काँटों रहित करेंगे।"

वास्तव में संघ मानता है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि वह पहले से ही हिंदू राष्ट्र है। 12 वर्षों में लगने वाले कुंभ के मेले, चार धाम की यात्रा, शक्तिपीठों की स्थापना आदि को देख लीजिए। हमारे कई शक्तिपीठ और प्रमुख धार्मिक स्थल पाकिस्तान और बांग्लादेश में चले गए हैं इसे समझ लीजिए। अलग-अलग रियासतों में बँटा इतना बड़ा देश लेकिन सांस्कृतिक रूप से सब एक। सबकी अपनी परंपराएं, सबकी अपनी पूजा पद्धति, सबके अपने विचार लेकिन फिर भी एक। इस 'हिंदू विचार' को 'राष्ट्र विचार' के रूप में देखा जाए। यही हिंदू राष्ट्र है।

 हमने इस श्रंखला की पिछली कड़ी में देखा कि धर्म और हिंदुत्व की गलत व्याख्या के कारण जिस तरह का भ्रम बना है लगभग वही स्थिति हिंदू राष्ट्र को लेकर है। हम पिछली कड़ी में यह जान चुके हैं कि हिंदू विचार यानी हिंदुत्व में पूजा पद्धति और अन्य मान्यताओं को लेकर कोई बंधन नहीं है। ईश्वर को मानने वाला भी हिंदू है और नास्तिक भी हिंदू है तो फिर इस हिंदू विचार को राष्ट्र विचार मानने में किसी भी पूजा पद्धति वाले व्यक्ति को क्या परेशानी होना चाहिए। 

कहा जाता है कि यदि भारत हिंदु राष्ट्र होगा तो यहाँ मुसलमानों और ईसाइयों की स्थिति दूसरे दर्जे के नागरिक जैसी हो जाएगी। इस आशंका का समाधान करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि यह देखा जाए कि राजनीतिक रूप से हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को सबसे पहले प्रस्तुत करने वाले वीर सावरकर ने इस पर क्या कहा था ?

 हिंदू महासभा के अध्यक्ष रूप में सावरकर ने कहा


"हिंदु महासभा न सिर्फ प्रति व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को स्वीकार करती है बल्कि मानती है कि इसके साथ मौलिक अधिकार और कर्तव्य भी सभी नागरिकों के लिए उनकी नस्ल और धर्म से परे समान होने चाहिए… अल्पसंख्यक अधिकारों की कोई भी बात सैद्धांतिक रूप से न केवल अनावश्यक बल्कि विरोधाभासी भी है।

क्योंकि यह सामुदायिक आधार पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक होने का बोध कराता है। लेकिन व्यावहारिक राजनीति जैसी माँग करती है और हिंदू संगठनी गैर-हिंदू देशवासियों को भयमुक्त करना चाहते हैं, उसके लिए हम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अल्पसंख्यकों के धर्म, संस्कृति और भाषा के लिए वैधानिक अधिकार दिए जाएँगे– जिसकी एक शर्त होगी-

बहुसंख्यकों के समान अधिकारों पर इससे अतिक्रमण न हो, न वे इससे निरस्त हों। अल्पसंख्यकों के अलग विद्यालय हो सकते हैं जिसमें वे अपने बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा दें, अपने धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थान हो सकते हैं जिसे सरकार सहायता भी मिले लेकिन वे जितना कर देते हैं, उसके अनुपात में। ये सिद्धांत बहुसंख्यकों पर भी लागू हों।

इन सबसे आगे और ऊपर, यदि संविधान संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों और प्रति व्यक्ति एक वोट पर आधारित नहीं होता है तो जो अल्पसंख्यक अलग निर्वाचन क्षेत्र या आरक्षित सीटें चाहते हैं, उन्हें उसकी अनुमति होगी- लेकिन उनकी जनसंख्या के अनुपात में जिससे बहुसंख्यकों के समान अधिकारों का हनन न हो।

मुस्लिम अल्पसंख्यकों से समान नागरिकों की तरह व्यवहार होगा, वे समान सुरक्षा के अधिकारी होंगे और उनकी जनसंख्या के अनुपात में उन्हें जनपद अधिकार मिलेंगे। हिंदू बहुसंख्यक किसी भी गैर-हिंदू अल्पसंख्यक के वैधानिक अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं करेंगे।

लेकिन किसी भी सूरत में हिंदू बहुसंख्यकों को अपने उन अधिकारों को नहीं त्यागना चाहिए जो किसी लोकतांत्रिक और वैधानिक संविधान के तहत बहुसंख्यकों को मिलते हैं। विशेषकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने अल्पसंख्यक रहकर हिंदुओं के प्रति आभार व्यक्त नहीं किया है और इसलिए उन्हें प्राप्त पद और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों में अनुपात के अनुसार मिली वैधानिक साझेदारी से संतुष्ट होना चाहिए।

मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के वैधानिक अधिकारों और विशेषाधिकारों पर निषेधाधिकार देना और उसे “स्वराज्य” कहना निरर्थक होगा। हिंदू शासकों को बदलना नहीं चाहते, वे इसलिए संघर्ष नहीं कर रहे, इसलिए मरने के लिए तैयार नहीं हैं कि किसी एडवर्ड का स्थान कोई औरंगजेब ले ले, मात्र इस आधार पर कि उसका जन्म भारतीय सीमाओं के अंदर हुआ है, वे अपने घर में, अपनी भूमि में अपना स्वामित्व चाहते हैं।"


ध्यान रहे सावरकर यह सब तब कह रहे हैं जब देश में अंग्रेजों का राज था और रियासतें भी कायम थीं। भारत की आजादी का संघर्ष चल रहा था, संविधान क्या होगा यह तय नहीं था, उस समय एक व्यक्ति एक वोट की बात कहना बहुत बड़ी बात थी। एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सावरकर जहाँ यह कहते थे कि भारत में हिंदु और मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्र है वहीं वे विभाजन को स्वीकार नहीं करते थे। यानी दोनों साथ रहेंगे और दोनों के अधिकार बराबर होंगे कोई किसी के अधिकार पर दबाव बनाकर अतिक्रमण नहीं करेगा। 

(क्रमशः)


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Friday, March 26, 2021

हिंदुत्व और महात्मा गांधी जी का रामराज्य (४८)

 (गतांक से आगे)

सिंधु का अपभ्रंश नहीं है हिंदु, और हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है, 

जानिए शोध क्या कहती है 

#मनोज_जोशी

मैंने पिछली पोस्ट में कहा था कि धर्म की तरह हिंदु शब्द की भी गलत व्याख्या की जाती है। हिंदु को रिलीजन बता कर कहा जाता है कि पारसी लोगों ने सिंधु किनारे रहने वालों को हिंदु कहा, क्योंकि वे स को ह उच्चारण करते थे। पहली बात तो यह कि हिंदु क्रिश्चियन और मुस्लिम की तरह कोई रिलीजन नहीं है, इसकी आगे व्याख्या करूंगा। पहले हिंदु शब्द की उत्पत्ति पर बात करते हैं।

विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हिंदु शब्द पारसियों ने नहीं दिया। जो लोग यह दावा करते हैं कि यह फारसियो का दिया शब्द है, उनसे मेरा पहला सवाल है कि भारत के लोग तो फारसी नहीं बोलते थे फिर उन्होंने एक फारसी शब्द कैसे अपना लिया। न केवल अपना लिया बल्कि उसे अपनी पहचान मान लिया। दूसरा सवाल उस समय भारत की सीमा अफगान तक थी और भारत की सीमा के सबसे करीब काबुल नदी थी तो हमें काबुली क्यों नहीं कहा गया ??

अब फारसी भाषा के व्याकरण की बात कर लीजिए फारसी लोग खुद को परस बोलते उसमे भी 'स' है । वे तो खुदको परह नहीं कहते थे । प्राचीन इराकी शहर सुमेर को भी वे सुमेर ही कहते थे हुमेर भाई। प्राचीन समय में सिंध राज्य था और उसे सिंध ही कहा गया साथ ही आज के पाकिस्तान में सिंध प्रान्त है पर उसे भी सिंध ही कहते है और यदि सिन्धु के दूसरी तरह रहने वालो को हिन्दु कहा गया तो सिंध को सिंध ही क्यों हिन्द क्यों नहीं। संस्कृत को भी हंह्कृत नहीं कहते।

एक और बात पारसी पंथ की स्थापना 700 ईसा पूर्व की है। बाद में इस पंथ को संगठित रूप दिया जरथुस्त्र ने। लेकिन हिंदु शब्द का जिक्र पारसियों की किताब से पूर्व की किताबों में भी मिलता है। 

उदाहरण देखिए -

मेरु तंत्र ( शैव ग्रन्थ ) में हिन्दु शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया है...

'हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्चते प्रिये’

( अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दु कहते हैं )

लगभग यही मंत्र कल्पद्रुम में भी दोहराया गया है...

‘हीनं दूषयति इति हिन्दू ‘(

 अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे वह हिन्दु है।)

पारिजात हरण में “हिन्दु” को कुछ इस प्रकार कहा गया है |

हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टम ¡

हेतिभिः शत्रुवर्गं च स हिंदुरभिधियते ।।

माधव दिग्विजय में हिन्दु शब्द का इस प्रकार उल्लेख है...

ओंकारमंत्रमूलाढ्य पुनर्जन्म दृढाशयः ।

गोभक्तो भारतगुरू र्हिन्दुर्हिंसनदूषकः ॥

( अर्थात... वो जो ओमकार को ईश्वरीय ध्वनि माने... कर्मो पर विश्वास करे, गौ पालक रहे तथा बुराइयों को दूर रखे वो हिन्दु है )

ऋग्वेद (८:२:४१) में ‘विवहिंदु’ नाम के राजा का वर्णन है जिसने 46000 गाएँ दान में दी थी विवहिंदु बहुत पराक्रमी और दानीराजा था और, ऋग्वेद मंडल 8 में भी उसका वर्णन है। ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दु शब्द इस प्रकार आया है…

हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं ।

तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।

( अर्थात... हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं )

 -इस्लाम के चतुर्थ खलीफ़ा अली बिन अबी तालिब लिखते हैं कि वह भूमि जहां पुस्तकें सर्वप्रथम लिखी गईं, और जहां से विवेक तथा ज्ञान की‌ नदियां प्रवाहित हुईं, वह भूमि हिन्दुस्तान है। 

- नौवीं सदी के मुस्लिम इतिहासकार अल जहीज़ लिखते हैं...

“हिन्दु ज्योतिष शास्त्र में, गणित, औषधि विज्ञान, तथा विभिन्न विज्ञानों में श्रेष्ठ हैं। मूर्ति कला, चित्रकला और वास्तुकला का उऩ्होंने पूर्णता तक विकास किया है। उनके पास कविताओं, दर्शन, साहित्य और नीति विज्ञान के संग्रह हैं। भारत से हमने कलीलाह वा दिम्नाह नामक पुस्तक प्राप्त की है।

इन लोगों में निर्णायक शक्ति है, ये बहादुर हैं। उनमें शुचिता, एवं शुद्धता के सद्गुण हैं। मनन वहीं से शुरु हुआ है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग के समय में 'हिंदु' शब्द प्रचलित था। चीनी भाषा में भी 'इंदु को 'इंतु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इंतु' या 'हिंदु' कहते थे। मैंने कहीं पढा है कि हिंदु शब्द संस्कृत से आया है। ह:+इंदु --हिंदु। अर्थात जिसका ह्रदय इंदु यानी चंद्रमा के समान पवित्र है। वह हिंदु है। एक मान्यता यह भी है कि हिंदु शब्द हिमालय के प्रथम अक्षर 'हि' एवं 'इन्दु' का अंतिम अक्षर 'न्दु'। इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना 'हिन्दु और यह भू-भाग #हिन्दुस्थान कहलाया।

सही शब्द हिंदु है हिंदू नहीं

पोस्ट के बीच में एक बात और कहना चाहता हूँ भाषा की शुद्धता के हिसाब से सही शब्द हिंदु है हिंदू नहीं। दा में बड़े ऊ की मात्रा लगाकर हिंदू लिखना अशुद्ध है। संस्कृत के इंदु शब्द में भी छोटे उ की मात्रा है और चीनी भाषा का इंतु भी देवनागरी में त में छोटी उ की मात्रा लगाकर ही लिखा जाता है। यह बात स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में हिंदु अस्मिता को लेकर चले आंदोलनों में बार-बार गुंजायमान होने के कारण हिंदु शब्द हिंदू में बदल गया।

अब पंथ यानी religion की बात

अंग्रेजी के शब्द religion का अनुवाद धर्म कर देने से भारत के संदर्भ में गङबङ हो गया। हमारे लिए धर्म का पूजा पद्धति से कोई लेना देना नहीं है। पिछली पोस्ट में हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि जो धारण करने योग्य है वह धर्म है।

उच्चतम न्यायालय भी यही कहता है।

क्या हिन्दुत्व को सच्चे अर्थों में धर्म कहना सही है? इस प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय ने – “शास्त्री यज्ञपुरष दास जी और अन्य विरुद्ध मूलदास भूरदास वैश्य और अन्य (1966(3) एस.सी.आर. 242) के प्रकरण का विचार किया। इस प्रकरण में प्रश्न उठा था कि स्वामी नारायण सम्प्रदाय हिन्दुत्व का भाग है अथवा नहीं ? इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री गजेन्द्र गडकर ने अपने निर्णय में लिखा –

"जब हम हिन्दु धर्म के संबंध में सोचते हैं तो हमें हिन्दु धर्म को परिभाषित करने में कठिनाई अनुभव होती है। विश्व के अन्य मजहबों के विपरीत हिन्दु धर्म किसी एक दूत को नहीं मानता, किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं है, वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, यह किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति नीति को नहीं मानता, वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की संतुष्टि नहीं करता है। वृहद रूप में हम इसे एक जीवन पद्धति के रूप में ही परिभाषित कर सकते हैं – इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।"

रमेश यशवंत प्रभु विरुद्ध प्रभाकर कुन्टे (ए.आई.आर. 1996 एस.सी. 1113) के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय को विचार करना था कि विधानसभा के चुनावों के दौरान मतदाताओं से हिन्दुत्व के नाम पर वोट माँगना क्या मजहबी भ्रष्ट आचरण है। उच्चतम न्यायालय ने इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हुए अपने निर्णय में कहा-

"हिन्दु, हिन्दुत्व, हिन्दुइज्म को संक्षिप्त अर्थों में परिभाषित कर किन्हीं मजहबी संकीर्ण सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है। इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा से अलग नहीं किया जा सकता।"

अब बात सनातन धर्म की - 

सनातन का अर्थ शाश्वत होता है यानी कभी न खत्म होने वाला । हिंदुत्व सबसे प्राचीन विचारधारा है जिसके धारणत्व आचरण को धर्म कहा गया । जो किसी एक किताब से शुरू नही होती और ना ही खत्म होती है! आस्तिक-नास्तिक या निराकार साकार सब विषयो विचारो को सनातन धर्म खुद में समाए हुए है। ध्यान से देखिए इसमें विश्व की सभी पूजा पद्धतियां समाहित हैं ।

हिंदुत्व क्या है ?

“एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका” (Encyclopedia Britannica) में “हिन्दुत्व” शब्द का अर्थ बताया गया है 

“Hindutva (‘Hinduness’), is an ideology that sought to define Indian culture in terms of Hindu values.” सवाल यह है कि हिंदू वैल्यूस या हिंदुओं के गुण क्या हैं? विवेक, अनुशासन, इन्द्रियों और मन पर संयम रखना, त्याग, सत्य, परोपकार और फल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना यह हिंदुत्व के गुण हैं। 

#हिंदुत्व ही #राष्ट्रीयत्व है

हिंदु शब्द की उत्पत्ति की बात मेरे ख्याल से स्पष्ट हो गई। हिंदु शब्द भारत के प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। और यह ग्रंथ भारत में मुस्लिम और ईसाई पंथ के आगमन से पहले के हैं । भारत के मुस्लिम और ईसाई भी इस हिसाब से हिंदु ही हैं । क्योंकि हमारे पूर्वज एक हैं । इन ग्रंथों पर भारत के मुसलमानों और ईसाइयों का भी उतना ही अधिकार है जितना अन्य का। पूजा पद्धति बदल जाने से पूर्वज नहीं बदलते। इसी श्रंखला की पिछले कड़ियों में मोहम्मद अली जिन्ना, अल्लामा इकबाल और शेख अब्दुल्ला के परिवार द्वारा इस्लाम ग्रहण करने का उदाहरण दिया जा चुका है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व शब्द इस उपमहाद्वीप के लोगों की जीवन पद्धति से संबंधित है। इसे संकीर्णता नहीं कहा जा सकता। साधारण रूप में हिन्दुत्व को एक जीवन पद्धति ही समझा जा सकता है।

(क्रमशः)


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Thursday, March 25, 2021

हिंदुत्व और महात्मा गांधी जी का राम राज्य (४७)

(गतांक से आगे)

धर्म यानी रिलीजन क्यों नहीं जानिए विस्तार से

#मनोज जोशी

अब इस श्रृंखला में हम धर्म और हिंदुत्व जैसे शब्दों की व्याख्या पर चर्चा करेंगे। धर्म और हिंदुत्व यह दो ऐसे शब्द हैं जिनकी गलत व्याख्या के कारण वैचारिक रूप से बहुत गड़बड़ हो गई है। कम्युनिस्ट हमें उनके चश्मे से भारत की संस्कृति और इतिहास दिखा रहे हैं। 

शुरुआत धर्म से करते हैं। धर्म शब्द का अर्थ क्या है? धर्म यह शब्द संस्कृत से आया है। धर्म को परिभाषित करते हुए लिखा गया है- धारयति इति धर्म: । यानी जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। अब धारण करने योग्य क्या है ? कहा गया है कि सत्य, क्षमा, विद्या, दया और दान धारण करने योग्य है। महाभारत वन पर्व ३३.५३ में लिखा है - "उदार मेव विद्वांसो धर्म प्राहुर्मनीषिण: ।" अर्थात मनीषीजन उदारता को ही धर्म कहते हैं। इसके आगे महाभारत वन पर्व २०८.१ में धर्म के बारे में कहां गया है - ,,,'स्वकर्मनिरतः यस्तु धर्म: स इति निश्चय: ।' अर्थात "अपने कर्म में लगे रहना निश्चय ही धर्म है।" 

महाभारत शांति पर्व १५.२ के अनुसार "दण्डं धर्म विदुर्भा: ।" अर्थात "ज्ञानी जन दण्ड को धर्म मानते हैं‌।" महाभारत शांति पर्व में आगे १६२.५ में कहा गया है - "सत्यं धर्मस्तपो योग:।" यानी सत्य ही धर्म है, सत्य ही तप है और सत्य ही योग है। अब यदि महात्मा गाँधी कहते थे कि सत्य ही धर्म है तो वे महाभारत में बताई धर्म की इसी परिभाषा की ही तो बात कर रहे हैं। महाभारत शांति पर्व में आगे २५९.१८ में कहा गया है - "दातव्यमित्ययं धर्म उक्तो भूतहिते रतै:।" यानी सभी प्राणियों के हित में लगे रहने वाले मनुष्यों ने दान को धर्म बताया है।

दूरदर्शन पर दोबारा प्रसारित हुए महाभारत सीरियल में से और कुछ याद हो या नहीं लेकिन टाइटल सॉन्ग के रूप में यह श्लोक -

 यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।। 

सभी की जुबान पर चढ़ गया था। इस श्लोक का अर्थ क्या है - 

यह श्लोक गीता के अध्याय 4 का श्लोक 7 और 8 है। जब अर्जुन ने कुरूक्षेत्र में युद्ध करने से मना कर दिया था। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह कहा। इसका हिंदी अनुवाद करें तो श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं- मै प्रकट होता हूं, मैं आता हूं, जब जब धर्म की हानि होती है, तब तब मैं आता हूं, जब जब अधर्म बढता है तब तब मैं आता हूं, सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मै आता हूं, दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूं, धर्म की स्थापना के लिए में आता हूं और युग युग में जन्म लेता हूं।

इसके माध्यम से यहां मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहता हूं कि महाभारत काल में तो किसी रिलीजन की हानि होने का सवाल ही नहीं था। चाहे कौरव हो या पांडव एक ही तरह की पूजा पद्धति और एक ही देवता को मानने वाले थे। उस समय तो धरती पर न इस्लाम था और ना क्रिश्चियन धर्म का उदय हुआ था। जैन,बौद्ध और सिख सहित अन्य पंथ का उदय भी महाभारत काल के बाद का है।

यानी श्रीकृष्ण जिस धर्म की स्थापना की बात कर रहे हैं वह कोई रिलीजन नहीं है।

अंत में मनुस्मृति में धर्म की परिभाषा पर भी चर्चा कर लें। मनुस्मृति में कहा गया है -


धृति: क्षमा दमोअस्तेयं शोचं इन्द्रिय निग्रह:

धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणं ६/९

अर्थात धैर्य,क्षमा, मन को प्राकृतिक प्रलोभनों में फँसने से रोकना, चोरी त्याग, शौच, इन्द्रिय निग्रह, बुद्धि अथवा ज्ञान, विद्या, सत्य और अक्रोध धर्म के दस लक्षण हैं।

मनु स्मृति में यह भी कहा गया है 

आचार:परमो धर्म १/१०८

अर्थात सदाचार परम धर्म है।

कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि भारत में जिस संदर्भ में धर्म शब्द का उपयोग होता है उसका पूजा पद्धति से कोई लेना देना नहीं है। पश्चिम और वामपंथी विचारकों के प्रभाव में गड़बड़ होने से शब्द और उनके अर्थ बदल गए जिससे कई परेशानी खड़ी की हैं। जिस तरह से धर्म शब्द का अर्थ बदल कर अनर्थ किया गया है वही हाल हिंदुत्व का है। अगली पोस्ट में हिंदुत्व की परिभाषा पर चर्चा करेंगे।

(क्रमशः)

यह पोस्ट मेरे फेसबुक और ब्लॉग www.mankaoj.blogspot.com के साथ न्यूज़ वेबसाइट www.newspuran.com पर उपलब्ध है।