Sunday, October 11, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का रामराज्य (१९)

(गतांक से आगे)

बाल विवाह ही नहीं बल्कि दिखावे के भी विरोधी थे गाँधीजी 


हिंदू समाज में सुधार के लिए गाँधीजी द्वारा किए गए प्रयासों में एक महत्वपूर्ण बात बाल विवाह और शादियों में होने वाले दिखावे का विरोध भी है। अपनी आत्मकथा में गाँधीजी ने १३ वर्ष की उम्र में हुए उनके विवाह, उस विवाह की वजह और तैयारियों का वर्णन किया है, आज एक शताब्दी बीत जाने के बाद भी उसमें बहुत अधिक अंतर आया है ऐसा लगता नहीं । लेकिन उसे पढ़ कर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस दौर में गाँधीजी के विचार कितने क्रांतिकारी थे। वे अपने युग से आगे का समाज देख रहे थे। एक अन्य अवसर पर गाँधीजी ने लङकियों की शादी की उम्र २० वर्ष रखने का सुझाव दिया। जबकि आज भी देश में बाल विवाह हो रहे हैं और कानून १८ वर्ष की लङकी के विवाह को वैध मानता है।


महात्मा गाँधीजी अपनी आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग में लिखते हैं - "जी चाहता है कि यह प्रकरण मुझे न लिखना पड़े तो अच्छा; परंतु इस कथामें मुझे ऐसी कितनी ही कड़वी घूंटें पीनी पड़ेंगी। सत्यके पुजारी होनेका दावा करके मैं इससे कैसे बच सकता हूं?

यह लिखते हुए मेरे हृदयको बड़ी व्यथा होती है कि १३ वर्षकी उम्र में मेरा विवाह हुआ। आज मैं जब १२-१३ वर्षके बच्चोंको देखता हूं और अपने विवाहका स्मरण हो आता है, तब मुझे अपनेपर तरस आने लगती है; और उन बच्चोंको इस बातके लिए बधाई देनेकी इच्छा होती है कि वे मेरी दुर्गतसे अब तक बचे हुए हैं। तेरह सालकी उम्रमें हुए मेरे इस विवाहके समर्थनमें एक भी नैतिक दलील मेरे दिमागमें नहीं आ सकती।

पाठक यह न समझें कि मैं सगाईकी बात लिख रहा हूं। सगाईका तो अर्थ होता है मां-बापके द्वारा किया हुआ दो लड़के-लड़कियोंके विवाहका ठहराव-वाग्दान। सगाई टूट भी सकती है। सगाई हो जानेपर यदि लड़का मर जाय तो उससे कन्या विधवा नहीं होती। सगाईके मामलेमें वर-कन्याकी कोई पूछ नहीं होती। दोनोंको खबर हुए बिना भी सगाई हो सकती है। मेरी एक-एक करके तीन सगाइयां हुईं। किंतु मुझे कुछ पता नहीं कि ये कब हो गईं। मुझसे कहा गया कि एक-एक करके दो कन्याएं मर गईं, तब मैं जान पाया कि मेरी तीन सगाइयां हुईं। कुछ ऐसा याद पड़ता है कि तीसरी सगाई सातेक सालकी उम्र में हुई होगी। पर मुझे कुछ याद नहीं आता कि सगाईके समय मुझे उसकी खबर की गई हो। लेकिन विवाहमें तो वर-कन्याकी उपस्थिति आवश्यक होती है, उसमें धार्मिक विधि-विधान होते हैं। अतः यहां मैं सगाईकी नहीं, अपने विवाह की ही बात कर रहा हूं। विवाहका स्मरण तो मुझे अच्छी तरह है।


पाठक जान ही गये हैं कि हम तीन भाई थे। सबसे बड़ेकी शादी हो चुकी थी। मंझले भाई मुझसे दो-तीन वर्ष बड़े थे। मेरे पिताजीने तीन विवाह एक साथ करनेका निश्चय किया-एक तो मंझले भाईका, दूसरे मेरे चचेरे भाई का, जिनकी उम्र मुझसे शायद एकाध साल ज्यादा होगी, और तीसरा मेरा। इसमें हमारे कल्याणका कोई विचार न था, हमारी इच्छाकी तो बात ही क्या? बस, केवल माता-पिताकी इच्छा और खर्च-वर्चकी सुविधा ही देखी गई थी।


हिंदू-संसारमें विवाह कोई ऐसी-वैसी चीज नहीं। वर-कन्याके मां-बाप विवाहके पीछे बरबाद हो जाते हैं। धन भी लुटाते हैं और समय भी बरबाद करते हैं। महीनों पहलेसे तैयारियां होने लगती हैं, तरह-तरहके कपड़े तैयार होते हैं, जेवर बनते हैं, जाति-भोजोंका तखमीना बनाया जाता है, खानेकी चीज़ोंकी होड़-सी लगती हैं। स्त्रियां, सुर हो या बे-सुर, गीत गा-गाकर अपना गला बैठा लेती हैं, बीमार भी पड़ जाती हैं, और पड़ोसियोंकी शांति भंग करती हैं सो अलग। पड़ोसी भी तो जब उनके यहां अवसर आता हैं तब ऐसा ही करते हैं, इसलिए इस सारे शोरगुलको तथा भोजोंकी जूठन व दूसरी गंदगीको चुपचाप सहन कर लेते हैं।


यह इतना झंझट तीन बार अलग-अलग करने के बजाय एक ही बार कर डालना क्या अच्छा नहीं? 'कम खर्च वाला नशीन।' क्योंकि तीन विवाह एक-साथ होनेसे खर्च भी खुले हाथ किया जा सकता था। पिताजी और चाचाजी वृद्ध थे। हम लोग थे उनके सबसे छोटे लड़के। इसलिए हमारे विवाह-संबंधी अपनी उमंगको पूरा करनेका भाव भी उनके मनमें था ही। इन कारणोंसे तीन विवाह एकसाथ करनेका निश्चय हुआ और उसके लिए, जैसा कि मै लिख चुका हूं, महीनों पहलेसे तैयारियां होती रहीं और सामग्रियां जुटती रहीं।

हम भाइयोंने तो सिर्फ उन तैयारियोंमें ही जाना कि हमारे विवाह होनेवाले हैं। मुझे तो इस समय इन मनसूबोंके अलावा कि अच्छे-अच्छे कपड़े पहनेंगे, बाजे बजते देखेंगे, तरह-तरहका भोजन, मिठाई मिलेगी, एक नई लड़कीके साथ हंसी-खेल करेंगे, और किसी विशेष भावका रहना याद नहीं आता। विषयभोग करनेका भाव तो पीछेसे उत्पन्न हुआ। यह किस प्रकार हुआ, सों मैं बता तो सकता हूं, परन्तु इसकी जिज्ञासा पाठक न रक्खें। अपनी इस शर्मपर मैं परदा डाले रखना चाहता हूं। किंतु जो बातें उनके जानने योग्य हैं, वे सब आगे आजायेंगी- वे भी इसलिए कि जो भव्य बिन्दु मैंने अपनी दृष्टि के सामने रखा है, उसका कुछ संबंध उनके ब्योरेके साथ है।

हम दोनों भाइयोंको राजकोटसे पोरबंदर ले गए। वहां हलदी लगाने इत्यादिकी जो विधियां हुईं वे रोचक तो हैं, पर उनका वर्णन छोड़ देने ही लायक है।

पिताजी दीवान थे तो क्या हुआ, थे तो आखिर नौकर ही। फिर राजप्रिय थे, इसलिए और भी पराधीन। ठाकुर साहबने आखिरी वक्ततक उन्हें जाने न दिया। फिर जब इजाजत दी भी तो दो दिन पहले, जबकि सवारीका जगह-जगह इंतिजाम करना पड़ा। पर दैवने कुछ और ही सोच रक्खा था। राजकोटसे पोरबंदर ६० कोस है। बैलगाड़ी से ५ दिनका रास्ता था। पिताजी तीन दिनमें आये। आखिरी मंजिलपर तांगा उलट गया। पिताजीको सख्त चोट आई। हाथ-पांव और बदनमें पट्टियां बांधे घर आये। हमारे लिए और उनके लिए भी विवाहका आनंद आधा रह गया। परंतु इससें विवाह थोड़े ही रुक सकते था? लिखा मुहूर्त्त कहीं टल सकता था? और मैं तो विवाहके बाल-उल्लासमें पिताजीकी चोटको भूल ही गया।

मैं जितना पितृ-भक्त था उतना ही विषय-भक्त भी। यहां विषयसे मतलब किसी एक इंद्रियके विषयसे नहीं, बल्कि भोग-मात्रसे है। यह होश तो अभी आना बाकी था कि माता-पिताकी भक्तिके लिए पुत्रको अपने सब सुख छोड़ देने चाहिए। ऐसा होते हुए भी, मानो इस भोगेच्छाकी सजा मुझे मिलनी हो, मेरी जिंदगीमें एक ऐसी दुर्घटना हुई, जो मुझे आज भी कांटेकी तरह चुभती है। जब-जब निष्कुलानंदकी यह पंक्ति-


त्याग न ठके रे बैराग बिना, करिये कोटि उपाय जी'


गाता अथवा सुनता हूं, तब-तब यह दुर्घटना और कटु-प्रसंग मुझे याद आता है और शर्मिन्दा करता रहता है।


पिताजीने खुद मानो थप्पड़ मारकर अपना मुंह लाल रक्खा। शरीरमें चोट और पीड़ाके रहते हुए भी विवाह-कार्यमें पूरा-पूरा योग दिया। पिताजी किस अवसरपर कहां-कहां बैठे थे, यह सब मुझे ज्यों-का-त्यों याद है। बाल-विवाह पर विचार करते हुए पिताजीके कार्यपर जो टीका-टिप्पणी आज मैं कर रहा हूं, उसका स्वप्न भी उस समय न आया था। उस समय तो मुझे वे सब बातें रुचिकर

और उचित ही मालूम होती थीं। क्योंकि एक तो विवाहकी उत्सुकता थी और दूसरे पिताजी जो-कुछ करते थे वह सब उस समय ठीक ही जान पड़ता था। अतः उस समयकी स्मृति आज भी मेरे मनमें ताजा है।

हमारा पाणि-ग्रहण हुआ, सप्तपदीमें वर-वधू साथ बैठे, दोनोंने एक-दूसरेको कसार खिलाया,और तभीसे हम दोनों एक साथ रहने लगे।"

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मार्च,1928 में मद्रास (अब चेन्नई) में छात्रों  को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा - "तुम्हें अपने ऊपर इतना अधिकार होना चाहिए कि 16 वर्ष से कम की लड़की से विवाह न करो. यदि मुमकिन होता तो मैं निचली सीमा 20 साल रखता।"


गांधी, सन 1926 के यंग इंडिया के एक अंक में मद्रास में एक १३ वर्ष की विवाहित बालिका की उसके पति द्वारा हत्या कर देने की एक घटना का जिक्र करते हुए लिखते हैं " बच्चे की शादी पाप कर्म है. मेरे हाथ में सत्ता हो या मेरी कलम में यथेष्ट ताकत हो तो मैं उनका उपयोग प्रत्येक बाल विवाह को रोकने में करूं।"


(क्रमशः )

(यह श्रृंखला मेरे फेसबुक wall मनोज जोशी page मनोज जोशी और मन का ओज पर भी उपलब्ध है।)

Friday, October 9, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का रामराज्य (१८)

(गतांक से आगे)

जातिवादी रूढ़ियों का विरोध हर हिंदू का कर्तव्य : महात्मा गाँधी

महात्मा गाँधी मानते थे कि जातिवादी रूढ़ियों का विरोध हर हिंदू का कर्तव्य है। दरअसल, गाँधीजी के जीवन के इस प्रसंग की कहीं चर्चा ही नहीं होती कि उन्हें भी जाति्वादी रूढ़ियों के कारण अपमानित होना पड़ा था। 

यह वह समस्या था जब यह माना जाता था कि समुद्र यात्रा करने से (यानी विदेश जाने) धर्म भ्रष्ट हो जाता है। गाँधीजी के परिवार ने उन्हें बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए विलायत भेजने का निर्णय लिया। गाँधीजी से पहले तक मोढ़ वणिक समुदाय से कोई भी व्यक्ति विदेश यात्रा पर नहीं गया था। इस निर्णय से पूरी जाति में हलचल मच गई। जाति की सभा बुलाई गई । यहां जाति पंचायत ने उनसे जवाब तलब किया। जाति के सरपंच ने कहा 'जाति का ख्याल हैं कि तूने विलायत जाने का जो विचार किया हैं वह ठीक नहीं हैं । हमारे धर्म में समुद्र पार करने की मनाही हैं , जिस पर यह भी सुना जाता है कि वहां पर धर्म की रक्षा नहीं हो पाती । वहां साहब लोगों के साथ खाना-पीना पड़ता हैं । गांधी जी ने जवाब दिया , 'मुझे तो लगता हैं कि विलायत जाने में लेशमात्र भी अधर्म नहीं है । मुझे तो वहां जाकर विद्याध्ययन ही करना है । फिर जिन बातों का आपको डर है उनसे दूर रहने की प्रतिक्षा मैने अपनी माताजी के सम्मुख ली है, इसलिए मैं उनसे दूर रह सकूंगा ।' विलायत जाने का अपना निश्चय मैं बदल नहीं सकता । मुझे अपनी माताजी और अपने भाई की अनुमति भी मिल चुकी हैं ।' सरपंच ने क्रोधित होकर गांधी जी से कहा कि तू जाति का हुक्म नहीं मानेगा? गांधी जी ने अपने जवाब में कहा मैं लाचार हूं। इस जवाब से नाराज सरपंच ने आदेश दिया, 'यह लड़का आज से जातिच्युत माना जायेगा । जो कोई इसकी मदद करेगा अथवा इसे बिदा करने जायेगा , पंच उससे जवाब तलब करेगे और उससे सवा रुपया दण्ड का लिया जायेगा ।'


कन्याकुमारी में भी हुआ अपमान


यही नहीं १९२५ में गाँधीजी कन्याकुमारी गए और वहाँ उन्हें भगवती अम्मान मन्दिर में प्रवेश की अनुमति देने से मना कर दिया गया था. क्योंकि वे विलायत गये थे. मन्दिर के रिकार्ड से भी यह बात पता चलती है कि उन्होंने मंदिर के बाहर ही खड़े होकर पूजा-अर्चना की थी। ४ साल बाद २९ मार्च 1९२८ को नवजीवन में प्रकाशित गाँधीजी के आलेख में इस घटना का उल्लेख है। वे इस घटना पर नाराजगी जाहिर करते हुए लिखते हैं  'इसे कैसे सहन किया जा सकता है? क्या कन्याकुमारी प्रदूषित हो सकती है? क्या इस परंपरा का प्राचीन काल से पालन हो रहा है।’  'मेरी अंतरात्मा चीख रही है कि ऐसा नहीं हो सकता. यदि ऐसा किया गया तो यह पापपूर्ण है. जो पापपूर्ण हो उसे नहीं रहना चाहिए अथवा वह अपनी प्राचीनता के कारण प्रशंसा के योग्य बन जाती है.।’ 'परिणामस्वरूप, इस बात को लेकर मेरा विश्वास और बढ़ गया है कि इस कलंक को हटाने लिए बलशाली प्रयास करना, प्रत्येक हिन्दू का दायित्व है.' 


जाति से मानपत्र लेते समय भी किया जातिवाद का विरोध

२४ जनवरी, १९२८ को सौराष्ट्र के मोरबी रियासत के राजा की उपस्थिति में मोढ़ बनिया जाति के लोगों ने महात्मा गांधी को मानपत्र भेंट किया.  मानपत्र लेने के अवसर पर गांधी ने समूची जाति-व्यवस्था को ही रामराज्य अथवा स्वराज्य के लिए घातक बताते हुए कहा था - ‘मैं यह माननेवाला रहा हूं कि इन छोटे-छोटे बाड़ों का नाश होना चाहिए. मुझे इस बारे में कोई शक नहीं कि हिन्दू-धर्म के भीतर जातियों के लिए कोई जगह नहीं है. और यह मैं मोढ़ या दूसरी जो भी जातियां यहां पर हों उन्हें ध्यान में रखकर कहता हूं. ...आप सबसे मोढ़ जाति के निमित्त मैं यह कहना चाहता हूं कि जाति के बाड़ों को भूल जाइये. आज जो जातियां हैं उनको यज्ञ की आहूति के रूप में उपयोग कर स्वाहा कीजिए और नई जाति न बनने दीजिए.’


उन्होंने आगे कहा - ‘...आप इन छोटे-छोटे बाड़ों के खड्डों में पड़े रहेंगे तो बदबू उठेगी. डॉक्टर खड्डे भर देने की सलाह देते हैं, उसी तरह यह भी समझ लीजिए कि जाति के बाड़े भी मनुष्य के लिए घातक हैं. यह समझ लीजिए कि ईश्वर कभी ऐसी घातक रचना नहीं कर सकता. ...बहस और अज्ञान को ज्ञान मत कहिए. आज दुनिया में जुदा-जुदा धर्मों का मुकाबला हो रहा है. लेकिन यदि हम खुले मन से देखें तो जान पड़ेगा कि हमारी जातियां हमारी तरक्की को, धर्म को, स्वराज्य को और रामराज्य को रोकने का कार्य करती है. मैं तो इन बाड़ों को तोड़ने की कोशिशें तेज करना चाहता हूं. आपको पता नहीं होगा कि मैंने अपने एक लड़के का ब्याह जाति से बाहर किया है.’


 भोपाल के मोढ़ समाज की प्रशंसा

१० सितंबर १९२९ को भोपाल यात्रा के दौरान स्थानीय मोढ़ वणिक समाज ने गाँधीजी का सम्मान किया था। मोढ़ों की बगिया में आयोजित इस सम्मान समारोह में गाँधीजी ने विलायत यात्रा के कारण उन्हें जाति से बाहर किए जाने का किस्सा सुनाते हुए भोपाल के मोढ़ समाज की प्रशंसा की थी और कहा था कि भोपाल का मोढ़ समाज अधिक प्रगतिशील है। प्रसिद्ध पत्रकार स्वतंत्रता सेनानी पं. माखनलाल चतुर्वेदी ने अपनी कर्मवीर पत्रिका में इस किस्से को प्रकाशित भी किया था।


(क्रमशः)

Tuesday, October 6, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का राम राज्य (१७)

 (गतांक से आगे)

हिंदू समाज और देश का बिखराव रोका पूना पैक्ट ने


“मेरी समझ में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचन की  व्यवस्था  करना हिन्दू धर्म  को बर्बाद करने का इंजेक्शन लगाना है. इस से दलित वर्गों का कोई लाभ नहीं होगा।” यह कहते हुए महात्मा गाँधीजी ने अंग्रेजों द्वारा दलितों को दिए गए jप्रथक निर्वाचन का विरोध किया। उन्होंने जेल के भीतर ही अनशन शुरू कर दिया। आखिरकार २४ सितंबर १९३२ को बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर और महात्मा गाँधी के बीच समझौता हुआ। 

इस समझौते की पूरी पृष्ठभूमि को देखेंगे तो पता लगता है कि अंग्रेजों ने दलितों को प्रथक निर्वाचन का अधिकार देकर हिंदू समाज में बिखऱाव की कोशिश की थी। महात्मा गाँधी ने इसको समझ लिया था। वे बंग भंग और मुसलमानों को दिए गए प्रथक निर्वाचन के अधिकार का हश्र देख चुके थे। इन्हीं दो निर्णयों ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग का आधार बनाया, जिसे अंत तक रोका नहीं जा सका।

सितम्बर १९३२ में प्रथक निर्वाचन की घोषणा से पहले

लंदन में आयोजित गोलमेज़ सम्मेलन के दूसरे दौर में १२ नवम्बर १९३१ को गांधी जी ने अछूतों की ओर से कहा - "मेरा दावा है कि अछूतों के प्रश्न का सच्चा प्रतिनिधित्व तो मैं कर सकता हूँ। यदि अछूतों के लिए पृथक् निर्वाचन मान लिया गया, तो उसके विरोध में मैं अपने प्राणों की बाजी लगा दूँगा।” भारत आने पर गिरफ्तार किए गए महात्मा गाँधीजी यरवदा जेल से भी इस प्रथक निर्वाचन का विरोध करते रहे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखे, लेकिन ब्रिटिश मंत्री रैमजे मेकडोनाल्ड ने दलितों के प्रथक निर्वाचन को मंजूरी दे दी। नाराज गाँधीजी ने जेल में ही अनशन शुरू  कर दिया। गाँधीजी का कहना था कि इससे दलित वर्ग हिन्दू समाज से अलग हो जाएगा , जिससे हिन्दू समाज और हिन्दू धर्म विघटित हो जायेगा। अंतत: देश को एक रखना मुश्किल हो जाएगा।  २४ सितंबर १९३२ को पूना पैक्ट हुआ और वंचित वर्ग के लिए विधान मंडलों में स्थान सुरक्षित किए गए। यह व्यवस्था आज तक जारी है।

यह भी हमें स्वीकार करना होगा कि गाँधीजी के प्रयासों से ही देश में छुआछुत की भावना में कमी आई। वर्तमान दौर में जब हम चुनावी राजनीति के लिए समाज के विघटन के प्रयासों को देखते हैं तब गाँधीजी की बात और उनके अनशन का अर्थ समझ आता है।


(क्रमशः)

Saturday, October 3, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का रामराज्य (१६)

हिंदू समाज में सुधार के लिए गाँधीजी के उपाय

(गतांक से आगे)


आज से यह श्रृंखला नए सौपान में प्रवेश कर रही है। अगली कुछ  क़ड़ियों में हम इस बात पर चर्चा करेंगे कि महात्मा गाँधी ने हिंदू समाज की बुराइयों को दूर करने के लिए क्या उपाय किए। चर्चा की शुरुआत छुआछूत की बुराई से करते हैं।


1६ नवंबर १९३५ को हरिजन में महात्मा गाँधी लिखते हैं – ‘प्रचलित जाति प्रथा वर्णाश्रम के बिल्कुल विपरीत है, अत: इसको जितना जल्दी समाप्त कर दें उतना अच्छा है। जाति का धर्म से कोई संबंध नहीं है, यह आध्यात्मिकता और राष्ट्रीयता दोनों में बाधक है।’


गांधीजी कहते थे कि अगर कोई सनातनी यह सिद्ध कर देगा कि वेदों ने अस्पृश्यता को मान्यता दी है तो वे वेदों को छोड देंगे पर अस्पृश्यता को नहीं छोड़ेंगे। दरअसल उनका यह वक्तव्य उनके इस भरोसे को जताता है कि वेदों में कहीं भी छुआछूत का उल्लेख नहीं है।


महात्मा गाँधी बचपन से ही अस्पृश्यता को नहीं मानते थे। सत्य के साथ मेरे प्रयोग में महात्मा गाँधी लिखते हैं कि वे बचपन में उकाभाई भंगी को न छूने के अपनी माँ के आदेश का पालन वे नहीं कर पाए थे. आत्मकथा में दक्षिण अफ्रीका की भी एक घटना का वर्णन उन्होंने किया है।  कस्तूरबा ने जब एक अस्पृश्य क्लार्क का पॉट साफ करने से इन्कार किया तो गाँधीजी उन्हें घर से निकाल देने पर आमादा हो गये थे।

भारत आकर महात्मा गांधी ने अहमदाबाद में आश्रम शुरू किय। यहां एक बुनकर परिवार को आश्रम में रखने के कारण गाँधीजी को खासे विरोध का सामना करना पड़ा।  अहमदाबाद के सारे वैष्णव इतना गुस्सा हो गए कि आश्रम को आर्थिक मदद मिलना बंद हो गई। इस मामले में तो महात्मा गाँधी की पत्नी कस्तुरबा भी आसानी से इस निर्णय पर सहमत नहीं हो पाईं थीं। गाँधीजी को अपने सहयोगी मगनलाल गाँधी और उनकी पत्नी संतोक बहन का भी विरोध सहना पड़ा था। छुआछूत का विरोध करने को लेकर उन पर  जानलेवा हमले भी हुए थे। जगन्नाथपुरी के मंदिर में प्रवेश करने के समय उनकी गाडी पर आक्रमण हुआ था। पूना में गाँधीजी की गाडी पर बम फेंका गया था। पूर्व में मैं बिड़ला मंदिर के शुभारंभ अवसर का जिक्र कर चुका है। महात्मा गाँधी को जब यह भरोसा दिलाया गया था कि इस मंदिर में प्रवेश पर जाति के आधार पर रोक नहीं होगी तभी वे कार्यक्रम में शामिल होने को राजी हुए थे।१९३४ में उन्होंने हरिजन सेवक संघ की स्थापना की। हरिजन-सेवक-संघ का प्रथम अध्यक्ष  घनश्यामदास बिड़ला और मंत्री अमृतलाल ठक्कर  जो "ठक्कर बापा" के नाम से प्रसिद्ध थे को नियुक्त किया।


(क्रमश:)

Friday, October 2, 2020

हिंदुत्व और गाँधीजी का रामराज्य (१५)

 हिंदुत्व और गाँधीजी का


रामराज्य (१५)


(गतांक से आगे)


आज महात्मा गाँधीजी की जयंती है। आज के वातावरण में  गाँधीजी को श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए एक विशेष प्रसंग का उल्लेख करना चाहता हूँ । सामान्य रूप से इसका उल्लेख संभवतः किसी अगली कङी में करता, लेकिन हाल ही में बाबरी ढाँचा ढहाने के सभी आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषमुक्त किए जाने से सोशल मीडिया पर बनाए जा रहे माहौल के कारण इसका उल्लेख आज जरुरी हो गया है।


२० फरवरी १९२१ को महात्मा गाँधी ने किए थे रामलला के दर्शन

अक्सर यह कहा जाता है कि १९४९ में किसी व्यक्ति ने चुपचाप विवादित स्थल पर रामलला की प्रतिमा रख दी और उसके बाद विवाद बढ़ा … !  लेकिन गाँधी वांग्मय खण्ड १९ के पृष्ठ ४६१ पर तो लिखा है कि महात्मा गाँधीजी ने फरवरी १९२१ में रामलला के दर्शन किए थे। २० मार्च १९२१ के नवजीवन में भी यह प्रकाशित हुआ है। गाँधीजी २० फरवरी १९२१ को अयोध्या पहुंचे  थे। गाँधी वांग्मय के अनुसार ,महात्मा गांधी ने इस यात्रा का विवरण इस प्रकार बताया -


'अयोध्या में जहां भगवान रामचंद्र का जन्म हुआ कहा जाता है, उसी स्थान पर एक छोटा सा मंदिर है। जब मैं अयोध्या पहुंचा तो वहां मुझे ले जाया गया। साथी श्रद्धालुओं ने मुझे सुझाव दिया कि मैं पुजारी से विनती करूं कि वह भगवान सीता-राम की मूर्तियों के लिए पवित्र खादी का उपयोग करें, मैंने विनती तो की लेकिन उस पर अमल शायद ही हुआ हो। जब मैं दर्शन करने गया, तब मैंने मूर्तियों को मैली मलमल और जरी के वस्त्रों में पाया, यदि मुझ में तुलसीदास जी जितनी गाढ़ भक्ति की साम‌र्थ्य होती तो मैं भी उस समय तुलसीदास जी की तरह हठ पकड़ लेता।'


'कृष्ण मंदिर में तुलसीदास जी ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक धनुष-बाण लेकर कृष्ण राम रूप में प्रकट नहीं होते, तब तक तुलसी मस्तक नहीं झुकेगा। लेखकों का कहना है कि जब गोस्वामी ने ऐसी प्रतिज्ञा की, तब चारों ओर उनकी आंखों के सामने भगवान रामचंद्र की मूर्तियां खड़ी हो गई और तुलसीदास जी का मस्तक सहज ही नत हो गया।'


'मंदिर में भगवान सीता-राम के दर्शन के समय अनेक बार मेरा ऐसा हठ करने का मन हुआ कि हमारे भगवान राम को जब पुजारी खादी पहनाकर स्वदेशी बनाएंगे, तभी हम अपना माथा झुकाएंगे लेकिन मुझे पहले तुलसीदास जी जितना तप करना होगा, तुलसीदास जी की अभूतपूर्व भक्ति को प्राप्त करना होगा।'

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महात्मा गाँधी के खादी के आग्रह पर चर्चा फिर कभी करेंगे । लेकिन एक बात तो मानना पङेगी कि ६ दिसम्बर १९९२ को जो ढाँचा ढहाया गया उसे मस्जिद तो नहीं माना जा सकता। 

(क्रमशः )



Monday, September 28, 2020

हिंदुत्व और गाँधीजी का राम राज्य (१४)

(गतांक से आगे)

हिंदुत्व से लिए महात्मा गाँधी ने 11 व्रत

आम तौर पर हम महात्मा गाँधी को केवल अहिंसा के पुजारी के रूप में ही याद करते हैं। कुछ अधिक बोलने की बारी आती है तो सत्य और अहिंसा कह कर अपने आपको धन्य मान लेते हैं। या कुछ लोग गाँधीजी के तीन बंदर बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो की बात करते हैं। लेकिन गाँधीजी का दर्शन केवल इतना ही भर नहीं था।

मैंने अपने अध्ययन में जो समझा उससे लगता है कि गाँधीजी की पूरी राजनीति भारत की अध्यात्मिक चेतना का सार्वजनिक जीवन में उपयोग का उदाहरण है। आप विचार कीजिए, आश्रम में रहने के लिए उन्होंने 11 व्रत तय किए थे, वह उन्होंने कहां से लिए थे? फेसबुक जैसे माध्यम पर इन 11 व्रत को विस्तार से लिखने के लिए शायद 11 पोस्ट भी कम पढ़ जाएं और मैं अपने मूल विषय से भटक ही जाऊं। केवल उनको एक-एक लाइन में परिभाषित करने का प्रयास कर रहा हूँ।

1) अहिंसा – किसी के प्रति बुरे विचार लाना और क्रोध करना भी हिंसा है

2) सत्य – सत्य ही परमेश्वर है

3) अस्तेय – अपनी जरूरत से अधिक लेना भी एक प्रकार का अस्तेय (चोरी) है

4) ब्रह्मचर्य – ब्रह्म की खोज का आचरण ही ब्रह्मचर्य है

5) अपरिग्रह – जिस वस्तु की जरूरत न हो उसका संग्रह न करना

6) शरीर – श्रम: - जो श्रम नहीं करता उसे भोजन करने का अधिकार नहीं है

7) अस्वाद – खान- पान पर संयम

8) अभय – भय से मुक्ति

9) सर्व- धर्म समभाव- सभी पूजा पद्धतियों का सम्मान

10) स्वदेशी – अपने आसपास के लोगों की सेवा का भाव ही स्वदेशी का मूल भाव है। स्वदेशी और स्थानीय वस्तुओं का उपयोग उसका केवल प्रतीक मात्र है

11) स्पर्श भावना – छुआछूत का भेद नहीं रखना
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उनका प्रिय भजन- ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, जो पीड़ पराई जाने रे… आश्रम में गाँधीजी के जीवन के बारे में पढ़ने पर पता लगता है कि उन्होंने इस भजन को पूरी तरह आत्मसात कर लिया था। हर छोटे से छोटे व्यक्ति की परेशानी का वे ध्यान रखते थे और उसे स्वयं ही हल करते थे। गौ शाला में रहने वाले् बालक के लिए उन्होंने बा की पुरानी साड़ियों से गद्दा बनाया था। ऐसे और भी किस्से पढ़ने को मिल जाते हैं। मुझे तो इनको पढ़ कर यही लगता है कि महात्मा गाँधी ने भारत की आजादी की लड़ाई के लिए भारतीय यानी हिंदू संस्कृति के ज्ञान का उपयोग किया। गाँधीजी की अहिंसा भयग्रस्त नहीं बल्कि भय से मुक्ति की अहिंसा थी। गाँधीजी ने अनेक अवसरों पर यह उल्लेख किया कि वे स्वयं हिंदू हैं। हिंदू धर्म की परंपराओं में उनका वि‌श्वास है। हिंदू धर्म किसी एक ईश्वर या किसी एक पूजा पद्धति को नहीं मानता। यही वजह है कि हिंदू सर्व धर्म समभाव में भरोसा करता है। पूर्व की एक कड़ी में यह भी स्पष्ट हो चुका है कि गाँधीजी धर्मांतरण के विरोधी थे।

(क्रमश:)





Saturday, September 26, 2020

हिंदुत्व और गाँधीजी का राम राज्य (१३)

 


(गतांक से आगे)

जैन मुनि के समक्ष प्रतिज्ञा लेने के बाद ही मॉं ने विदेश जाने दिया


जब मोहनदास करमचंद गाँधी ने अपनी माता पुतलीबाई से विदेश जाने की अनुमति माँगी तब उनकी माँ ने मना कर दिया, क्योंकि माँ को आशंका थी, कि वे विदेश जाकर माँस आदि का भक्षण करने न लग जाये। उस समय एक जैन मुनि बेचरजी स्वामी के समक्ष गाँधीजी द्वारा तीन प्रतिज्ञा ( माँस, मदिरा का सेवन न करने व परस्त्री के समीप न जाने) लेने पर माँ ने विदेश जाने की अनुमति दी। इस तथ्य को उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’  में लिखा है।


स्पष्ट है कि गाँधीजी का परिवार जैन मत के संतों के संपर्क में था और उनके प्रति परिवार में एक विश्वास व आस्था का भाव था। गाँधीजी का आगे का संस्मरण तो इस बात की पुष्टि करता है कि युवा मोहनदास को धर्म परिवर्तन करके ईसाई या इस्लाम धर्म ग्रहण करने से रोकने वाले भी एक जैन संत ही थे। श्रीमद् राजचंद्र जिन्हें गुजराती में महात्मा नो महात्मा (महात्मा के महात्मा यानी गाँधीजी के महात्मा) कहा जाता है, वास्तव में जैन संत थे। वे उम्र में गॉंधी जी से दो वर्ष बढ़े थे। गॉंधीजी ने लिखा है कि उनके आध्यात्मिक जीवन पर जिन लोगों ने सबसे अधिक प्रभाव डाला है उनमें श्रीमद् राजचंद्र अग्रणी थे। जिन्हें गाँधीजी रायचंद भाई कहते थे।


महात्मा गाँधी ने लिखा है- ‘जिस समय मेरे मन में हिंदू धर्म के बारे में शंका उत्पन्न हो गई थी, उस समय उसके निवारण में मदद देने वाले रायचंद भाई ही थे. 1893 में दक्षिण अफ्रीका में मैं कुछ ईसाई सज्जनों के संपर्क में आया. उनका जीवन निर्मल था. वे धर्मपरायण थे. अन्य धर्मावलंबियों को ईसाई बनने के लिए समझाना उनका मुख्य कार्य था. हालांकि उनसे मेरा संपर्क व्यावहारिक कार्य को लेकर ही हुआ था, फिर भी वे मेरे आत्मिक कल्याण की चिंता में लग गए. इससे मैं अपना एक कर्तव्य समझ सका. मुझे यह प्रतीति हो गई कि जब तक मैं हिन्दू धर्म के रहस्य को पूरी तरह नहीं समझ लेता और मेरी आत्मा को उससे संतोष नहीं होता, तब तक मुझे अपने जन्म का धर्म नहीं छोड़ना चाहिए. इसलिए मैंने हिन्दू और अन्य धर्म-पुस्तकों को पढ़ना आरंभ किया. ईसाइयों और मुसलमानों के धर्मग्रन्थों को पढ़ा. लन्दन में बने अपने अंग्रेज मित्रों के साथ पत्र-व्यवहार किया. उनके सामने अपनी शंकाओं को रखा. उसी तरह हिन्दुस्तान में भी जिन लोगों पर मेरी थोड़ी बहुत आस्था थी उनके साथ भी मैंने पत्र-व्यवहार किया. इनमें रायचन्दभाई मुख्य थे. उनके साथ तो मेरे अच्छे संबंध स्थापित हो चुके थे. उनके प्रति मेरे मन में आदरभाव था. इसलिए उनसे जो मिल सके उसे प्राप्त करने का विचार किया. उसका परिणाम यह हुआ कि मुझे शांति मिली. मन को ऐसा विश्वास हुआ कि मुझे जो चाहिए वह हिन्दू धर्म में है. इस स्थिति का श्रेय रायचन्द भाई को था; इसलिए पाठक स्वयं इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि उनके प्रति मेरा आदरभाव कितना नहीं बढ़ा होगा.’

कुल मिलाकर जैन दर्शन का महात्मा गांधी के जीवन में गहरा प्रभाव था। उनके राजनीतिक और अध्यात्मिक जीवन में यह स्पष्ट झलकता भी है। 

(क्रमश:)