Sunday, November 8, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का रामराज्य (२४)

 

शादी के लिए धर्म परिवर्तन पर गाँधीजी के विचार 

 (गतांक से आगे)


31 अक्टूबर को खबर आई कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केवल शादी के लिए धर्म परिवर्तन को अवैध करार दिया है। हाईकोर्ट के इस फैसले ने लव जिहाद जैसे विषय पर चर्चा छेड़ दी है।  एक मित्र ने सलाह दी कि जब गाँधीजी के हिंदुत्व पर इतना अध्ययन कर रहे हो तो यह भी बताओ कि गाँधीजी के ऐसे मामले में क्या विचार थे ?
मैंने पहले कहा गाँधीजी तो सामान्य रूप से ही धर्म परिवर्तन के खिलाफ थे। मित्र की सलाह कहिए या दबाव  जब अध्ययन किया तो पता लगता है गाँधीजी हिंदू समाज के भीतर अंतरजातीय विवाह को सामाजिक समरसता के लिए जरुरी मानते थे और धर्म बदल कर विवाह उनके हिसाब से अनुचित था।
७जुलाई, १९४६ के 'हरिजन' में वे लिखते हैं, "यदि मेरा बस चले तो मैं अपने प्रभाव में आने वाली सभी सवर्ण लड़कियों को चरित्रवान हरिजन युवकों को पति के रूप में चुनने की सलाह दूं."
इसके ४ साल पहले ८ मार्च, १९४२ के 'हरिजन' में गांधी लिखते हैं, "जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, इस तरह के विवाह बढ़ेंगे, और उनसे समाज को फ़ायदा ही होगा. फ़िलहाल तो हम में आपसी सहिष्णुता का माद्दा भी पैदा नहीं हुआ है. लेकिन जब सहिष्णुता बढ़कर सर्वधर्म-समभाव में बदल जाएगी, तो ऐसे विवाहों का स्वागत किया जाएगा."
"आने वाले समाज की नवरचना में जो धर्म संकुचित रहेगा और बुद्धि की कसौटी पर ख़रा नहीं उतरेगा, वह टिक न सकेगा; क्योंकि उस समाज में मूल्य बदल जाएंगे. मनुष्य की कीमत उसके चरित्र के कारण होगी. धन पदवी या कुल के कारण नहीं."
"मेरी कल्पना का हिंदू धर्म कोई संकुचित संप्रदाय नहीं है. वह तो काल के समान ही पुरानी महान और सतत विकास की प्रक्रिया है. उसमें पारसी, मूसा, ईसा, मुहम्मद, नानक और ऐसे ही दूसरे धर्म-संस्थापकों का समावेश हो जाता है."
उसकी व्याख्या इस प्रकार है-
'विद्वद्भिः सेवितः सद्भिनित्यमद्वेषरागिभिः.
हृदयेनाम्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत..'

अर्थात् जिस धर्म को राग-द्वेषहीन ज्ञानी संतों ने अपनाया है और जिसे हमारा हृदय और बुद्धि ही स्वीकार करती है, वही सद्धर्म है.

"मैं हमेशा से इस बात का घोर विरोधी रहा हूं और अब भी हूं कि स्त्री-पुरुष सिर्फ़ विवाह के लिए अपना धर्म बदलें. धर्म कोई चादर या दुपट्टा नहीं कि जब चाहा ओढ़ लिया, जब चाहा उतार दिया. इस मामले में धर्म बदलने की कोई बात ही नहीं है."
(क्रमशः)

#मनोज_जोशी


Monday, November 2, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का रामराज्य (२३)

(गतांक से आगे)

सत्य, अहिंसा और महात्मा गाँधी

इस श्रृंखला की शुरुआत में ही मैंने एक बात कही थी कि हम महात्मा गाँधी को सत्य और अहिंसा का पुजारी कह कर अपना कर्तव्य पूरा कर लेते हैं। लेकिन क्या वास्तव में यह जानने की कोशिश की कि महात्मा गाँधी के लिए सत्य और अहिंसा का अर्थ क्या है?

क्या अहिंसा का अर्थ - एक झापड़ खाने पर दूसरा गाल आगे कर देना है? और प्रश्न तो यह भी है कि सत्य और अहिंसा में से किसी एक को चुनना पड़े तो महात्मा गाँधी किसे चुनेंगे?

इस सवाल के जवाब के लिए आपको महात्मा गाँधी द्वारा विभिन्न अवसरों पर व्यक्त विचारों को पढ़ना होगा। गाँधीजी के स्वयं के लिखे शब्दों को पढ़ कर ही हम समझ सकते हैं कि गाँधीजी सत्य को धर्म मानते थे। हिंदू संस्कृति के हिसाब से देखें तो जो सत्य नहीं है वह धर्म नहीं हो सकता। हमारे यहां कहा गया है जो धारण करने योग्य है वही धर्म है। ऐसे में असत्य तो धर्म हो ही नहीं सकता। यदि सत्य और अहिंसा में से किसी एक को चुनना होगा तो गाँधीजी कहते हैं कि वे सत्य को चुनेंगे। १७ अगस्त 1935 को हरिजन में उन्होंने लिखा -

“आदमी शरीर से कितना ही कमजोर हो, पर यदि पलायन लज्जा की बात है तो उसे मुकाबले पर डटे रहना चाहिए और कर्तव्यपालन करते हुए मृत्यु का वरण करना चाहिए। यही अहिंसा तथा वीरता है। वह कितना ही कमजोर हो, पर अपने शत्रु पर शक्ति भर वार करे और ऐसा करते-करते मृत्यु को प्राप्त हो जाए यह वीरता है, यद्यपि यह अहिंसा नहीं है। यदि आदमी संकट का सामना करने के बजाए भाग खडा होता है, तो यह कायरता है। पहले मामले में, आदमी के हृदय में प्रेम अथवा दयालुता का भाव होगा। दूसरे और तीसरे मामले में, उसके हृदय में घृणा अथवा अविश्वास और भय के भाव होंगे ।”


गाँधीजी की अहिंसा को विस्तार से जानने समझने के लिए पढ़िए महात्मा गाँधी के स्वयं के विचार इन विचारों को पढ़ो तो ऐसा लगता है जैसे कोई धार्मिक संत प्रवचन दे रहे हैं। गाँधीजी ने अनेक अवसरों पर कहा कि “अहिंसा का मार्ग हिंसा के मार्ग की तुलना में कहीं ज्यादा साहस की अपेक्षा रखता है।” 

२८ जनवरी १९३९ को उन्होंने हरिजन में लिखा

“यदि मनष्य में ... गर्व और अहंकार हो तो उसमें अहिंसा नहीं टिक सकती। विनम्रता के बिना अहिंसा असंभव है। मेरा अपना अनुभव है कि जब-जब मैंने अहिंसा का आश्रय लिया है, किसी अदृष्ट शक्ति ने मेरा मार्गदर्शन किया है और मुझे उस पर आरूढ रखा है। यदि मैं अपनी ही इच्छा के बलबूते रहता तो बुरी तरह नाकामयाब हो गया होता। जब मैं पहली बार जेल गया तो काफी घबराया हुआ था। मैंने जेल-जीवन के बारे में बडी-बडी भयावह बातें सुनी थम्। लेकिन मुझे ईश्वर के संरक्षण में आस्था थी। हमारा अनुभव यह रहा कि जो लोग मन में प्रार्थना का भाव लेकर जेल गए थे, वे विजयी होकर लौटे, और जो अपनी ही शक्ति के बूते पर गए थे, वे नाकामयाब हो गए। जब आप यह कहते हैं कि ईश्वर आपको शक्ति दे रहा है, तो उसमें आत्मदया का कोई भाव नहीं होता। आत्मदया की बात तब पैदा होती है जब आपको दूसरों से मान्यता पाने की आकांक्षा हो। लेकिन यहां तो मान्यता का कोई प्रश्न ही नहीं है।”


.यंग इंडिया में २८ मई १९२४ को उन्होंने लिखा 

“मेरी अहिंसा इस बात की इजाजत नहीं देती कि खतरा सामने देखकर अपने प्रियजनों को असुरक्षित छोडकर खुद भाग जाओ। हिंसा और कायरतापूर्ण पलायन में से मैं हिंसा को ही तरजीह दूंगा। जिस प्रकार मैं किसी अंधे आदमी को सुंदर दृश्यों का आनंद लेने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता, उसी प्रकार कायर को अहिंसा का पाठ नहीं पढा सकता। अहिंसा तो वीरता की चरम सीमा है। मेरे अपने अनुभव में, मुझे हिंसा में विश्वास रखने वाले लोगों को अहिंसा की श्रेष्ठता सिद्ध करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। मैं वर्ष़ों तक कायर रहा और उन दिनों मुझे कई बार हिंसा पर उतारू होने की इच्छा हुई। जब मैंने कायरता को त्यागना आरंभ किया, तब अहिंसा की कं करने लगा। वे हिंदू जो खतरा सामने देखकर अपनी जिम्मेदारी छोडकर भाग खडे हुए, अहिंसक होने के नाते या वार करने से डरने की वजह से नहीं भागे बल्कि इसलिए भागे कि वे मरने या चोट खाने के लिए तैयार नहीं थे। खूंख्वार कुने को देखकर भाग जाने वाला खरगोश इसलिए नहीं भागता कि वह बडा अहिंसक है। वह बेचारा तो कुने को देखते ही भय से कांपने लगता है और अपनी जान बचाने के लिए भागता है।”

४अगस्त और ११ अगस्त १९२० को यंग इंडिया में उन्होंने लिखा - “समूची प्रजाति के नपुंसक हो जाने का खतरा उठाने के मुकाबले मैं हिंसा को हजार गुना बेहतर समझता हूं । पर मैं भारत को बेबस नहीं मानता। मैं स्वयं को बेबस प्राणी नहीं मानता... शक्ति शारीरिक क्षमता में निहित नहीं है । वह अदम्य इच्छा से उत्पन्न होती है ।”


यंग इंडिया और हरिजन  के विभिन्न अंकों सहित अन्य पत्र पत्रिकाओं में महात्मा गाँधी लिखते हैं -


“मैं स्वप्नंष्टा नहीं हूं। मैं स्वयं को एक व्यावहारिक आदर्शवादी मानता हूं। अहिंसा का धर्म केवल ऋषियों और संतों के लिए नहीं है। यह सामान्य लोगों के लिए भी है। अहिंसा उसी प्रकार से मानवों का नियम है जिस प्रकार से हिंसा पशुओं का नियम है। पशु की आत्मा सुप्तावस्था में होती है और वह केवल शारीरिक शक्ति के नियम को ही जानता है। मानव की गरिमा एक उच्चतर नियम आत्मा के बल का नियम के पालन की अपेक्षा करती है...’”


‘‘जिन ऋषियों ने हिंसा के बीच अहिंसा की खोज की, वे न्यूटन से अधिक प्रतिभाशाली थे। वे स्वयं वेलिंग्टन से भी बडे योद्धा थे। शस्त्रों के प्रयोग का ज्ञान होने पर भी उन्होंने उसकी व्यर्थता को पहचाना और श्रांत संसार को बताया कि उसकी मुक्ति हिंसा में नहीं अपितु अहिंसा में है।”


“मैं केवल एक मार्ग जानता हूं - अहिंसा का मार्ग। हिंसा का मार्ग मेरी प्रछति के विरुद्ध है। मैं हिंसा का पाठ पढाने वाली शक्ति को बढाना नहीं चाहता... मेरी आस्था मुझे आश्वस्त करती है कि ईश्वर बेसहारों का सहारा है, और वह संकट में सहायता तभी करता है जब व्यक्ति स्वयं को उसकी दया पर छोड देता है। इसी आस्था के कारण मैं यह आशा लगाए बैठा हूं कि एक-न-एक दिन वह मुझे ऐसा मार्ग दिखाएगा जिस पर चलने का आग्रह मैं अपने देशवासियों से विश्वासपूर्वक कर सकूंगा।”

“अहिंसा और सत्य का मार्ग तलवार की धार के समान तीक्ष्ण है। इसका अनुसरण हमारे दैनिक भोजन से भी अधिक महत्वपूर्ण है। सही ढंग से लिया जाए तो भोजन देह की रक्षा करता है, सही ढंग से अमल में लाई जाए तो अहिंसा आत्मा की रक्षा करती है। शरीर के लिए भोजन नपी-तुली मात्रा में और निश्चित अंतरालों पर ही लिया जा सकता है; अहिंसा तो आत्मा का भोजन है, निरंतर लेना पडता है। इसमें तृप्ति जैसी कोई चीज नहीं है। मुझे हर पल इस बात के प्रति सचेत रहना पडता है कि मैं अपने लक्ष्य की ओर बढ रहा हूं और उस लक्ष्य के हिसाब से अपनी परख करती रहनी पडती है।”


“मैं जीवन भर एक 'जुआरी' रहा हूं। सत्य का शोध करने के अपने उत्साह में और अहिंसा में अपनी आस्था के अनवरत अनुगमन में, मैंने बेहिचक बडे-से-बडे दांव लगाए हैं। इसमें मुझसे कदाचित गलतियां भी हुई हैं, लेकिन ये वैसी ही हैं जैसी कि किसी भी युग या किसी भी देश के बडे-से-बडे वैज्ञानिकों से होती हैं।”


“मैंने अहिंसा का पाठ अपनी पत्नी से पढा, जब मैंने उसे अपनी इच्छा के सामने झुकाने की कोशिश की। एक ओर, मेरी इच्छा के दृढ प्रतिरोध, और दूसरी ओर, मेरी मूर्खता को चुपचाप सहने की उसकी पीडा को देखकर अंततः मुझे अपने पर बडी लज्जा आई, और मुझे अपनी इस मूर्खतापूर्ण धारणा से मुक्ति मिली कि मैं उस पर शासन करने के लिए ही पैदा हुआ हूं। अंत में, वह मेरी अहिंसा की शिक्षिका बन गई।”


“अहिंसा के मार्ग का पहला कदम यह है कि हम अपने दैनिक जीवन में परस्पर सच्चाई, विनम्रता, सहिष्णुता और प्रेममय दयालुता का व्यवहार करें। अंग्रेजी में कहावत है कि ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है। नीतियां तो बदल सकती हैं और बदलती हैं। किंतु अहिंसा का पंथ अपरिवर्तनीय है। अहिंसा का अनुगमन उस समय करना आवश्यक है जब तुम्हारे चारों ओर हिंसा का नंगा नाच हो रहा हो। अहिंसक व्यक्ति के साथ अहिंसा का व्यवहार करना कोई बडी बात नहीं है। वस्तुतः यह कहना कठिन है कि इस व्यवहार को अहिंसा कहा भी जा सकता है या नहीं। लेकिन अहिंसा जब हिंसा के मुकाबले खडी होती है, तब दोनों का फर्क पता चलता है। ऐसा करना तब तक संभव नहीं है जब तक कि हम निरंतर सचेत, सतर्क और प्रयासरत न रहें”


“अहिंसा उच्चतम कोटि का सव्यि बल है। यह आत्मबल अर्थात हमारे अंदर बैठे ईश्वरत्व की शक्ति है। अपूर्ण मनुष्य उस तत्व को पूरी तरह नहीं पकड सकता - वह उसके संपूर्ण तेज को सहन नहीं कर पाएगा, किंतु उसका अत्यल्प अंश भी हमारे अंदर सव्यि हो जाए तो उसके अद्भुत परिणाम निकल सकते हैं।”


“अहिंसा के प्रति मेरा प्रेम सभी लौकिक अथवा अलौकिक वस्तुओं से बढकर है। इसकी बराबरी केवल सत्य के प्रति मेरे प्रेम के साथ की जा सकती है जो मेरी दृष्टि में अहिंसा का समानार्थक है; केवल अहिंसा के माध्यम से ही मैं सत्य को देख और उस तक पहुंच सकता हूं।”


“...अहिंसा के बिना सत्य का शोध और उसकी प्राप्ति असंभव है। अहिंसा और सत्य एक-दूसरे से इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि उन्हें पृथक करना प्रायः असंभव है। वे सिक्के, बल्कि कहिए कि धातु की चिकनी और बिना छाप वाली चव्का के दो पहलू हैं। कौन बता सकता है कि सीधा पहलू कौन-सा है और उल्टा कौन-सा ? फिर भी, अहिंसा साधन है और सत्य साध्य है। साधन वही है जो हमारी पहुंच के भीतर हो और इस प्रकार अहिंसा हमारा सर्वोपरि कर्तव्य है। यदि हम साधन को ठीक रखें तो देर-सबेर साध्य तक पहुंच ही जाएंगे। एक बार इस मुद्दे को समझ जाएं तो अंतिम विजय असंदिग्ध है।

“ अहिंसा  कायरता की आड नहीं है, बल्कि यह वीर का सर्वोच्च गुण है। अहिंसा के व्यवहार के लिए तलवारबाजी से ज्यादा वीरता की जरूरत है। कायरता और अहिंसा का कोई मेल नहीं है। तलवारबाजी को छोडकर अहिंसा को अपनाना संभव है, और कभी-कभी आसान भी है। अतः अहिंसा की पूर्वशर्त यह है कि अहिंसक व्यक्ति में वार करने की क्षमता हो। अहिंसा मनुष्य की प्रतिशोध लेने की भावना का सचेतन और जाना-बूझा संयमन है। लेकिन निष्व्यि, स्त्रSण और विवश अधीनता से तो प्रतिशोध ही हर हालत में श्रेष्ठ है। क्षमा और भी । उंची चीज है। प्रतिशोध दुर्बलता है। प्रतिशोध की भावना काल्पनिक अथवा वास्तविक हानि की आशंका के कारण उत्पन्न होती है। कुना डर के कारण भौंकता और काटता है। जो आदमी दुनिया में किसी से नहीं डरता, वह उस व्यक्ति पर वेधित होने की तकलीफ क्यों उठाना चाहेगा जो उसे नुकसान पहुंचाने का निरर्थक प्रयास कर रहा है ? सूर्य उन बच्चों से प्रतिशोध नहीं लेता जो उस पर धूल उछालते हैं। धूल उछालने के प्रयास में बच्चे खुद ही गंदे हो जाते हैं।”

“यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम बडे पैमाने पर वीर की अहिंसा से परिचित नहीं हैं। लोगों को, बडे जन-समूहों की तो बात छोडिए, छोटे-छोटे वर्ग़ों द्वारा अहिंसा के प्रयोग के विषय में भी संदेह है। वे अहिंसा के व्यवहार को असाधारण व्यक्तियों तक सीमित मानते हैं। यदि यह केवल व्यक्तियों के लिए ही सुरक्षित है तो फिर, मानव जाति के लिए इसका क्या उपयोग?”


“'पाप से घृणा करो, पापी से नहीं', एक ऐसा नीतिवचन है जिसे समझना तो काफी आसान है, पर जिस पर आचरण शायद ही कभी किया जाता है। इसीलिए दुनिया में घृणा का विष फैलता चला जा रहा है।”

“मैं अहिंसा को केवल व्यक्तिगत सद्गुण नहीं मानता। यह एक सामाजिक सद्गुण भी है जिसका विकास अन्य सद्गुणों की तरह ही किया जाना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि पारस्परिक व्यवहार में समाज प्रायः अहिंसा की अभिव्यक्ति से ही संचालित होता है । मेरा कहना सिर्फ यह है कि इसका और बडे पैमाने राष्टींय तथा अंतर्राष्टींय पर विस्तार किया जाना चाहिए ।”

“अहिंसा ऐसे व्यक्ति को नहीं सिखाई जा सकती जो मरने से भय खाता है और जिसमें प्रतिरोध की शक्ति ही नहीं है। लाचार चूहे को, जो हमेशा बिल्ली का शिकार बनता है, अहिंसक नहीं कहा जा सकता। उसका बस चले तो जरूर बिल्ली को खा जाए, पर वह उसे देखते ही भाग खडा होता है। हम उसे कायर नहीं कहते, क्योंकि प्रकृति ने उसे जैसा बनाया है वह वैसा ही व्यवहार करता है।”


“मैं यह नहीं कहता कि 'भारत पर आव्मण करने वाले लुटेरों, चोरों या राष्टों से निपटने के लिए हिंसा का सहारा मत लो।' लेकिन इसमें अच्छी तरह कामयाब होने के लिए हमें अपने ।पर संयम रखना सीखना चाहिए। जरा-जरा-सी बात पर पिस्तौल उठा लेना मजबूती नहीं, बल्कि कमजोरी की निशानी है। आपसी घूंसेबाजी हिंसा का नहीं, बल्कि नामर्दगी का अभ्यास है ।”


“यदि युद्ध स्वयं एक अनैतिक छत्य है तो यह नैतिक समर्थन या आशीर्वाद के योग्य कैसे माना जा सकता है ? मैं सभी प्रकार के युद्धों को पूरी तरह गलत मानता हूं। लेकिन हम दो युद्धरत पक्षों के इरादों की छानबीन करें तो संभवतः यह पाएंगे कि उनमें से एक सही है और दूसरा गलत। उदाहरण के लिए, यदि 'अ' देश 'ब' देश पर कब्जा करना चाहता है तो स्पष्टतया यह 'ब' देश पर अन्याय है। दोनों देश सशस्त्र संघर्ष करेंगे। मैं हिंसक संघर्ष में विश्वास नहीं करता, फिर भी, 'ब' देश, जिसका पक्ष न्यायोचित है, मेरी नैतिक सहायता और आशीर्वाद का पात्र होगा ।”


अहिंसा पर गाँधीजी का स्वयं का लिखा इतना उपलब्ध है कि ऐसी एक नहीं कई पोस्ट छोटी पड़ जाएं। मैंने पूर्व में जैसा कहा था कि गाँधीजी पर जैन पंथ और बौद्ध पंथ का प्रभाव था। वह उनके इन विचारों में स्पष्ट झलकता भी है।

(क्रमश:)

Wednesday, October 28, 2020

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का राम राज्य (२२)

(गतांक से आगे)

जानिए मनु स्मृति पर क्या कहते थे महात्मा गाँधी

मनु स्मृति को लेकर अक्सर ज्ञानी लोग विवाद करते हैं। मनु स्मृति के नाम से दर्ज कुछ श्लोकों को उदाहरण बता कर पूरे हिंदुत्व को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश होती है। कहा जाता है कि हिंदू संस्कृति महिला विरोधी है और छुआछूत की समर्थक है।

कुछ साल पहले का मेरा एक व्यक्तिगत अनुभव है। एक “लाल ज्ञानी’’ सामाजिक समरसता और सामाजिक समानता पर मुझसे चर्चा कर रहे थे। मैं समरसता पर जोर दे रहा था। उन्होंने मनु स्मृति के कुछ श्लोक का उदाहरण देकर कहा कि शूद्रों को वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं है। मैंने अपने सामान्य ज्ञान से कहा कि मनु स्मृति में मिलावट है। यह श्लोक मूल मनु स्मृति का नहीं है। ‘‘लाल ज्ञानी’’ ने सवाल दागा क्या आपके पास मनु स्मृति की पांडुलिपि या मूल प्रति है। मैं चुप हो गया। अब जो बात मैं कह रहा था, वही बात बहुत अच्छे अंदाज में गाँधीजी ने ६ अप्रैल १९३४ को हरिजन में लिखी है। गाँधीजी ने जो लिखा है उसका एक अंश पढ़िए...


“मैं मनुस्मृति को शास्त्रों का हिस्सा मानता हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं मनु स्मृति के नाम से छपी पुस्तक के हर एक श्लोक को अक्षरश: सही मानता हूं। प्रकाशित पुस्तक में बहुत सारे विरोधाभास हैं। यदि आप एक हिस्सा स्वीकार करते हैं, तो आप उन हिस्सों को अस्वीकार करने के लिए बाध्य हैं, जो पूरी तरह से असंगत हैं। मैं मनु स्मृति में समाहित उदात्त धार्मिक शिक्षाओं के कारण उसे एक धार्मिक पुस्तक मानता हूं।... लेकिन यह स्वीकार करना चाहिए कि दरअसल आज किसी के भी पास मूल ग्रंथ की प्रति है ही नहीं।”


१६ सितंबर, १९२७ को तमिलनाडु के तंजौर में उनका पूरा भाषण ही मनु स्मृति जैसे विषयों  पर केंद्रित था. इन विषयों पर उनसे हुए  सवाल-ज़वाब का महादेव देसाई द्वारा किया गया संकलन यंग इंडिया के २४ नवंबर, १९२७ के अंक में छपा था. इन सवालों में से दो सवाल सीधे मनुस्मृति पर ही केंद्रित थे


सवाल - मनुस्मृति में (वर्ण-धर्म का) जो सिद्धान्त दिया गया है क्या आप उसका समर्थन करते हैं?


गांधीजी - सिद्धांत उसमें है, लेकिन उसका व्यावहारिक रूप मुझे पूरी तरह जमता नहीं. इस ग्रंथ के कई अंश हैं जिन पर गंभीर आपत्तियां हो सकती हैं. मुझे लगता है कि वे अंश उसमें बाद में जोड़ दिए गए हैं.


सवाल - क्या ‘मनुस्मृति’ में बहुत सी अन्यायपूर्ण बातें कही गई हैं?


गांधीजी - हां, उसमें स्त्रियों और तथाकथित नीची ‘जातियों’ के बारे में बहुत सी अन्यायपूर्ण बाते हैं. इसलिए तथाकथित शास्त्रों को बहुत सावधानी के साथ पढ़ने की आवश्यकता है.


गाँधीजी ने अन्य अवसरों पर भी यह बात दोहराई है कि मनु स्मृति ही नहीं बल्कि रामचरित मानस और महाभारत जैसे ग्रंथों में भी मिलावट हुई है। इसीलिए वे धार्मिक पुस्तकों का सावधानी से अध्ययन करने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि सत्य और अहिंसा धर्म का आधार है। जो कुछ भी इस आधार के विपरीत है वह धार्मिक नहीं है।


(क्रमशः)

हिंदुत्व और महात्मा गाँधीजी का राम राज्य (२१)

(गतांक से आगे)

धर्म में आडम्बर के विरोधी थे गाँधीजी


नवदुर्गा में अचानक बनी विशेष परिस्थितियों के कारण मैंने  #स्त्री_शक्ति पर एक श्रृंखला लिखने का व्रत ले लिया। इस वजह से महात्मा गाँधीजी की यह श्रृंखला बीच में ही छूट गई थी। हम पिछली कुछ पोस्ट में गाँधीजी द्वारा हिंदू धर्म में सुधार के लिए किए गए प्रयासों पर चर्चा कर रहे थे। इस २१ वीं कड़ी में उसे ही आगे बढ़ाने का प्रयास करता हूं। इसके साथ ही श्रृंखला को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए इसके तत्काल बाद २२ वीं कङी भी प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

गांधी वांङ्गमय के खंड २२को पढ़ें तो पाएंगे कि वे हिंदू धर्म में आडम्बर के भारी विरोधी थे। गांधीजी कहते हैं - 

“धर्म के नाम पर हम हिंदुओं ने खूब आडंबर रच रखा है | धर्म को केवल खानपान का विषय बनाकर हमने उसकी प्रतिष्ठा कम कर दी है | हमें आंतरिक पवित्रता का अधिक विचार करना चाहिए | हम अनेक आंतरिक प्रलोभनों से घिरे हुए हैं; घोर-से-घोर अस्पृश्य और पापपूर्ण विचारों का प्रवाह हमें स्पर्श कर रहा है, अपवित्र बना रहा है, उस सर्वशक्तिमान परमात्मा के दरबार में हमारी पहचान इस बात से नहीं होगी कि हमने क्या-क्या खाया-पीया है और किस-किस का स्पर्श किया है, बल्कि इस बात से होगी कि हमने किस-किस की सेवा किस-किस तरह से की | यदि हमने किसी भी विपत्तिग्रस्त और दुखी मनुष्य की सेवा की होगी तो वह अवश्य हम पर कृपा-दृष्टि डालेगा | जिस प्रकार हमें बुरे लोगों और बुरी बातों के संसर्ग से बचना चाहिए उसी प्रकार खराब, उत्तेजक और गंदे खान-पान से भी दूर रहना चाहिए | लेकिन हमें इन नियमों की महिमा को भी आवश्यकता से अधिक महत्त्व नहीं देना चाहिए | हम भोजन के रूप में अमुक वस्तुओं के त्याग का उपयोग अपने कपट-जाल, धूर्तता और पापाचरण को छिपाने के लिए नहीं कर सकते | और इस आशंका से कि कहीं उनका स्पर्श हमारी आध्यात्मिक उन्नति में बाधक न हो, हमें किसी पतित या गंदे भाई-बहन की सेवा से हरगिज मुंह न मोड़ना चाहिए |”

(क्रमशः)

Tuesday, October 20, 2020

नवरात्रि की शुभकामनाएं - पांचवा दिन


 


” ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी “” का सही अर्थ क्या है….?????


महादेवी वर्मा के नाम से जिस फर्जी कविता के वायरल होने के कारण मैं यह श्रृंखला लिख रहा हूं उसमें सबसे पहले रामचरित मानस में ” ढोल, गंवार , शूद्र ,पशु ,नारी सकल ताड़ना के अधिकारी “ को लेकर तंज कसा गया है। इन शब्दों को लेकर सामान्य जन भ्रमित हो जाते हैं। और वे मान लेते हैं कि तुलसीदास (यानी उनके आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम रघुवंश कुल गौरव श्री रामचंद्र जी) यहां जो कह रहे हैं उसमें कहीं न कहीं महिलाओं और अजा-जजा के लोगों की तुलना पशु से की गई है।
लेकिन मैं इस धारणा को अनुचित मानता हूं।
पहली बात तो यह कि तुलसीदासजी ने रामचरित मानस संस्कृत में नहीं अवधी में लिखी है। इसलिए मानस की व्याख्या संस्कृत के आधार पर नहीं बल्कि अवधी में उन शब्दों के भावार्थ के आधार पर करना चाहिए। संस्कृत में  ताड़न शब्द का अर्थ पीटना या प्रताड़ित करना होता है। लेकिन अवधी में इसका अर्थ क्या है? अवधी में ताड़ना शब्द का अर्थ है परखना।
दूसरी बात यह कि पूरे रामचरित मानस में कहीं भी स्त्री का अपमान नहीं दिखाया गया है। माता सीता परम आदर्शवादी हैं। उर्मिला के उर्मिला के विरह और  त्याग की महिमा बताई गई है। रावण की पत्नी मंदोदरी ही नहीं बल्कि त्रिजटा को भी खलनायक के रूप में नहीं दिखाया गया है। राक्षसी सुरसा को भी हनुमान जी माता कह कर संबोधित करते हुए बताए गए हैं। कैकेई और मंथरा जब गलती का पश्चाताप करती हैं तो मानस में वे भी सहानुभूति की पात्र हो जाती हैं।
आगे सोचिए क्या तुलसी दास जी उनके विषय में कुछ गलत लिख सकते हैं जिन्हें शूद्र कहा जाने लगा है। भगवान राम की शबरी, विषाद और केवट से भेंट के प्रसंगों को ध्यान कर लीजिए। फिर इस सवाल का जवाब स्वयं ही सोच लीजिए।
अब बात करते हैं उस चौपाई की जिस पर ज्ञानी लोग बहुत ज्ञान देने की कोशिश करते हैं। इस चौपाई के संदर्भ में सामान्य जानकारी यह है कि यह सुंदरकांड में है । जब समुद्र ने भगवान राम का अनुरोध स्वीकार नहीं किया तब वे क्रोधित हो गए। 

घटना – संवाद का सम्पूर्ण सन्दर्भ देखिए


बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।

बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥57॥


भावार्थ:-इधर तीन दिन बीत गए, किंतु जड़ समुद्र विनय नहीं मानता। तब श्री रामजी क्रोध सहित बोले- बिना भय के प्रीति नहीं होती!॥57॥


चौपाई :

* लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु॥

सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपन सन सुंदर नीति॥1॥


भावार्थ:-हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से समुद्र को सोख डालूँ। मूर्ख से विनय, कुटिल के साथ प्रीति, स्वाभाविक ही कंजूस से सुंदर नीति ॥1॥


* ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥

क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा॥2॥


भावार्थ:-ममता में फँसे हुए मनुष्य से ज्ञान की कथा, अत्यंत लोभी से वैराग्य का वर्णन, क्रोधी से शम (शांति) की बात और कामी से भगवान्‌ की कथा, इनका वैसा ही फल होता है जैसा ऊसर में बीज बोने से होता है (यानी  ऊसर में बीज बोने के समान यह सब व्यर्थ जाता है)॥2॥


* अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा॥

संधानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥3॥


भावार्थ:-ऐसा कहकर श्री रघुनाथजी ने धनुष चढ़ाया। यह मत लक्ष्मणजी के मन को बहुत अच्छा लगा। प्रभु ने भयानक (अग्नि) बाण संधान किया, जिससे समुद्र के हृदय के अंदर अग्नि की ज्वाला उठी॥3॥


* मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥

कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना॥4॥


भावार्थ:-मगर, साँप तथा मछलियों के समूह व्याकुल हो गए। जब समुद्र ने जीवों को जलते जाना, तब सोने के थाल में अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मण के रूप में आया॥4॥


दोहा :

* काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।

बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच॥58॥


भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे गरुड़जी! सुनिए, चाहे कोई करोड़ों उपाय करके सींचे, पर केला तो काटने पर ही फलता है। नीच विनय से नहीं मानता, वह डाँटने पर ही झुकता है यानी सही रास्ते पर आता है ॥58॥


* सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे॥।

गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी॥1॥


भावार्थ:-समुद्र ने भयभीत होकर प्रभु के चरण पकड़कर कहा- हे नाथ! मेरे सब अवगुण  क्षमा कीजिए। हे नाथ! आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी- इन सबकी करनी स्वभाव से ही जड़ है॥1॥


* तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए॥

प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहें सुख लहई॥2॥


भावार्थ:-आपकी प्रेरणा से माया ने इन्हें सृष्टि के लिए उत्पन्न किया है, सब ग्रंथों ने यही गाया है। जिसके लिए स्वामी की जैसी आज्ञा है, वह उसी प्रकार से रहने में सुख पाता है॥2॥


* प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥

ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी॥3॥


भावार्थ:-प्रभु ने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी, किंतु मर्यादा (जीवों का स्वभाव) भी आपकी ही बनाई हुई है। ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और स्त्री- ये सब शिक्षा के अधिकारी हैं॥3॥

दरअसल ताड़ना एक अवधी शब्द है जिसका अर्थ होता है पहचानना  या परखना ।  तुलसीदास जी के कहने का भावार्थ यह है कि अगर हम ढोल के व्यवहार (सुर) को नहीं पहचानते तो, उसे बजाते समय उसकी आवाज कर्कश होगी इसलिए उसके स्वभाव को जानना जरूरी  है ।इसी तरह गंवार का अर्थ  है जो अज्ञानी हैं। और शूद्र का अर्थ है आपका अधीनस्थ कर्मचारी। उसके व्यवहार को जाने बिना उसके साथ जीवन सही से नहीं बिताया जा सकता।  इसी तरह पशु और नारी के संदर्भ  में भी वही अर्थ है कि जब तक हम नारी के स्वभाव को नहीं पहचानते उसके साथ जीवन का निर्वाह सुखपूर्वक नहीं हो सकता। कुल मिलाकर भावार्थ यह है कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु  और नारी  के स्वभाव को ठीक से समझना चाहिए और उस हिसाब से उनके साथ व्यवहार करना चाहिए।





 







मुझे पत्रकारिता के लिए प्रेरित करने वाले शरद जी

मुझे पत्रकारिता के लिए प्रेरित करने वाले मध्यभारत प्रांत के तत्कालीन प्रांत प्रचारक श्रृद्धेय शरद मेहरोत्रा जी की आज जन्म जयंती है। मैं उन्हें श्रृद्धा सुमन अर्पित करता हूँ ।१९९० के दशक की बात है। समिधा में एक छोटा सा समूह बना था जो अखबारों में संपादक के नाम पत्र लेखन करता था। आदरणीय शरद जी इस समूह का मार्गदर्शन करते थे। 

एक किस्सा मुझे हमेशा याद आता है। पालिटेक्निक चौराहा पर स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमा लगना चाहिए यह माँग उठी थी। कुछ दिन बाद स्वामी जी की एक आवक्ष प्रतिमा वहाँ स्थापित हो गई उसका अनावरण नहीं हुआ था। पालिटेक्निक में पढ़ाई के कारण मैं रोजाना उसे देखता।

मुझे बङा अजीब से लगा कि इतने बङे चौराहे पर इतनी छोटी सी प्रतिमा ! ! ! !  फिर स्वामी जी की प्रतिमा तो आदमकद ही होना चाहिए ! ! ! ! उन दिनों स्वामीजी के शिकागो भाषण की स्वर्ण जयंती मनाई जा रही थी और मुझे  विवेकानन्द साहित्य पढ़ने का चस्का लग चुका था।

पत्र लेखकों के समूह की बैठक में आदरणीय शरद जी ने विषय पूछे। मैंने अपने मन की बात बता दी। उन्होंने कहा - लिखो।

फिर मैंने पत्र लिखा सभी जगह देकर आया।

स्वदेश ने छापा।

थोड़े दिनों बाद आवक्ष प्रतिमा वहाँ से हट गई। चौराहा कुछ दिन खाली पङा रहा फिर आदमकद प्रतिमा स्थापित हुई ।

अपने मन में यह बात जम गई कि लिख कर सरकार को हिलाया जा सकता है।

शरद जी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अनिल डागा जी की पोस्ट पढ़ें ।

R


itendra Mathur जी Akshat Sharma जी Mohit Mehta जी आदि भी इस समूह के सदस्य थे। उनकी भी कुछ स्मृतियां होंगी ।

Monday, October 19, 2020

नवरात्रि की शुभकामनाएं : चौथा दिन



धर्म यानी महिलाओं के सम्मान की  पुनर्स्थापना की योगीराज श्रीकृष्ण ने

#मनोज_जोशी


जब अर्जुन ने कुरूक्षेत्र में युद्ध करने से मना कर दिया तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा 


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।


अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥४-७॥


परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।


धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥४-८॥


अर्थात 


मै प्रकट होता हूं, मैं आता हूं, जब जब धर्म की हानि होती है, तब तब मैं आता हूं, जब जब अधर्म बढता है तब तब मैं आता हूं, सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मै आता हूं, दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं आता हूं, धर्म की स्थापना के लिए में आता हूं और युग युग में जन्म लेता हूं।


श्रीकृष्ण ने यह बात यु्द्ध के मैैदान में कही, लेकिन यदि आप उनके पूरे जीवन पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि योगीराज कृष्ण ने उस युग में महिलाओं के सम्मान की पुनर्स्थापना की। पुनर्स्थापना इसलिए क्योंकि महाभारत काल की घटनाओं को देखेंगे तो पाएंगे कि स्त्री को उसका सम्मान नहीं मिलता था। आखिर पांडवों ने जुएं में अपनी पत्नी द्रोपदी को दांव पर लगा दिया था और वे उसे हार गए। इसके बाद ही युद्ध की स्थिति बनी।

अब आप जिन योगेश्वर श्रीकृष्ण पर ‘‘केरेक्टर ढीला’’ जैसे गानों पर हम थिरकते हैं जरा उनके जीवन के हकीकत को समझ लीजिए। उसके बाद आगे बात करते है।

३११२  ईसा पूर्व इस पृथ्वी पर आए श्रीकृष्ण का जेल में जन्म हुआ , जन्म होते ही जान पर संकट आ गया। फिर जिस माँ ने जन्म दिया वह छूट गई और पालने वाली माँ दूसरी ...! शायद इन विपरीत परिस्थितियों में लालन- पालन के कारण ही कृष्ण महिलाओं के अधिकार को लेकर बहुत संवेदनशील थे। गीता का ज्ञान समझना तो आम आदमी के बस की बाता नहीं है। आप थोड़ी देर के लिए भूल जाइए कि कृष्ण कोई देवता या अवतार हैं । केवल उनके जीवन और कार्यों को सामान्य व्यक्ति की तरह देखिए। आप पाएंगे कि श्रीकृष्ण ने महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने का अद्वितीय कार्य किया। मुझे लगता है कि महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता और उनके अधिकारों के लिए की गई पहल के ही कारण श्रीकृष्ण  ५००० से अधिक वर्ष बाद भी प्रासंगिक बने हुए हैं ।


१६ हजार महिलाओं को मुक्त कराया 


कृष्ण की जिन 16 हजार पटरानियों का जिक्र किया  जाता है दरअसल वे सभी भौमासर जिसे नरकासुर भी कहते हैं के यहां बंधक बनाई गई महिलाएं थीं जिनको श्रीकृष्‍ण ने  मुक्त कराया था। श्रीकृष्ण की छोटी बहन सुभद्रा के विवाह की भी कहानी भी एक बहन को उसकी पसंद का वर चुनने की आजादी की कहानी है। रुक्मिणी और श्रीकृष्ण के विवाह की कहानी भी महिला सम्मान की ही कहानी है । 

(इन सब पर विस्तार से जानकारी के लिए आप हाल ही में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की मेरी पोस्ट देख सकते हैं)

(जन्माष्टमी वाली और यह दोनों पोस्ट मेरे blog - mankaoj.blogspot.com पर भी उपलब्ध है)