Thursday, July 7, 2022

सवाल यह है कि इन सवालों के जवाब कौन देगा

सवाल यह है कि इन सवालों के जवाब कौन देगा

#मनोज_जोशी

बुधवार को भोपाल में नगर निगम चुनाव के लिए मतदान हो गया। अब हर जुबान पर दो ही प्रश्न हैं। महापौर कौन बन रहा है ?और परिषद किसकी बनेगी ? वैसे सैद्धांतिक बात तो यह है कि अगर यह पता ही होता तो चुनाव क्यों कराते? सीधे ही महापौर और हर वार्ड में पार्षद घोषित कर देते 😊  इसी प्रश्न का जवाब तलाशने के लिए ही तो चुनाव हुआ है। मतगणना होगी और सच सामने आ जाएगा।


लेकिन इस पूरे चुनाव में और खास तौर से मतदान वाले दिन के माहौल को देखकर मेरे मन में कुछ बातें हैं। कांग्रेस के बारे में तो शुरू से यही कहा जाता है कि वहां कैंडिडेट चुनाव लड़ता है और इस बात से कोई भी इनकार नहीं करेगा कि महापौर पद के लिए  कांग्रेस के पास विभा पटेल से बेहतर कोई और उम्मीदवार नहीं था।

लेकिन भाजपा में तो ऐसा ही कहा जाता रहा है कि संगठन चुनाव लड़ता है। देवतुल्य कार्यकर्ताओं के इस संगठन में लगी हुई घुन नेताओं को दिखे या ना दिखे आम आदमी को तो दिखने लगी है। मतदाता सूची में अपना नाम तलाशने के लिए लोग यहां-वहां भटक रहे थे और नाम नहीं मिलने पर निराश और नाराज़ होकर लौट रहे थे। जिन इलाकों को भाजपा का कोर वोटर वाला इलाका माना जाता है, वहां भी सैकड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब हो गए। मेरा मन यह प्रश्न पूछ रहा था कि जिस पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष भी खुद को अपने बूथ की मतदाता सूची का पन्ना प्रभारी बताता है, उस देवतुल्य कार्यकर्ता को यह क्यों नहीं पता चला कि उसके पन्ने से लोगों के नाम कट गए हैं। आखिर देवतुल्य यानी देवता के समान का वह कार्यकर्ता कहां अपनी पूजा करा रहा था ? या मंच से जिसे देवतुल्य कहा जाता है उसे भक्त तो छोड़िए चाटुकार बनने के लिए मजबूर कर दिया गया है। गले में गमछा डाल कर पार्टी के बड़े नेताओं के आसपास चक्कर लगाना, दिन भर नेता जी के बंगले के बाहर या प्रदेश कार्यालय में खड़े होकर गपशप करना और हमेशा राजनीतिक समीकरणों पर ही चर्चा करना यही राजनीतिक गतिविधि रह गई है। पार्टी के कार्यक्रम आते हैं, पैसा देकर फ्लेक्स बन जाते हैं, ठेकेदार उन्हें लगा देता है और सत्ता में है इसलिए किसी न किसी बहाने से प्रशासन भीड़ जुटा देता है। नतीजा उस कार्यकर्ता का अपने क्षेत्र की जनता या मतदाता से सीधा संपर्क ही नहीं हो पाता। कुल मिलाकर इस सब में हुआ यह कि जब मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा था तब बड़े नेता जी ने ध्यान नहीं दिया और कार्यकर्ता को आदेश नहीं मिला इसलिए उसने कुछ नहीं किया। कुछ शातिर दिमाग लोगों ने अपने विरोधियों के नाम कटवा दिए। पार्टी के भीतर मची सिर फुटौव्वल का एक उदाहरण ऐसा भी है जिसमें प्रबल दावेदार का नाम ही मतदाता सूची से कटवा दिया गया जब तक वह जागे तब तक देर हो चुकी थी नतीजा टिकट मिलने के बाद भी वापस करना पड़ा। पार्षदों के टिकट वितरण में किस क्षेत्र में किस नेता ने, किसके लिए, कितना जोर लगाया और अपने मनपसंद उम्मीदवार को टिकट नहीं मिलने पर पूरे प्रचार के दौरान उन नेता जी ने और उनसे जुड़े कार्यकर्ताओं ने कितना काम किया इसका विश्लेषण करेंगे तो हर विधानसभा क्षेत्र में मतदान के प्रतिशत की हकीकत सामने आ जाएगी।

प्रशासन ही सब कुछ करेगा इस मानसिकता के नतीजे का व्यक्तिगत उदाहरण देता हूं। महापौर और पार्षदों के लिए पहली बार हुए आरक्षण के समय जब मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा था, मुझे अपना नाम मतदाता सूची में नहीं मिला। मैंने आवेदन दिया और वार्ड 82 में नाम जुड़ गया, जबकि मैं वार्ड 83 में निवास करता हूं। सभी संबंधित अधिकारियों को बताने के बावजूद मुझे भी कल वार्ड 82 में वोट डालने जाना पड़ा। मेरे पते के आधार पर वहां नाम नहीं मिल रहा था क्योंकि पता तो 83 नंबर का था। कुछ देर मशक्कत के बाद नाम मिला और मैं वोट डाल पाया। सवाल यह है कि वार्ड 82 के पार्षद प्रत्याशी से मेरा क्या लेना देना ? और इस उदाहरण से यह भी समझ में आता है कि प्रशासन ने नाम जोड़ने घटाने में कितनी रूचि ली होगी।

इसी तरह की एक और बात। निर्वाचन आयोग ने नियम बना दिया है कि पर्चियां भी बीएलओ बांटेंगे। बीएलओ यानी सरकारी बाबू जिनकी आदत दफ्तर में बैठकर काम करने की है वह चाह कर भी घर-घर घूम कर पर्चियां नहीं बांट सकते। यदि राजनीतिक कार्यकर्ता घर-घर जाकर पर्चियां बांटें तो इसमें क्या परेशानी है ? यह मेरे समझ में तो नहीं आता। 

चुनाव परिणाम चाहे जो हों लेकिन सभी प्रश्न जवाब मांगेंगे। आखिर सवा साल बाद विधानसभा के चुनाव भी होना है। 



Monday, October 25, 2021

बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं.....

 बचपन जैसी दिवाली  मनाते हैं.....


हुई करवा चौथ अब साफ़-सफाई में जुट जाते हैं

चूने और नील वाली बात हुई पुरानी तो क्या,

बाजार से ऑइल पेंट लाकर खुद पुताई करते हैं

अलमारी खिसकाएं शायद कोई खोई चीज़ 

वापस  मिल जाए, और हम मुस्कराएं

जैसे बचपन में खिलौना मिल जाता था

और हम इठलाते थे

आओ, बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

घर का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं 

दौड़- दौड़  के घर का हर सामान लाते हैं 

कुछ पैसे पटाखों के लिए बचाते हैं

आओ, बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

बैरागढ़ जाकर थोक की दुकान से पटाखे लाते है

मुर्गा ब्रांड , लक्ष्मी बम और रस्सी बम और सांप की गोली लेकर आते हैं

दो -तीन दिन तक पटाखे  छत धूप में सुखाते हैं

बार-बार सब दोस्तों के पटाखे गिनते जाते है

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं 

मोहल्ले से निकल कर न्यू मार्केट की रौनक देखने जाते हैं

दुकान पर रखी  चीजों को उठाते हैं

और रेट पूछकर वापस रख देते हैैं

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं 

बिजली की सिरीज़ और कैंडल लटकाते है

याद करो

केसे सिरीज बनाते थे, छत से लटकाते थे

मास्टर  बल्ब लगाते थे

टेस्टर रखकर पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते थे

एक बार फिर दो-चार बिजली के झटके भी  खाते हैं

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

धनतेरस के दिन कटोरदान लेकर आते हैं

घर पर बने चकली गुजिया  खाते हैं

प्रसाद की  थाली   पड़ोस में  देने जाते हैं

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

खील में से  धान बिनवाते हैं 

खांड  के खिलोने के साथ धान खाते है 

अन्नकूट की तैयारी में हाथ बंटाते हैं

नए नए पकवान खाते हैं

भैया-दूज के दिन बहन से तिलक करवाते हैं 

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

दिवाली बीत जाने पर बिन फूटे पटाखों का बारूद जलाते हैं घर की छत पे जले हुए राकेट पाते हैं 

बचपन के सारे दोस्त इकट्ठा हो जाते हैं

 चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं


Wednesday, July 7, 2021

भागवत के बयान पर विवाद क्योंकि व्हाट्सएप और ब्रेकिंग न्यूज़ से हमारी याददाश्त हुई कमजोर

  भागवत के बयान पर विवाद क्योंकि
 व्हाट्सएप और ब्रेकिंग न्यूज़ से हमारी याददाश्त हुई कमजोर

3 दिन पहले संघ सरसंघचालक मोहन भागवत का बयान आया कि भारत के हिंदुओं और मुसलमानों का डीएनए एक ही है। मीडिया में आए इस बयान से हलचल मच गई। ब्रेकिंग न्यूज़ और व्हाट्सएप मैसेज के इस युग में ज्यादातर लोग ना तो संदर्भ देखते हैं और ना उन्हें पुरानी बातें याद रहती हैं। 

आरएसएस और मुसलमान यह हमेशा से ही विघ्न संतोषी लोगों का प्रिय विषय रहा है। ऐसे में भागवत के मीडिया में आए बयान की जब तक पूरी पड़ताल नहीं की जाए तब तक किसी भी तरह की धारणा बनाना उचित नहीं है।

जरा विचार कीजिए

 (१) क्या भागवत ने किसी भी पुस्तक के विमोचन समारोह में केवल एक या दो लाइन का ही भाषण दिया होगा? 

भागवत तो आमतौर पर सरल शब्दों में संदर्भों के साथ 45 मिनट से लेकर 1 घंटे तक भाषण देते हैं। इसलिए इस पुस्तक विमोचन समारोह में भी उनका भाषण कुछ लंबा ही रहा होगा ना।

(२) क्या भागवत ने ऐसा पहली बार कहा है ?

सितंबर 2018 में विज्ञान भवन नई दिल्ली में 3 दिन तक चली व्याख्यानमाला में सरसंघचालक ने क्या कहा था। जरा इसे पढ़ लीजिए


भागवत ने द्वितीय सरसंघचालक गुरु जी की पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स और मुसलमानों से जुड़े एक प्रश्न के जवाब में कहा था - "अरे भाई हम एक देश की संतान हैं, भाई-भाई जैसे रहें. इसलिए संघ का अल्पसंख्यक शब्द को लेकर रिज़र्वेशन है. संघ इसको नहीं मानता. सब अपने हैं, दूर गए तो जोड़ना है. अब रही बात 'बंच ऑफ थॉट्स' की, तो बातें जो बोली जाती हैं वे परिस्थिति विशेष, प्रसंग विशेष के संदर्भ में बोली जाती हैं. वे शाश्वत नहीं रहतीं. एक बात यह है कि गुरुजी (गोलवलकर) के जो शाश्वत विचार हैं, उनका एक संकलन प्रसिद्ध हुआ है- 'श्री गुरुजी विजन और मिशन,' उसमें तात्कालिक सन्दर्भ वाली सारी बातें हमने हटाकर उनके जो सदा काल के लिए उपयुक्त विचार हैं उन्हें हमने लिया है. संघ बंद संगठन नहीं है कि हेडगेवर जी ने कुछ वाक्य बोल दिए, हम उन्हीं को लेकर चलने वाले हैं. समय के साथ चीज़ें बदलती हैं।"

इसके पहले भी सरसंघचालक मोहन भागवत के इस तरह के बयान आते रहे हैं। 

(३)क्या मुसलमानों के संदर्भ में इस तरह के बयान देने वाले भागवत पहले सरसंघचालक हैं?

इस सवाल का जवाब है नहीं ऐसा नहीं है। विस्तार में जाएंगे तो डॉ हेडगेवार और गुरु जी सहित सभी सरसंघचालकों के ऐसे ही विचार आपको मिल जाएंगे।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर में डॉ. हेडगेवार ने कुछ मुस्लिम धार्मिक नेताओं के साथ एक सहज संबंध बनाने की शुरुआत की थी और साठ के दशक में गोलवलकर ने विश्वयुद्ध से पहले के दिनों के उस रिश्ते को पुनर्जीवित करने की कोशिश की थी।"

(४) क्या कभी यह सोचा है कि हिंदू महासभा के होते हुए भी भारतीय जनसंघ की स्थापना क्यों हुई? संघ और हिंदू महासभा तो कई मुद्दों पर एक साथ काम करते थे ना।

पिछले दिनों महात्मा गांधी के संदर्भ में किए अध्ययन और लेखन के दौरान मैं इस नतीजे पर पहुंचा था कि आजादी के बाद भी हिंदू महासभा ने अपनी सदस्यता केवल उन्हीं लोगों के लिए खोली थी जो रिलीजियस रूप से हिंदू हों, जबकि संघ का मानना था कि भारत में जन्मा हर व्यक्ति हिंदू है। बशर्ते वह भारत माता को अपनी मां का दर्जा दे और यह स्वीकार करे कि हम सब के पूर्वज एक ही हैं और इस नाते भारत की संस्कृति का सम्मान करे। भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक बलराज मधोक भारत के मुसलमानों को हिंदवी मुसलमान कहते थे। जनसंघ की माइनॉरिटी सेल बहुत मजबूत थी। ध्यान रहे उस समय गुरुजी संघ के सरसंघचालक थे। जनसंघ पर संघ का शत प्रतिशत नियंत्रण था आज की भाजपा तो उससे काफी हद तक मुफ्त है

(५) क्या संघ की शाखाओं में मुसलमान जा सकते हैं?

संघ ने 1979 से अपनी शाखाएं मुसलमानों के लिए खोल रखी हैं। कुछ मुस्लिम स्वयंसेवक शाखा में जाते हैं यह बात सही है कि उनकी संख्या बहुत कम है। लेकिन भारतीय मजदूर संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद सहित अन्य अनुषांगिक संगठनों में बड़ी संख्या में मुस्लिम पदाधिकारी है। वे इन संगठनों के कार्यक्रमों के दौरान भगवा ध्वज को प्रणाम भी करते हैं। 

(६) क्या आपको पता है मोहन भागवत किस संगठन के कार्यक्रम में गए थे ?

उस संगठन का नाम है मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ‌। स्वर्गीय कुप सी सुदर्शन ने सरसंघचालक रहते हुए इस संगठन की स्थापना कराई। संघ प्रचारक इंद्रेश कुमार इसके कर्ताधर्ता हैं। जब आप इस संगठन की गतिविधियों की जानकारी इकट्ठा करेंगे तो पता चलेगा कि यह संगठन मुसलमानों को राष्ट्रीय विचारधारा से जोड़ने का काम कर रहा है। 

(७) अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात आखिर भागवत ने कहा क्या था ?

उनके भाषण की ट्रांसस्क्रिप्ट पढ़ लीजिए। यह है पूरा उद्बोधन

भागवत ने कहा -

ये कोई इमेज मेकओवर का एक्सरसाइज नहीं है, संघ क्या है 90 वर्षों से पता है लोगों को. संघ को इमेज की कभी परवाह रही नहीं है. हमको बाकी कुछ करना नहीं है, सबको जोड़ना है, अच्छा काम करना है. हमारा संकल्प सत्य है, इरादा पक्का है, पवित्र है. किसी के विरोध में नहीं किसी की प्रतिक्रिया में नहीं.


इसलिए ये इमेज बदलने का कोई एक्सरसाइज नहीं है, ये अगले चुनावों के लिए मुसलमानों का वोट पाने का प्रयास भी नहीं है क्योंकि हम उस राजनीति में नहीं पड़ते.


हां हमारे कुछ विचार है, राष्ट्र में क्या होना चाहिए क्या नहीं होना चाहिए उसके बारे में. और अब एक ताकत बनी है तो वो ठीक हो जाए इतनी ताकत हमें जहां लगानी है, चुनावों में भी लगाते है. ये बात जरूर है लेकिन हम किसी के पक्षधर है इसलिए नहीं, हम राष्ट्र हित के पक्षधर है. उसके खिलाफ जाने वाली बात कोई भी करे हम उसका विरोध करेंगे. और उसके पक्ष में जाने वाली बात कोई भी करे हम उसका समर्थन करेंगे.


कुछ काम ऐसे है जो राजनीति बिगाड़ देती है, मनुष्यों को जोड़ने का काम राजनीति से होने वाला नहीं है. राजनीति चाहे तो उसपर असर डाल सकती है, बिगाड़ सकती है उतनी मात्रा में राजनीति की चिंता लोगों को जोड़ने वालों को करनी पड़ती है. वो कोई भी हो हम हों या अगर आप जोड़ने चले है उनको भी चिंता है वो करनी पड़ेगी. परंतु राजनीति इस काम का औजार नहीं बन सकती. इस काम को बिगाड़ने का हथियार बन सकती है.


हिंदू मुसलमान एकता ये शब्द ही बड़ा भ्रामक है, ये दो है ही नहीं तो एकता की बात क्या. इनको जोड़ना क्या ये जुड़े हुए है. और जब ये मानने लगते है की हम जुड़े हुए नहीं है तब दोनो संकट में पड़ जाते है. बात यही हुई है. हम लोग अलग नहीं है क्योंकि हमारे देश में ये परंपरा नहीं है की आप की पूजा अलग है इसलिए आप अलग है.


हम लोग एक है और हमारी एकता का आधार हमारी मातृभूमि है. आज हमारी पूरी जनसंख्या को ये भूमि आराम से पाल सकती है, भविष्य में खतरा है उसको समझ के ठीक करना पड़ेगा.


हम समान पूर्वजों के वंशज है. ये विज्ञान से भी सिद्ध हो चुका है. 40 हजार साल पूर्व से हम भारत के सब लोगों का डीएनए समान है.


हिंदुओ के देश में हिंदुओ की दशा ये हो गई जरूर दोष अपने ही समाज में है, उस दोष को ठीक करना है. ये संघ की विचारधारा है.


तथाकथित अल्पसंख्यकों के मन में यह डर भरा गया है की संघ वाले तुमको खा जायेंगे. दूसरा ये डर लगता है की हिंदू मेजोरिटी देश में आप रहोगे तो आपका इस्लाम चला जायेगा. अन्य किसी देश में ऐसा होता होगा. हमारे यहां ऐसा नहीं है. हमारे यहां जो जो आया है वो आज भी मौजूद है.


मैं बहुत आग बबूला होके भाषण करके हिंदुओ में पापुलर तो हो सकता हूं, लेकिन हिन्दू कभी मेरा साथ नहीं देगा. क्योंकि वो आतातायित्व पर चलने वाला नहीं है. वो जानता है की अपना शत्रु है तो भी उसको जीने का हक है. लड़ाई भी होती है और लड़ाई हारने के बाद शत्रु कहता है माफ करो तो उसको शरण देना है. ये परंपरा है.


अगर हिंदू कहते है की यहां एक भी मुसलमान नहीं रहना चाहिए तो हिंदू हिंदू नही रहेगा. ये हमने संघ में पहले नहीं कहा है, ये डॉक्टर साब के समय से चलती आ रही विचारधारा है. ये विचार मेरा नहीं है, ये संघ की विचारधारा का एक अंग है क्योंकि हिंदुस्तान एक राष्ट्र है. यहां हम सब एक है. इतिहास भी होंगे लेकिन पूर्वज सबके समान है.


लोगों को पता चले इस ढंग से इस्लाम भारत में आया वो आक्रामकों के साथ आया. जो इतिहास दुर्भाग्य से घटा है वो लंबा है, जख्म हुए है उसकी प्रतिक्रिया तीव्र है. सब लोगों को समझदार बनाने में समय लगता है लेकिन जिनको समझ में आता है उनको डटे रहना चाहिए.


देश की एकता पर बाधा लाने वाली बाते होती है तो हिंदू के खिलाफ हिंदू खड़ा होता है. लेकिन हमने ये देखा नहीं है की ऐसी किसी बात पर मुस्लिम समाज का समझदार नेतृत्व ऐसे आताताई कृत्यों का निषेध कर रहा है.


लोगों को कन्वर्ट करने के लिए तैयारी करने का समय मिले इसलिए लोगों को बातों में उलझा कर रखना ये भी एक अर्थ होता है बातचीत का. ऐसा किसी ने किया हो तो पता नहीं.


कट्टरपंथी आते गए और उल्टा चक्का घुमाते गए. ऐसे ही खिलाफत आंदोलन के समय हुआ. उसके कारण पाकिस्तान हुआ. स्वतंत्रता के बाद भी राजनीति के स्तर पर आपको ये बताया जाता है की हम अलग है तुम अलग हो.


समाज से कटुता हटाना है, लेकिन हटाने का मतलब ये नहीं की सच्चाई को छिपाना है. भारत हिंदू राष्ट्र है, गौमाता पूज्य है । लेकिन लिंचिंग करने वाले हिंदुत्व के खिलाफ जा रहे है, वो आतातायी है. कानून के जरिए उनका निपटारा होना चाहिए. क्योंकि ऐसे केसेज बनाए भी जाते है तो बोल नहीं सकते आज कल की कहां सही है कहां गलत है.


आज अगर संघ के नाते हम कोई बात कहते है, अभी ये बात मैं कह रहा हूं, इसकी हिन्दू समाज में तो बहुत बड़ी चर्चा होगी. बहुत बड़ा वर्ग है जो इसका समर्थन करेगा, हमको कहेगा की आपने बहुत अच्छा किया ये पहल की.


ऐसा भी वर्ग है जो खराब नहीं है, अच्छा ही है, अच्छे इंसान है लेकिन वो कहेंगे की बस आप भी भोले बन गए अब. ये जरूर कहेगा. क्योंकि ठोकरें लगी है. वो कहेंगे की अरे ऐसा कभी हुआ था क्या? ऐसा मामला नहीं है ये. आप लोग नहीं समझते. ऐसे भी होंगे. चलेगा.. ये शास्त्रार्थ चलेगा.


लेकिन एक बात है की हिंदू समाज की भावना संघ बोलता है. क्योंकि नीचे तक हमारे स्वयंसेवक है, समाज क्या सोचता है क्या नहीं, हमारे पास आता है, उसके अनुसार मै बता रहा हूं.


हिंदू समाज की हिम्मत बढ़ाने के लिए उसका आत्मविश्वास उसका आत्म सामर्थ्य बढ़ाने का काम संघ कर रहा है. संघ हिंदू संगठनकर्ता है. इसका मतलब बाकी लोगों को पीटने के लिए नहीं है वो.


एक ने पूछा की आप क्या करने जा रहे है? क्या होगा इससे? इससे तो हिंदू समाज दुर्बल होगा. मैने कहा कमाल है.. एक तथाकथित माइनोरिटी समाज है मुसलमान, उसकी पुस्तक का मैं उद्घाटन करने जा रहा हूं उसमे कोई डरता नहीं है और तुम मेजोरिटी समाज के होकर के डरते हो की क्या होगा? ऐसा व्यक्ति एकता नही कर सकता जो डरता है. एकता डर से नहीं होती, प्रेम से होती है, निस्वार्थ भाव से होती है.


हम डेमोक्रेसी है, कोई हिंदू वर्चस्व की बात नहीं कर सकता कोई मुस्लिम वर्चस्व की बात नहीं कर सकता. भारत वर्चस्व की बात सबको करनी चाहिए.


हम कहते है भारत हिंदू राष्ट्र है । इसका मतलब केवल तिलक लगाने वाला, पूजा करने वाला नही है. जो भारत को अपनी मातृभूमि मानता है जो अपने पूर्वजों का विरासतदार है, संस्कृति का विरासतदार है वो हिंदू है । 


हम हिंदू कहते है आपको नहीं कहना है मत कहो, भारतीय कहो, ये नाम का शब्द का झगड़ा छोड़ो. हमको इस देश को विश्व गुरु बनाना है. और ये विश्व की आवश्यकता है, नहीं तो ये दुनिया नहीं बचेगी.

इति।


©️ इस आलेख में व्यक्त विचार मेरे निजी हैं। किसी भी मीडिया माध्यम में पूर्वानुमति के बिना इसके उपयोग की अनुमति नहीं है। 

- मनोज जोशी


Wednesday, June 9, 2021

बिरसा तुम्हें आना होगा

"यह धरती हमारी है, हम इसके रक्षक हैं। हर अन्याय के खिलाफ उलगुलान। यही पुरखों का रास्ता है।अप्राकृतिक ताकतों के खिलाफ एकजुट हो जाओ। उठो प्रकृति नेतुम्हे जीने के लिए सभी हथियार दिये हैं। मैं सभी दिशाओ से पुकार रहा हूँ।" - बिरसा मुंडा


वनवासी समाज के भगवान बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है। बिरसा यानी एक ऐसा योद्धा, स्वतन्त्रता सेनानी , समाज सुधारक जिसके बारे में वनवासी आज भी मानते हैं कि वह लौट कर आएगा।

1895 से 1900 तक बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ‘ऊलगुलान’ चला. आदिवासियों को लगातार जल-जंगल-ज़मीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किया जाता रहा और वे इसके खिलाफ आवाज उठाते रहे।

 बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन के हक  की लड़ाई छेड़ी । बिरसा ने सूदखोर महाजनों के ख़िलाफ़ भी आंदोलन का ऐलान किया. ये महाजन, जिन्हें वे दिकू कहते थे, क़र्ज़ के बदले उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेते थे. यह सामान्य विद्रोह नहीं बल्कि वनवासी अस्मिता और संस्कृति  के संरक्षण के साथ साथ स्वायत्तता का संग्राम था।

बिरसा ने छापामार लड़ाई का सहारा लिया. रांची और उसके आसपास के इलाकों में पुलिस में  बिरसा का आतंक हो गया। जब बिरसा पकड़ में नहीं आए तो  अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने के लिए पांच सौ रुपये का इनाम रखा था जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी.  बिरसा की ही जाति के लोगों ने उन्हें पकड़वा दिया।

‘उलगुलान’ के रुमानीवाद को साहित्य और जंगल से निकलकर साम्यवाद के हाथों में लाने वाले चारू मजुमदार, कनु सान्याल और जगत संथाल ने इसे नक्सलवाद का रंग दे दिया। ‘नक्सलवाद’ शब्द पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से निकला। पं. बंगाल के हाल के विधानसभा चुनाव के परिणाम चाहे जो रहा हो, लेकिन एक बात जिस पर शायद कम ही लोगों का ध्यान गया कि नक्सलबाड़ी के लोगों ने भी अब कम्युनिज्म को नकार दिया है।

बिरसा मुंडा के जीवन और उनके संघर्ष को समझेंगे तो पता चलेगा कि बिरसा मुंडा वनवासियों को उनके अधिकार दिलाने के साथ उन्हें संस्कृति से भी जोड़ कर रखना चाहते थे।

 बिरसा का जन्म वर्तमान झारखण्ड प्रदेश के  अड़की प्रखंड अंतर्गत ग्राम – उलीहातु में 15 नवंबर 1875 को हुआ था।  बिरसा के जन्म के बहुत दिन पहले ही उसके बड़े पिता कानू उलिह्तू में ईसाई बन चुके थे। इनका मसीही नाम पौलूस था। बिरसा के पिता सुगना और उसके छोटे भाई फसना ने बम्बा में जाकर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। यहाँ तक की सुगना तो जर्मन ईसाई मिशन के प्रचारक भी बन गए थे। इसलिए बिरसा भी अपने पिता के साथ ईसाई हो गये। सुगना का मसीही नाम मसीहदस  और बिरसा का दाऊद मुंडा पड़ा।

बिरसा अपनी मौसी का बड़ा प्यारा था। वे उसे अपने साथ अपने गांधी खटंगा ले गईं । यहाँ एक ईसाई प्रचारक से उनका संपर्क हुआ। वह प्रचारक मुंडाओं की पुरानी धर्म (पंथ/ संप्रदाय/ उपासना पद्धति  ) व्यवस्था की आलोचना किया करता था। यह बिरसा को अच्छा नहीं लगा। नाराज बिरसा वहां से  बुडजो स्थित जर्मन मिशन स्कूल में भर्ती हो गया और  निम्न प्राथमिक (lower primary) की शिक्षा के लिए जर्मन ईसाई मिशन स्कूल चाईबासा में एडमिशन ले लिया । यह 1886 से 1890 के बीच का घटनाक्रम है। उस समय जर्मन – लूथेरन और रोमन कैथोलिक ईसाईयों के भूमि आन्दोलन चल रहे थे। एक दिन चाईबासा मिशन में उपदेश देते हुए डॉ. नोट्रेट ने ईश्वर के राज्य के सिद्धांत पर उपदेश दिया।  डॉ. नोट्रोट ने वनवासियों से कहा  कि यदि वे ईसाई बने रहेंगे और और उनके निर्देशों का पालन करते रहेंगे तो उनकी छिनी हुई जमीन वापस कर दी जाएगी। यह बात बिरसा और अन्य लोगों को नागवार गुजरी। बिरसा ने उसी समय डॉ. नोट्रोट और मिशनरियों की  बहुत ही तीखे शब्दों में आलोचना की। इसका नतीजा यह हुआ कि बिरसा को स्कूल से निकाल दिया गया। इस घटना के बाद बिरसा ने नारा दिया -  "साहब - साहब एक टोपी हे।"  यानी  गोरे अंग्रेज और मिशनरी एक जैसे हैं । । बिरसा ने1890 में चाईबासा छोड़ दिया और जर्मन ईसाई मिशन की सदस्यता भी छोड़ दी। उसने रोमन कैथोलिक मिशन धर्म (religion ) स्वीकार किया। पर बाद में उस religion के प्रति भी उनके मन में विरक्ति आने लगी। आखिरकार वे अपने  पुराने धर्म (पंथ)  की ओर लौट आये। और इसके बाद अपनी संस्कृति और पंथ पर जोर देने लगे।

बिरसा की मुलाकात आनंद पाण्ड नाम के एक व्यक्ति से हुई , जिसने उनका जीवन बदल दिया । आनंद पांड स्वांसी जाति का एक धार्मिक व्यक्ति था।  बिरसा ने उनसे  वैष्णव पंथ के प्रारम्भिक सिद्धांतों और रामायण महाभारत की कथाओं का श्रवण कर ज्ञान हासिल किया। इसी दौरान एक वैष्णव साधु से उनकी मुलाकात हुई। साधु ने उन्हें  तीन महीने तक उपदेश दिए। साधु से प्रभावित होकर बिरसा ने मांस खाना छोड़ दिया और जनेऊ धारण कर शुद्धता और धर्म परायणता का जीवन व्यतीत करने लगा। वह तुलसी की पूजा करने लगा और माथे पर चन्दन का टीका लगाना शुरू किया। यही नहीं उन्होंने गो – वध भी रूकवाया।

वनवासी समाज के भगवान माने जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा ने नारा दिया था " साहब- साहब एक टोपी हे।" यानी गोरे अंग्रेज और मिशनरी एक जैसे हैं । यही नहीं बिरसा अनुयायी जोर - शोर से नारे लगाते थे ;हेन्दे राम्बड़ा रे केच्चे, केच्चे, पूंडी राम्बड़ा रे केच्चे – केच्चे।" यानी काले ईसाइयों और गोरे  ईसाइयों का सिर काट दो। परंतु कोई ईसाई नहीं मारा गया। 


कवि भुजंग मेश्राम की इन पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करुंगा 


‘बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा


घास काटती दराती हो या लकड़ी काटती कुल्हाड़ी


यहां-वहां से, पूरब-पश्चिम, उत्तर दक्षिण से


कहीं से भी आ मेरे बिरसा


खेतों की बयार बनकर


लोग तेरी बाट जोहते.’


#मनोज_जोशी

Monday, April 26, 2021

समाज परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव

 समाज परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव 

मनोज जोशी 

कोरोना की इस महामारी और खासतौर से दूसरी लहर ने हमारे तंत्र यानी सिस्टम की खामियों को एक बार फिर सामने लाकर रख दिया है। सिस्टम की इन खामियों को लेकर सोशल मीडिया पर एक अजीबोगरीब युद्ध छिड़ा हुआ है। ‌ मैं भी सिस्टम की खामियों से दुखी हूं और पिछली कम से कम 4 पोस्ट में मेरा यह गुस्सा और दुख जाहिर कर चुका हूं। 

लेकिन इसके आगे एक और पहलू है जिसकी चर्चा होनी चाहिए। लोग पूछ रहे हैं कि सरकार ने यानी सिस्टम ने कोरोना की इस दूसरी लहर की तैयारी क्यों नहीं करी ? यदि बहुत गहराई से सोचें तो आग लगने पर कुआं खोदना यह हमारे सिस्टम का चरित्र बना हुआ है और हमने इसे ऐसा ही स्वीकार भी कर रखा है। जब कोई समस्या या मुद्दा सामने खड़े होता है तभी हम उसका निदान खोजते हैं। पहले से तैयारी यह हमारे सिस्टम का चरित्र ही नहीं है। आज महामारी का समय है इसलिए स्वास्थ्य को लेकर बात हो रही है, लेकिन क्या स्वास्थ्य के अलावा अन्य क्षेत्रों में सिस्टम ठीक काम कर रहा है ? कल्पना कीजिए कि हमारा सिस्टम आज से 5 साल बाद आने वाली किसी समस्या के निराकरण के लिए आज से प्रयास शुरु करता है तो क्या उसकी आलोचना नहीं होगी ? हम ही लोग कहेंगे जब होगा तब देखेंगे अभी तो आज की स्थिति से निपटा जाए।

यह बिल्कुल सही है कि नेताओं ने अपनी रैलियों और सभाओं या पार्टियों की बैठकों में कोरोना प्रोटोकॉल का ध्यान नहीं रखा। लेकिन यह भी सही है कि समाज का बड़ा वर्ग भी उसे भूल सा गया था। दुकानों के आगे बनने वाले गोले और काउंटर के सामने बंधने वाली रस्सी तो गायब हो ही गई थी। हम लोग भी मास्क के बिना सर्वजनिक स्थानों पर घूम रहे थे। जैसे हम वैसे हमारे नेता और वैसा ही हमारा सिस्टम। हमारी और सिस्टम की दोनों की खामियों को मिलाकर समस्या ने विकराल रूप ले लिया और कई ऐसे लोग शिकार हो गए जो बेचारे 100% से भी अधिक सतर्कता बरतते थे। 

जब हम देश के और प्रदेश के चुनाव परिणामों पर नजर डालेंगे तो पता लगेगा कि हमने कई बार व्यवस्था में यानी सिस्टम में परिवर्तन के लिए सत्ता परिवर्तन किया। 1977 में जनता पार्टी की सरकार आई लोगों को उम्मीद थी की व्यवस्था बदलेगी सिस्टम बदलेगा। जब सिस्टम नहीं बदला तो 1980 में जनता ने जनता पार्टी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। मप्र में 1977 के बाद 1990 के सत्ता परिवर्तन में भी अपेक्षित व्यवस्था परिवर्तन नहीं दिखा। 2003 आते-आते जब लोग पूरी तरह निराश हो गए और उन्हें उमा भारती के रूप में नया नेतृत्व नजर आया तो फिर सत्ता परिवर्तन हुआ। भाजपा को व्यवस्था परिवर्तन के लिए प्रदेश के लोगों ने तीन अवसर दिए। इस बीच केंद्र की यूपीए सरकार के दो कार्यकालों से आई निराशा के कारण केंद्र में भी मोदी सरकार बन गई। लेकिन इतने सबके बावजूद क्या व्यवस्था यानी सिस्टम में बदलाव हुआ है? इस प्रश्न पर जब गंभीरता से विचार करेंगे तो जवाब मिलेगा कि इन वर्षों में कुछ चीजें बदली है, लेकिन वह उतनी ही है जितना समाज में बदलाव आया है। मेरी बहुत स्पष्ट मान्यता है कि चाहे अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की बात हो या धारा 370 को निष्प्रभावी करने का मुद्दा हो या ऐसा और कोई विषय हो सब पर सरकार या सिस्टम तभी निर्णायक स्थिति में आया है जब समाज में उसको लेकर स्पष्ट मत बन चुका था।

 समस्या के दौरान ही हमारे समाज की ताकत सामने आती है। लाल बहादुर शास्त्री जी के आह्वान पर सोमवार का उपवास इसका एक बड़ा उदाहरण है। वर्तमान समय में पिछले साल लॉक डाउन के दौरान जहां लोग बड़े पैमाने पर भोजन, राशन आदि की व्यवस्था कर रहे थे, वही अब समाज का बड़ा वर्ग इंजेक्शन, ऑक्सीजन, दवाई और अस्पताल के इंतजाम में लगा हुआ है। लोगों ने छोटे-छोटे व्हाट्सएप ग्रुप और फेसबुक ग्रुप बना लिए हैं। किसी को भी कहीं से भी किसी भी तरह की मदद की जरूरत होती है तो वह सूचना एक साथ कई जगह घूमती है और कई लोग मदद के लिए आगे आ जाते हैं। गौर से देखेंगे तो हमारे आसपास ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो अपना नियमित कामकाज छोड़कर इस समय सेवा में लगे हुए हैं, इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो बार-बार अस्पताल का चक्कर लगाने के कारण संक्रमित हो गए। 

बस समाज की इसी ताकत को बचाए रखने और बढ़ाने की जरूरत है। अक्सर कहा जाता है कि सरकार अकेले कुछ नहीं कर सकती। उसे समाज का सहयोग चाहिए होता है। मैं इसके आगे कहता हूं, और यह पहली बार नहीं कह रहा हूं पहले भी कह चुका हूं कि सरकार को सब कुछ करने की जरूरत भी नहीं है। 

केवल सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन हो रहा होता तो अब तक हमारी व्यवस्था हमारा सिस्टम ठीक हो चुका होता। लेकिन 137 करोड़ आबादी वाले इस प्राचीन देश में यह संभव नहीं है। यहां तो समाज परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव है। इस समाज परिवर्तन के यज्ञ में आहुति देने के लिए तैयार रहें।

#मनोज_जोशी 

(हनुमान जयंती, 5123,युगाब्द तदानुसार 27 अप्रैल 2021)


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Tuesday, April 20, 2021

आरोग्य के लिए रामचरितमानस का अध्ययन करें

 

आरोग्य के लिए रामचरितमानस का अध्ययन करें

- #मनोज_जोशी 


आज रामनवमी है। रामनवमी यानी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म दिन ! लगातार दूसरे साल यह पर्व ऐसे समय आया है जब न केवल भारत बल्कि पूरा विश्व एक महामारी से लड़ रहा है। रामनवमी की शुभकामनाएं देते हुए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आरोग्य के लिए रामचरितमानस का अध्ययन कीजिए ‌‌। आप सोच रहे होंगे भला रामचरितमानस का आरोग्य से क्या रिश्ता ?

मैं एक दिन एक कथावाचक के प्रवचन सुन रहा था, उन्होंने कहा जिस घर में रामचरितमानस होती है वहां आरोग्य होता है। कथावाचक ने घर के सभी सदस्यों को मानस का अध्ययन करने की सलाह दी। मैं भी यही सोच रहा था कि मानस का आरोग्य से क्या रिश्ता?

कथावाचक ने भी बहुत विस्तार में बताने की बजाए केवल राम की भक्ति की बात करी। लेकिन उनके इस कथन के बाद मैंने मानस को जब आरोग्य की दृष्टि से देखा तो समझ आया कि रामचरितमानस में कम से कम 40 ऐसी वन औषधियों का जिक्र है जो अलग-अलग रोगों में उपयोग में आ सकती हैं। श्री राम के युग में भारत में एक विशिष्ट चिकित्सा पद्धति विकसित थी। 

जरा यह उदाहरण देखिए - 

सती अहिल्या को श्रीराम पाषाण (वास्तव में कई वर्षों से कोमा) अवस्था से चरण धूलि से स्वस्थ अवस्था में लाते हैं।

“ जे पद परसि तरी रिषिनारी।

दंडक कानन पावनकारी।। ”

भक्ति भाव में हम इसे श्रीराम का चमत्कार मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में यह किसी चमत्कार का परिणाम नहीं था। इस भक्ति में हम यह भूल जाते हैं कि श्री राम जब विश्वामित्र जी श्रीराम विद्या ग्रहण कर रहे थे तो उन्होंने श्रीराम को ऐसी औषधियों की शिक्षा दी थी जो बिना भोजन तथा जल के शरीर को स्वस्थ रख सकती है।

“ तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही।

विद्यानिधि कहुँ विद्या दीन्ही।।

जाते लाग ना छुधा पिपासा।

अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।। ”


लंका में युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी का मूर्छित हो जाना और संजीवनी बूटी से उनके इलाज का पूरा प्रसंग तो सभी जानते हैं। इस प्रसंग में एक खास बात जिसका आम तौर पर जिक्र नहीं होता वह या कि लक्ष्मण जी का उपचार लंका के राज वेद्य सुषेण वैद्य ने किया था। यानी उस समय चिकित्सक युद्ध के दौरान घायल दुश्मन का भी इलाज करते थे।

 इसके अलावा श्री राम के जन्म से पहले की कथा को याद कीजिए। महाराज दशरथ एक यज्ञ करते हैं और उस यज्ञ के प्रसाद स्वरूप खीर तीनों महारानियों को ग्रहण कराते हैं। यह यज्ञ भी विश्वामित्र ही संपन्न कराते हैं। तार्किक बुद्धि से विचार कीजिए यह प्रसाद एक औषधि ही थी जिसे केवल महारानियों को ही ग्रहण कराया गया। आप जब अगली बार मानस का अध्ययन करें तो पाएंगे कि अनेक अवसरों पर तुलसीदास जी ने विभिन्न फल फूल आदि के गुणों का वर्णन किया है। कई जगहों पर उन्होंने मनुष्य के स्वभाव,कर्तव्य आदि की व्याख्या करने के लिए इनका सहारा लिया है। 


!! सर्वे संतु निरामया !!

रामनवमी पर यही शुभकामना


*चित्र मेरे निवास पर बेटे रुद्रांश द्वारा तैयार श्रीराम की झांकी का


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- मनोज जोशी (भोपाल) रामनवमी युगाब्द 5123 तदनुसार दिनांक 21 अप्रैल 2021

Friday, April 2, 2021

हिंदुत्व और महात्मा गांँधीजी का रामराज्य (५०)

(गतांक से आगे)

महात्मा गाँधीजी की रामराज्य की अवधारणा हिंदू राष्ट्र के बहुत करीब

-#मनोज_जोशी

हमने पिछली दो- तीन कड़ी में देखा कि हिंदू और हिंदुत्व के साथ हिंदू राष्ट्र की अवधारणा की गलत व्याख्या करके उसे रिलीजन से जोड़ा गया। इसी तरह गाँधीजी की रामराज्य की अवधारणा को जब हम देखते हैं तो पता चलता है कि वह भी रिलीजन पर आधारित नहीं है। आरएसएस की स्थापना से ४ साल पहले असहयोग आंदोलन के दौरान २२ मई, १९२१ को ‘नवजीवन’ में महात्मा गाँधी ने रामराज्य को लेकर जो कुछ लिखा वह पढ़ लीजिए। डॉ हेडगेवार और महात्मा गाँधीजी दोनों के विचारों में समानता ही नजर आएगी।

गाँधी जी लिखते हैं -‘कुछ मित्र रामराज्य का अक्षरार्थ करते हुए पूछते हैं कि जब तक राम और दशरथ फिर से जन्म नहीं लेते तब तक क्या रामराज्य मिल सकता है? हम तो रामराज्य का अर्थ स्वराज्य, धर्मराज्य, लोकराज्य करते हैं। वैसा राज्य तो तभी संभव है जब जनता धर्मनिष्ठ और वीर्यवान् बने. ...अभी तो कोई सद्गुणी राजा भी यदि स्वयं प्रजा के बंधन काट दे, तो भी प्रजा उसकी गुलाम बनी रहेगी। हम तो राज्यतंत्र और राज्य नीति को बदलने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं; बाद में हमारे सेवक के रूप में अंग्रेज रहेंगे या भारतीय हमें इसकी चिंता नहीं करनी पड़ेगी। हम अंग्रेज जनता को बदलने का प्रयास भी नहीं करते।हम तो स्वयं अपने-आप को बदलने का प्रयास कर रहे हैं।'

अब जरा संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार के विचारों को ध्यान कर लीजिए। वे भी हिंदू समाज की कमजोरियों को दूर करने की बात करते हुए कहते थे कि इन हालात में यदि हम आजाद हो भी गए तो भी वह बेमानी होगी।


भावनगर में गाँधीजी ने कहा - राम के वंशज समाप्त नहीं हुए हैं

भावनगर में ८ जनवरी १९२५ को काठियावाड़ राजनीतिक सम्मेलन में रामराज्य को लेकर महात्मा गाँधी ने कहा `राम ने एक कुत्ते के साथ भी न्याय किया। राम ने सत्य के लिए अपना राजपाट छोड़कर वन गमन किया जो कि सारी दुनिया के राजाओं के लिए मर्यादा का पाठ है। उन्होंने एक पत्नीव्रत का पालन करते हुए यह दर्शाया कि राजवंश से संबद्ध होने के बावजूद कोई गृहस्थ व्यक्ति पूर्ण आत्मसंयम का पालन कर सकता है। राम को जनमत जानने के लिए आज की तरह मतदान की आवश्यकता नहीं थी बल्कि वे अंतरज्ञान के माध्यम से ही लोगों के हृदय की बात जान लेते थे। राम की प्रजा बहुत प्रसन्न थी। इस तरह का रामराज्य आज भी कायम किया जा सकता है। राम के वंशज समाप्त नहीं हुए हैं।’


रामराज्य का मतलब ईश्वर का राज

उन्होंने १९ सितंबर १९२९ को `यंग इंडिया’ में लिखाः----,`रामराज्य से मेरा मतलब हिंदू राज नहीं है।" (यहाँ गाँधीजी हिंदू शब्द का उपयोग रिलीजन के ‌रूप में कर रहे हैं) वे आगे लिखते हैं- " मेरे रामराज्य का अर्थ है- ईश्वर का राज्य। मेरे लिये, राम और रहीम एक ही हैं; मैं सत्य और धार्मिकता के ईश्वर के अलावा किसी और ईश्वर को स्वीकार नहीं करता। चाहे मेरी कल्पना के राम कभी इस धरती पर रहे हो या न रहे हो, रामायण का प्राचीन आदर्श निस्संदेह सच्चे लोकतंत्र में से एक है, जिसमें एक बहुत बुरा नागरिक भी एक जटिल और महंगी प्रक्रिया के बिना त्वरित न्याय को लेकर आश्वस्त हो।"

रामराज्य यानी धर्म राज्य और रामराज्य ही सबसे बेहतर लोकतंत्र का उदाहरण

२० मार्च, १९३० को ‘नवजीवन’ में ‘स्वराज्य और रामराज्य’ शीर्षक से एक लेख में गाँधीजी ने कहा था- ‘स्वराज्य के कितने ही अर्थ क्यों न किए जाएं, तो भी मेरे नजदीक तो उसका त्रिकाल सत्य एक ही अर्थ है, और वह है रामराज्य। यदि किसी को रामराज्य शब्द बुरा लगे तो मैं उसे धर्मराज्य कहूंगा। रामराज्य शब्द का भावार्थ यह है कि उसमें गरीबों की संपूर्ण रक्षा होगी, सब कार्य धर्मपूर्वक किए जाएंगे और लोकमत का हमेशा आदर किया जाएगा. ...सच्चा चिंतन तो वही है जिसमें रामराज्य के लिए योग्य साधन का ही उपयोग किया गया हो. यह याद रहे कि रामराज्य स्थापित करने के लिए हमें पाण्डित्य की कोई आवश्यकता नहीं है. जिस गुण की आवश्यकता है, वह तो सभी वर्गों के लोगों- स्त्री, पुरुष, बालक और बूढ़ों- तथा सभी धर्मों के लोगों में आज भी मौजूद है. दुःख मात्र इतना ही है कि सब कोई अभी उस हस्ती को पहचानते ही नहीं हैं. सत्य, अहिंसा, मर्यादा-पालन, वीरता, क्षमा, धैर्य आदि गुणों का हममें से हरेक व्यक्ति यदि वह चाहे तो क्या आज ही परिचय नहीं दे सकता?’


भोपाल में कहा - मेरे लिए राम और रहीम एक

सितंबर १९२९ में भोपाल में एक सभा में भी गाँधीजी ने रामराज्य की बात कही थी। गाँधी भवन न्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तक मध्यप्रदेश के गाँधीधाम में लिखा है कि गांधीजी ने रामराज्य की पूरी व्याख्या करते हुए कहा था कि मुसलमान भाई इसे अन्यथा न लें, रामराज्य का मतलब है-ईश्वर का राज्य। मेरे लिए राम और रहीम में कोई अंतर नहीं है। उन्होंने कहा था कि जिस रामराज्य की कहानी हमें सुनने को मिलती है वह प्रजातंत्र का आदर्श है।

गाँधीजी ने कुछ अन्य अवसरोंं पर कहा था - "मैं अपने मुस्लिम मित्रों को सचेत करता हूं कि मेरे रामराज्य शब्द के प्रयोग पर वे किसी प्रकार की गलतफहमी में न आएं। मेरे लिए रामराज्य का अर्थ हिंदू राज नहीं है। मेरे लिए रामराज्य का अर्थ दैवीय शासन है। एक प्रकार से ईश्वर का राज्य है। मेरे लिए राम और रहीम एक ही हैं। मैं सत्य के अलावा और किसी को ईश्वर नहीं मानता। मेरी कल्पना के राम कभी इस धरती पर आए थे या नहीं लेकिन रामराज्य का प्राचीन आदर्श निस्संदेह एक प्रकार से सच्चे लोकतंत्र का नमूना है। वह ऐसी शासन व्यवस्था है जहां पर सबसे सामान्य नागरिक को भी लंबी और महंगी प्रक्रिया से गुजरे बिना त्वरित न्याय की उम्मीद बनी रहती है।"

अगस्त १९३४ में अमृत बाज़ार पत्रिका में उन्होंने कहा, 'मेरे सपनों की रामायण, राजा और निर्धन दोनों के लिये समान अधिकार सुनिश्चित करती है।'फिर २ जनवरी १९३७ को हरिजन में उन्होंने लिखा, 'मैंने रामराज्य का वर्णन किया है, जो नैतिक अधिकार के आधार पर लोगों की संप्रभुता है।’


मुस्लिम और ईसाई रिलीजन के लोगों की समझ के लिए वे रामराज्य को खुदाई राज या परमात्मा का राज भी कहने लगे थे।


गाँधीजी ने १९४६ में हरिजन में लिखाः----


`( मैं रामराज्य शब्द का प्रयोग इसलिए करता हूं) क्योंकि यह एक सुविधाजनक और सार्थक अभिव्यक्ति वाला मुहावरा है। इसके विकल्प में कोई दूसरा शब्द नहीं है जो लाखों लोगों तक मेरी बात को इतने प्रभावशाली ढंग से पहुंचा दे। जब मैं सीमांत प्रांत का दौरा करता हूं या मुस्लिम बहुल सभा को संबोधित करता हूं तो मैं अपने भाव को व्यक्त करने के लिए खुदाई राज शब्द का प्रयोग करता हूं। जब मैं ईसाई जनता को संबोधित करता हूं कि तब मैं धरती पर परमात्मा के राज की बात करता हूं।’

२६ फरवरी, १९४७ को एक प्रार्थना-सभा में महात्मा गाँधी ने कहा" मैंने अपने आदर्श समाज को रामराज्य का नाम दिया है. कोई यह समझने की भूल न करे कि राम-राज्य का अर्थ है हिन्दुओं का शासन. मेरा राम खुदा या गॉड का ही दूसरा नाम है। मैं खुदाई राज चाहता हूं जिसका अर्थ है धरती पर परमात्मा का राज्य. ...ऐसे राज्य की स्थापना से न केवल भारत की संपूर्ण जनता का, बल्कि समग्र संसार का कल्याण होगा।'

पिछले 7 महीने से जारी इस श्रंखला की 50 वीं कड़ी तक आते-आते इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि जिन महात्मा गांधी को "रघुपति राघव राजा राम" और "वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाने रे" प्रिय थे स्वाभाविक रूप से वे मन और वचन से हिंदुत्व की मूल अवधारणा के काफी करीब थे।

दोनों की कार्यपद्धति में जरूर कुछ अंतर नजर आता है, लेकिन इस अंतर को बढ़ा चढ़ा कर पेश करके हम केवल उन विघ्न संतोषी लोगों के एजेंडे को ही पूरा करेंगे जिनके विचार की जड़ें भारत में नहीं है।

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अध्ययन के लिए अल्प विराम……

"हिंदुत्व और महात्मा गांँधीजी का रामराज्य" विषय पर यह अध्ययन तब तक बेमानी है जब तक रामराज्य की अवधारणा की प्रासंगिकता पर चर्चा ना हो। अब मैं वाल्मीकि रामायण में राम राज्य के वर्णन और वर्तमान संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता पर अध्ययन शुरू कर रहा हूँ। इस बारे में अध्ययन के लिए इस श्रृंखला को अल्प विराम देता हूं। कुछ ही दिनों में "वर्तमान युग में रामराज्य की प्रासंगिकता" इस विषय पर भी मेरा लेखन किसी न किसी रूप में सामने आएगा।

इस श्रृंखला के लिए अनेक मित्रों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मुझे जो सहयोग प्रदान किया है और जो मेरा उत्साहवर्धन किया है के लिए सबका आभार व्यक्त करता हूं।

(समाप्त)


(यह श्रृंखला मेरे ब्लॉग www.mankaoj.blogspot.com 

और एक अन्य न्यूज़ वेबसाइट www.newspuran.com पर भी उपलब्ध है)