Sunday, September 20, 2026

सफलता का नया फॉर्मूला: बुद्धिमत्ता कृत्रिम, मूर्खता मौलिक

 सफलता का नया फॉर्मूला: बुद्धिमत्ता कृत्रिम, मूर्खता मौलिक


जब कोई अफसर बरसों से अटकी पड़ी फाइल को बिना खोले सिर्फ इसलिए नए सिरे से जांच के लिए लौटा दे क्योंकि उस पर लगे 'यू-पिन' का रंग फाइल कवर से मैच नहीं कर रहा था, तो यह वह प्रशासनिक मौलिकता है जिसे समझने में सिलिकॉन वैली का कोई भी डेटा मॉडल जिंदगी भर चकराता रहेगा। यही वह बिंदु है जहां समझदारी की सीमाएं दम तोड़ती हैं और सफलता का असली खेल शुरू होता है।

 इस देश में तरक्की फाइलों के सही अध्ययन से नहीं, बल्कि ऐसे ही हैरतअंगेज और बेतुके फैसलों को पूरे अधिकार के साथ थोपने से मिलती है। अक्ल का बोझ ढोने वाला जिंदगी भर ड्राफ्ट सुधारता रह जाता है, जबकि अगाध और आत्मविश्वास से लबरेज मूर्खता के दम पर लोग कुर्सियां, ओहदे और प्रमोशन सब अपनी झोली में समेट लेते हैं।

समझदार होने का सबसे बड़ा संताप यह है कि बुद्धिमान आदमी हमेशा सही होने के तनाव में घुटता रहता है। उसे नतीजों का खौफ होता है, तर्कों के टूटने का मलाल होता है, और वह जिंदगी भर 'कॉज एंड इफेक्ट' के मकड़जाल में उलझकर केवल योजनाएं बनाता रह जाता है।

दूसरी तरफ, एक अव्वल दर्जे का मूर्ख इस मानसिक गुलामी से पूरी तरह आजाद होता है। उसे न किसी फैक्ट-चेक की दरकार होती है, न मर्यादाओं का लिहाज। वह जिस रसूख और अधिकार के साथ गलत बात को सही ठहराता है, सामने खड़ा तीस मार खां भी एक पल के लिए अपनी ही अक्ल पर शक करने लगता है। कॉरपोरेट के बोर्डरूम से लेकर सियासत के मंचों तक, तरक्की का असली राज यही है कि आपकी अज्ञानता में कोई झिझक, कोई संकोच न दिखे।

दुनिया भर के वैज्ञानिक पिछले कई दशकों से इस जुगत में अपनी दाढ़ी सफेद कर रहे हैं कि मशीनों को इतना अक्लमंद बना दिया जाए कि वे इंसानी सभ्यता की बागडोर अपने हाथ में ले लें। खरबों डॉलर का निवेश पानी की तरह बहाया गया, सुपरकंप्यूटरों के सर्वर रूम दिन-रात हुंकार भरते रहे, और नतीजा क्या निकला? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)यानी एक ऐसा नफीस, सधा हुआ मुंशी, जो हर सवाल का नपा-तुला, तार्किक और बेहद उबाऊ जवाब देता है।

लेकिन इन वैज्ञानिकों की सारी रिसर्च उस मोड़ पर आकर हांफने लगती है, जहां इंसानी फितरत का असली खेल शुरू होता है। वे यह बुनियादी बात भूल गए कि दुनिया को कभी अक्ल के तराजू पर तौला ही नहीं गया। अगर इतिहास और वर्तमान के पन्नों को निष्पक्ष होकर पलटें, तो यह साफ दिखता है कि व्यवस्था को अक्ल के पुतलों ने नहीं, बल्कि अगाध, निश्छल और परम आत्मविश्वास से लबरेज मूर्खों ने चलाया है। बुद्धिमान आदमी तो जोखिम के गुणा-भाग में ही अपनी जिंदगी की बैलेंस शीट बिगाड़ बैठता है, जबकि एक सच्चा मूर्ख बिना किसी डेटा और लॉजिक के सीधे मैदान में कूदकर झंडे गाड़ देता है।

अल्बर्ट आइंस्टीन ने बहुत सोच-समझकर कहा था कि दो चीजें अनंत हैं, एक ब्रह्मांड और दूसरी मानव की मूर्खता; और ब्रह्मांड के बारे में वे तब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थे। 

आइंस्टीन तो e =mc² जैसे फिजिक्स के फार्मूले सुलझाकर चले गए, मगर उनका यह सामाजिक सिद्धांत आज के डिजिटल दौर में सौ फीसदी खरा उतर रहा है। एआई, चाहे जितने खरबों पैरामीटर्स चाट ले, वह सिर्फ पुराने इंसानी डेटा और पैटर्न्स की जुगाली कर सकता है। उसके पास नया रचने के नाम पर सिर्फ गणितीय संभावनाओं का खेल है।

इसके उलट, हमारी ‘नेचुरल स्टुपिडिटी’ किसी एल्गोरिद्म या लॉजिक मॉडल की मोहताज नहीं है। उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी अनप्रेडिक्टिबिलिटी है। वह बिना किसी ट्रेनिंग डेटा के, बिल्कुल अप्रत्याशित और शत-प्रतिशत ओरिजिनल नमूने पेश करने की असीमित कुव्वत रखती है। एआई में तकनीकी खामी आ जाए तो उसे 'हैलुसिनेशन' कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है, मगर इंसान जिस बेपरवाह मौलिकता और सीनाजोरी के साथ रोज नए गुल खिलाता है, उस रचनात्मकता का कॉपीराइट कुदरत ने हमेशा के लिए इंसान के नाम ही सुरक्षित कर रखा है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता कभी उस ऊंचाई को छू ही नहीं सकती, क्योंकि वह गलतियां करने से कतराती है। वह तो डेटा के तयशुदा दायरे में रेंगने वाला कीड़ा है, जबकि इंसानी मूर्खता पूरी तरह जैविक और आउट-ऑफ-द-बॉक्स होती है। कोई सुपरकंप्यूटर यह हिसाब लगा ही नहीं सकता कि इंसान कब, कहां और किस बात पर पूरी व्यवस्था को धता बता देगा। इस विशुद्ध इंसानी हुनर का पेटेंट कोई मशीन सपने में भी नहीं छीन सकती।

इसलिए जमाने के साथ कदमताल करना है और सफलता की सीढ़ियां तेजी से लांघनी हैं, तो होशियारी की यह पुरानी, बदरंग चादर उतार फेंकिए। समझदारी सिर्फ सिरदर्द, एंग्जायटी और फाइलों के अंबार देती है; जबकि विशुद्ध, मौलिक मूर्खता परम शांति, परम आनंद और निर्विवाद प्रभुत्व की गारंटी है। अक्ल के पीछे भागना छोड़िए, क्योंकि जहां समझदारी की सीमाएं दम तोड़ती हैं, वहीं से असली इंसानी हुकूमत का दौर शुरू होता है।

©️मनोज जोशी - 9977008211

Saturday, September 19, 2026

हाशिये के लोग

 प्रस्तुत है एक स्वरचित कविता 


हाशिये के लोग


हाशिये के लोग

सुबह घर से निकलते हैं

तो साथ होती है बच्चों की फीस,

घर का किराया, बिजली का बिल,

दवा का खर्च

और महीने के अंत तक

कुछ बचा लेने की चिंता।

कोई नौकरी बचाने में लगा है,

कोई पाने में;

कोई दुकान चला रहा है,

कोई खेत बचा रहा है

और कोई बच्चों का भविष्य।

छोटी-छोटी जरूरतों के बीच

बड़े सपनों को

किसी तरह जिंदा रखते हैं।

यही लोग

घर, बाजार और देश चलाते हैं,

लेकिन

हाशिये पर खड़े रहते हैं।

हाशिये के लोग

पहले जुलूसों में चलते थे,

अब ट्रेंड के साथ चलते हैं।

दौर बदल गया है।

पहले तख्तियां थीं,

अब मोबाइल हैं।

पहले नारे थे,

अब हैशटैग हैं।

पहले भाषण सुने जाते थे,

अब वीडियो देखे जाते हैं।

हाशिये के लोग

पहले भी भीड़ थे,

अब भी हैं।

फर्क इतना है

कि पहले भीड़

सड़कों पर दिखती थी,

अब स्क्रीन पर दिखाई देती है।

कुछ लोग उनके लिए

कंटेंट गढ़ते हैं

एक तस्वीर,

एक बयान,

वीडियो का एक टुकड़ा

और थोड़ा-सा गुस्सा।

इतना ही काफी है

एक धारणा बनाने के लिए।

फिर हाशिये के लोग

उसी धारणा को

सच मानकर

एक-दूसरे से लड़ते हैं,

मुंह फुलाते हैं,

रिश्ते खराब कर लेते हैं।

हाशिये के लोग

किसी के व्यू बढ़ाते हैं,

किसी के फॉलोअर

और किसी की कमाई।

हाशिये के लोग

अपना पेट नहीं भर पाते,

लेकिन सोशल मीडिया की

इस भड़ास से

उसकी दुकान चलाते हैं,

जिसने उन्हें

अधूरा सच दिखाया है।

जुलूस अब भी निकलते हैं,

लेकिन उनमें शामिल होने वाले

अक्सर “बेचारे” होते हैं।

ये बेचारे

तख्तियां लिए नारे लगाते हैं

और उसकी कीमत ले लेते हैं।

फिर चुनाव आता है।

“बेचारों” को लुभाया जाता है

सरकारी योजनाओं से,

“ईनाम” से,

“पेय पदार्थ” से।

और

हाशिये के लोग

कतार में खड़े होते हैं।

उंगली पर स्याही लगती है

और उन्हें याद दिलाया जाता है

कि लोकतंत्र में

सरकार वे बनाते हैं

और गिराते हैं।

हाशिये के लोग

इसी गुमान में जीते रहते हैं।

हाशिये के लोग

खुद बदलाव नहीं करते,

इंतजार करते हैं नायक का।

कभी एक को

सत्ता पर बैठाते हैं,

तो कभी दूसरे को।

और खुद

वहीं रहते हैं

हाशिये पर।

संविधान के पहले शब्द भी

उन्हीं से शुरू होते हैं

“हम भारत के लोग...”

यही सबसे बड़ा दुख है।

जिस व्यवस्था को

हम कोसते हैं,

उसे हमने ही चुना है।

जिस समाज को

बदलना चाहते हैं,

वह भी हमसे ही बना है।

इसलिए बदलाव

सिर्फ सत्ता बदलने से नहीं आएगा।

समाज बदलेगा,

तभी व्यवस्था बदलेगी।

और समाज कोई दूसरा नहीं

हम हैं।

हाशिये के लोग

कमजोर नहीं हैं।

वे सबसे अधिक हैं।

वे सिर्फ संख्या नहीं,

इस देश की शक्ति हैं।

बस उन्हें

अपनी संख्या से अधिक

अपनी जिम्मेदारी का

अहसास होना बाकी है।

शायद उसी दिन

हाशिये का आदमी

हाशिये से बाहर आएगा।

और व्यवस्था बदलने के लिए

किसी और का इंतजार

नहीं करना पड़ेगा।


©️मनोज जोशी

19.09.2026

9977008211

Monday, August 31, 2026

संघ का सुंदर चेहरा और स्वयंसेवक होने का भ्रम

 संघ का सुंदर चेहरा और स्वयंसेवक होने का भ्रम


मनोज जोशी 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन से जो कहा, वह केवल वहां उपस्थित भारतीय समुदाय के लिए दिया गया भाषण नहीं था। वह दुनिया के सामने हिंदु जीवन-दृष्टि और संघ के वास्तविक हिंदुत्व की स्पष्ट अभिव्यक्ति थी।

मेरे लिए तो इस कार्यक्रम में गर्व करने लायक एक और बात है कि अभाविप में मेरे वरिष्ठ पदाधिकारी रहे वैज्ञानिक डॉ. सुदेश अग्रवाल इस कार्यक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका में थे। पिछले दिनों एक पारिवारिक आयोजन में उनसे मुलाकात में इस कार्यक्रम की कार्ययोजना और उद्देश्य के बारे में सामान्य बातचीत भी हुई थी।


29 अगस्त को ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवता एक है। सत्य एक है, उसकी अभिव्यक्ति के मार्ग अनेक हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि कोई हिंदु यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं रहने चाहिए तो वह हिंदु नहीं रह जाता। हिंदु होने के लिए यह मानना आवश्यक है कि सभी मार्ग उसी सत्य की ओर जाते हैं और प्रत्येक मनुष्य की अपनी गरिमा है।

यह बात संघ के लिए नई नहीं है। संघ के हिंदुत्व में पूजा पद्धति कभी राष्ट्रीयता की कसौटी नहीं रही। उसका मूल भाव उस भारतीय दर्शन में है, जो कहता है -

“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।”

अर्थात सत्य एक है, विद्वान उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।

डॉ. भागवत देश में अनेक अवसरों पर बता चुके हैं कि हिंदु होना किसी के विरुद्ध खड़ा होना नहीं, बल्कि सबको अपना मानने की साधना है। हिंदुत्व किसी समुदाय को मिटाने की घोषणा नहीं, संपूर्ण सृष्टि में एकत्व देखने की दृष्टि है। 

अर्चना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित मेरी पुस्तक “हिंदुत्व और गाँधी” में भी हिंदुत्व की यही परिभाषा लिखी गई है। न्यूयॉर्क से उन्होंने इसी विचार को संसार के सामने रखा कि संघ की दृष्टि पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने की है।

लेकिन इस संदेश को दुनिया से पहले भारत में उन लोगों को ध्यान से सुनना चाहिए, जो पिछले कुछ वर्षों में अचानक स्वयंभू स्वयंसेवक बन गए हैं।

इनमें से अनेक लोग कभी शाखा नहीं गए। आज भी नहीं जाते। और न ही संघ प्रेरित संगठनों से जुड़े हैं।संघ की प्रार्थना की दो पंक्तियां ठीक से नहीं गा सकते। गुरु पूर्णिमा पर संघ को एक रुपया गुरु दक्षिणा नहीं देते। संघ के सेवा, संयम, समरसता और अनुशासन से उनका कोई संबंध नहीं है। फिर भी सत्ता के निकट होने, पद पाने अथवा अपनी राजनीतिक पहचान चमकाने के लिए स्वयं को “बाल्यकाल से स्वयंसेवक” बताते हुए उन्हें तनिक भी संकोच नहीं होता।

उनकी कथनी और करनी का संघ की सीख से कोई मेल नहीं है। वे दिनभर मुसलमानों को गालियां देते हैं, मुस्लिम मुक्त समाज की बात करते हैं और सोशल मीडिया पर किसी समुदाय, राजनीतिक दल अथवा व्यक्ति विशेष के विरुद्ध विष उगलते रहते हैं। उन्हें लगता है कि हिंदु होने का सबसे बड़ा प्रमाण किसी मुसलमान से घृणा करना है।

डॉ. भागवत का संदेश ऐसे लोगों के लिए एक कसौटी है।

यदि हिंदु होने की पहली शर्त सभी मार्गों का सम्मान और प्रत्येक मनुष्य की गरिमा को स्वीकार करना है तो घृणा फैलाने वाला व्यक्ति हिंदुत्व का प्रतिनिधि कैसे हो सकता है? यदि संघ का ध्येय समाज को संगठित करना है तो समाज को धर्म और जाति के नाम पर बांटने वाला उसका स्वयंसेवक कैसे कहलाएगा?

स्वयंसेवक होना कोई परिचय-पत्र नहीं, जीवन साधना है। शाखा केवल मैदान में एक घंटे का कार्यक्रम नहीं, व्यक्ति के भीतर अनुशासन, आत्मसंयम, सेवा और समाज के प्रति आत्मीयता उत्पन्न करने की प्रक्रिया है। संघ का गणवेश पहन लेना आसान है, लेकिन संघ को अपने आचरण में उतारना कठिन है।

विडंबना यह है कि संघ के विरोधियों से अधिक नुकसान कई बार वे लोग करते हैं, जो संघ का मुखौटा लगाकर अपने निजी नफरती एजेंडे को उसका विचार बताने लगते हैं। उनके शब्दों से समाज में संघ की वही छवि बनती है, जिसका संघ स्वयं प्रतिपादन नहीं करता। वे न हिंदु धर्म की व्यापकता समझते हैं, न संघ की साधना और न उस भारत को, जिसकी आत्मा विविधता में एकता है।

इसलिए सच्चे हिंदुओं, समर्पित स्वयंसेवकों और स्वयं संघ को ऐसे जबरिया बने स्वयंसेवकों से सतर्क रहना होगा। संघ का नाम किसी को गाली देने का अधिकार-पत्र नहीं है। हिंदुत्व किसी के प्रति घृणा की अनुमति नहीं देता।

डॉ. मोहन भागवत को सुनिए, उनके शब्दों का अर्थ समझिए और उन्हें अपने जीवन में उतारिए। संघ की आड़ में अपने नफरती एजेंडे को संघ का चेहरा मत बनाइए।

संघ का वास्तविक चेहरा घृणा का नहीं, आत्मीयता का है। वह चेहरा सचमुच बहुत सुंदर है।


Monday, August 17, 2026

केवल विषधर नहीं, सृष्टि की धारण-शक्ति भी है नाग

 केवल विषधर नहीं, सृष्टि की धारण-शक्ति भी है नाग

#मनोज_जोशी

नागपंचमी पर विशेष


हमारी बोलचाल में साँप प्रायः भय, विष और छल का प्रतीक बनकर आता है। चाणक्य नीति में दुर्जन की तुलना सर्प से करते हुए कहा गया है

दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः।

सर्पो दंशति काले तु दुर्जनस्तु पदे पदे॥

अर्थात् दुर्जन और सर्प में सर्प बेहतर है, क्योंकि वह किसी अवसर पर ही डसता है, जबकि दुर्जन कदम-कदम पर हानि पहुँचाता है। इस श्लोक में भी ध्यान देने योग्य बात यह है कि सर्प की प्रकृति को मनुष्य की दुर्भावना से अलग रखा गया है। सर्प का दंश उसकी स्वाभाविक सुरक्षा-प्रवृत्ति है, जबकि दुर्जन जान-बूझकर और बार-बार आघात करता है।

लेकिन हिंदु संस्कृति में नाग की पहचान केवल विषधर के रूप में नहीं है। हमारे वेद, पुराण, महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता नाग को दैवी शक्ति, सृष्टि की स्थिरता, तप, संरक्षण और प्रकृति-संतुलन से जोड़ते हैं। नागपंचमी इसी व्यापक दृष्टि को समझने का अवसर है।

शुक्ल यजुर्वेद में पृथ्वी, अंतरिक्ष और दिव्य लोकों में स्थित सभी सर्पों को प्रणाम करते हुए कहा गया है

नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु।

ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः॥

अर्थात् पृथ्वी पर रहने वाले, अंतरिक्ष में विचरण करने वाले और दिव्य लोक में स्थित सभी सर्पों को नमस्कार। यह मंत्र मनुष्य को प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक घटक मानता है। जिन जीवों से हमें भय लगता है, उनके अस्तित्व और उनकी भूमिका को भी स्वीकार करना हिंदु चिंतन की विशेषता है।

श्रीमद्भगवद्गीता के विभूति योग में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं

“सर्पाणामस्मि वासुकिः”, अर्थात् सर्पों में मैं वासुकि हूँ। अगले ही श्लोक में वे कहते हैं

“अनन्तश्चास्मि नागानाम्”, अर्थात् नागों में मैं अनन्त हूँ। इस प्रकार नाग को भगवान अपनी विभूतियों में स्थान देते हैं।

वासुकि वही नागराज हैं जिन्हें समुद्र-मंथन में देवताओं और दानवों ने मंथन की रस्सी बनाया। अनन्त या शेषनाग सृष्टि की धारण-शक्ति के प्रतीक हैं। भगवान विष्णु शेषनाग पर विराजते हैं और भगवान शिव के कंठ में नाग सुशोभित है। यह नाग पर विजय या उसके दमन का चित्र नहीं, बल्कि नियंत्रित शक्ति और सामंजस्य का संकेत है। विष को धारण करने वाले शिव के कंठ में विषधर का स्थान यह बताता है कि प्रचंड शक्ति जब मर्यादा में रहती है, तब वह विनाश नहीं, कल्याण का माध्यम बनती है।

महाभारत के आदिपर्व में शेषनाग का चरित्र और भी अर्थपूर्ण रूप में सामने आता है। वे अपने नाग भाइयों के आचरण से विरक्त होकर कठोर तप करते हैं। ब्रह्मा उनके संयम और तप से प्रसन्न होकर उन्हें पृथ्वी को धारण करने का दायित्व देते हैं। जिसे सामान्य दृष्टि केवल विषधर मानती है, हिंदु परंपरा उसी नाग में पृथ्वी का भार सँभालने वाली धैर्यवान शक्ति देखती है।

महाभारत का आस्तीक प्रसंग नागपंचमी के संदेश को और विस्तार देता है। राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई तो उनके पुत्र जनमेजय ने प्रतिशोध में संपूर्ण नागवंश के विनाश के लिए सर्पसत्र आरंभ कर दिया। तब ऋषि आस्तीक ने यज्ञ रुकवाकर नागों को सामूहिक विनाश से बचाया। यह कथा बताती है कि किसी एक के अपराध का दंड पूरे वंश अथवा पूरी प्रजाति को देना धर्मसम्मत नहीं हो सकता। प्रतिशोध की अग्नि जब समूची सृष्टि के संतुलन को नष्ट करने लगे, तब उसे रोकना ही धर्म है।

नागपंचमी का वास्तविक संदेश इसलिए केवल अनिष्ट से बचने के लिए नाग की पूजा करना नहीं है। यह उस जीव के अस्तित्व को स्वीकार करने का संस्कार है, जिससे मनुष्य स्वाभाविक रूप से भयभीत होता है। प्रकृति में सर्पों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे चूहों और अन्य जीवों की संख्या नियंत्रित कर कृषि तथा पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा करते हैं। उनके समाप्त होने का प्रभाव पूरी खाद्य-शृंखला पर पड़ता है।

इस पर्व पर श्रृद्धा के साथ वैज्ञानिक संवेदनशीलता भी आवश्यक है। नागों को पकड़ना, उनका प्रदर्शन करना अथवा उन्हें जबरन दूध पिलाना पूजा नहीं है। साँप का स्वाभाविक आहार दूध नहीं होता। सच्ची नागपूजा यही है कि उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रहने दिया जाए, दिखाई देने पर 

प्रशिक्षित सर्पमित्र या वन विभाग की सहायता ली जाए और भय के कारण उनकी हत्या न की जाए।

हिंदु संस्कृति की विशेषता यही है कि वह प्रकृति की केवल सुंदर और सौम्य शक्तियों को प्रणाम नहीं करती; वह प्रचंड, विषैली और भय उत्पन्न करने वाली शक्तियों में भी दैवी तत्व देखती है। नागपंचमी हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति में जो हमारे अनुकूल नहीं है, वह आवश्यक रूप से अनुपयोगी या नष्ट कर देने योग्य नहीं है।

नाग केवल विषधर नहीं है। वह वासुकि के रूप में ईश्वर की विभूति, अनन्त के रूप में सृष्टि का आधार और आस्तीक की कथा में संरक्षण का अधिकारी भी है। नागपंचमी भय से पूजा का नहीं, भय के पार जाकर सह-अस्तित्व स्वीकार करने का पर्व है।


नमोऽस्तु सर्पेभ्यः।

Sunday, August 9, 2026

लच्छेदार भाषण देकर छवि को निखारने के लिये तालियाँ लेना अलग बात है, नेपथ्य में रहकर दूसरों के लिये कुछ करना अलग बात है।

 लच्छेदार भाषण देकर  छवि को निखारने के लिये तालियाँ  लेना अलग बात है, नेपथ्य में रहकर दूसरों के लिये कुछ करना अलग बात है। 

 - प्रो. राजेन्द्र सिंह 'रज्जु भैया' 

( आज पुण्यतिथि )


रज्जु भैया के इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द है -"नेपथ्य"।

यह केवल मंच के पीछे की जगह नहीं, बल्कि एक कार्य-दृष्टि है। ऐसी दृष्टि, जिसमें व्यक्ति से अधिक महत्व कार्य का होता है और प्रसिद्धि से अधिक महत्व परिणाम का।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धति को यदि एक शब्द में समझाना हो, तो वह शायद "नेपथ्य" ही होगा। संघ ने अपने स्वयंसेवकों को कभी स्वयं को स्थापित करने का प्रशिक्षण नहीं दिया, बल्कि समाज को संगठित करने का संस्कार दिया। इसलिए हजारों स्वयंसेवक ऐसे मिलेंगे, जिन्होंने दशकों तक शिक्षा, सेवा, ग्राम विकास, आपदा राहत, सामाजिक समरसता या संगठन के क्षेत्र में काम किया, लेकिन व्यक्तिगत परिचय या प्रचार उनकी प्राथमिकता कभी नहीं रहा।

संघ की शाखा में स्वयंसेवक को यह नहीं सिखाया जाता कि वह कितना प्रसिद्ध बनेगा; यह सिखाया जाता है कि जहाँ समाज को आवश्यकता हो, वहाँ सबसे पहले और सबसे शांत भाव से खड़ा होना है। इसलिए संघ के अनेक कार्य समाज में दिखाई देते हैं, लेकिन उन्हें करने वाले लोग अक्सर नेपथ्य में ही रहते हैं।

रज्जु भैया स्वयं असाधारण विद्वान थे, सफल भौतिक विज्ञानी थे, प्रभावशाली वक्ता भी थे, लेकिन उन्होंने अपने व्यक्तित्व को कभी केंद्र में नहीं रखा। उनका आग्रह व्यक्ति-पूजा पर नहीं, कार्य और विचार की निरंतरता पर था।

आज जब सार्वजनिक जीवन में दृश्यता को ही सफलता का पर्याय मान लिया गया है, तब रज्जु भैया का यह वाक्य और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह याद दिलाता है कि किसी भी संगठन की वास्तविक शक्ति उसके मंच पर बैठे लोगों में नहीं, बल्कि नेपथ्य में खड़े उन असंख्य कार्यकर्ताओं में होती है, जो बिना किसी अपेक्षा के अपना दायित्व निभाते रहते हैं।

शायद यही कारण है कि संघ ने सदैव व्यक्ति से अधिक विचार और पद से अधिक दायित्व पर बल दिया है। नेपथ्य में रहकर समाज के लिए कार्य करना केवल एक शैली नहीं, बल्कि एक साधना है। और यही साधना रज्जु भैया के व्यक्तित्व और उनके इस वाक्य दोनों का सार है।

 मनोज जोशी

राष्ट्रधर्म अमर रहना चाहिए


 राष्ट्रधर्म अमर रहना चाहिए 

- मनोज जोशी 


मैं रहूँ या काल की धारा मुझे बहा ले जाए,

भारत माता का गौरव अक्षुण्ण रहना चाहिए।

तन मिटे तो मिट जाए इस पावन माटी में,

राष्ट्रधर्म का दीप निरंतर जलना चाहिए।

वेदों की ऋचाएँ गूँजें, गीता का संदेश रहे,

राम का मर्यादा-पथ, कृष्ण का उपदेश रहे।

शंकर का अद्वैत और बुद्ध की करुणा लेकर,

भारत को फिर विश्वगुरु बनना चाहिए।

गंगा निर्मल बहे, हिमालय अडिग खड़ा रहे,

हर वन, नदी और जीव के प्रति श्रद्धा रहे।

इस धरती के कण-कण में ईश्वर का वास मानकर,

प्रकृति का संरक्षण भी पूजा बनना चाहिए।

भगवा केवल रंग नहीं, त्याग और तप की ज्वाला है,

यह ऋषियों के ज्ञान और वीरों की वरमाला है।

धर्म विजय का घोष नहीं, सबके मंगल की कामना है,

विश्व के कल्याण का संकल्प जगना चाहिए।

जाति-पंथ की दीवारें भारत को बाँट न पाएँ,

हम अपने पुरखों और माटी को न भूल जाएँ।

भाषाएँ और वेश अनेक, पर राष्ट्रभाव हो एक,

हर हृदय में भारत का स्पंदन होना चाहिए।

घर-घर संस्कार जगें, मातृशक्ति का मान रहे,

शास्त्र का विवेक और शस्त्र का स्वाभिमान रहे।

अन्याय के सम्मुख मौन रहना धर्म नहीं होता,

सत्य की रक्षा में निर्भय होकर खड़ा होना चाहिए।

मेरा नाम भले इतिहास के पन्नों में न आए,

मेरी आहुति राष्ट्रयज्ञ की अग्नि बढ़ाती जाए।

मैं रहूँ या न रहूँ, इसकी चिंता मुझको नहीं,

हिंदु संस्कृति और भारत अमर रहना चाहिए

एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक

 एक सुभाषित, नेतृत्व के पाँच बड़े सबक 


संस्कृत की सुभाषित परंपरा का एक प्रसिद्ध श्लोक है,

 पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।

शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा पुरुषःपञ्चलक्षणः॥


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहनराव भागवत ने युवाओं से बातचीत में इस सुभाषित का उल्लेख किया।


अगर इसे आज की जिंदगी और मैनेजमेंट की भाषा में समझें, तो मेरी समझ से यह एक तरह से लीडरशिप का पाँच सूत्रीय मॉडल है।


1.पहला सूत्र है - संसाधन सही जगह लगाइए। “पात्रे त्यागी” का मतलब सिर्फ दान देना नहीं है। इसका अर्थ है कि आपका समय, पैसा, ऊर्जा और भरोसा उस व्यक्ति या काम पर लगे, जहां उसका सही उपयोग हो। अच्छे मैनेजर और अच्छे इंसान की पहचान यही है कि वह केवल देता नहीं, बल्कि सही जगह देता है।


2.दूसरा सूत्र - टैलेंट और अच्छाई को पहचानिए। “गुणे रागी” कहता है कि अच्छे गुणों से प्रेम होना चाहिए। किसी टीम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं कि कौन आपके करीब है, बल्कि यह है कि कौन योग्य है, कौन मेहनती है और कौन बेहतर काम कर रहा है। जो व्यक्ति गुणों की कद्र करता है, उसके आसपास अच्छे लोग अपने-आप जुड़ने लगते हैं।


3.तीसरा सूत्र - सफलता अकेले मत रखिए। “संविभागी च बन्धुषु” का सीधा संदेश है कि उपलब्धि, अवसर और श्रेय साझा कीजिए। किसी भी टीम में भरोसा तब बनता है, जब नेता सफलता का श्रेय बाँटता है और मुश्किल समय की जिम्मेदारी खुद भी लेता है।


4.चौथा सूत्र - जानकारी नहीं, समझ विकसित कीजिए। “शास्त्रे बोद्धा” का अर्थ है विषय को समझना। आज हमारे पास जानकारी की कमी नहीं है। फर्क इस बात से पड़ता है कि कौन उस जानकारी का सही अर्थ निकालता है, सही निर्णय लेता है और उसे काम में बदलता है। यही ज्ञान और सिर्फ सूचना के बीच का अंतर है।


5.पाँचवां सूत्र - संकट में नेतृत्व दिखाइए। “रणे योद्धा” का अर्थ केवल युद्ध नहीं है। जीवन और कामकाज में असली रण वह समय है जब परिस्थितियां आपके पक्ष में न हों। दबाव हो, असफलता सामने हो या कठिन फैसला लेना पड़े। अच्छे समय में सब नेतृत्व कर सकते हैं, लेकिन लीडर की असली पहचान संकट के समय होती है।


यही इस श्लोक की आधुनिक उपयोगिता है। सही जगह निवेश, प्रतिभा की पहचान, सफलता की साझेदारी, गहरी समझ और संकट में साहस -ये पाँच गुण किसी व्यक्ति को केवल सफल नहीं, बल्कि प्रभावी लीडर बनाते हैं।

भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल

 भेदभाव का कहाँ सवाल, हम सब भारत माँ के लाल 


 विश्व मूलनिवासी दिवस पर विशेष 


 मनोज जोशी 


आज विश्व मूलनिवासी दिवस है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में इस दिवस की अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संदर्भ हैं, लेकिन भारत में इसे समझने की दृष्टि हमारी अपनी होनी चाहिए। भारत में मूलनिवासी कौन है? इसका सबसे सहज उत्तर है, हम सब भारतवासी मूलनिवासी हैं।

भारत की धरती किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय की मातृभूमि नहीं है। यह हम सबकी मातृभूमि है। फिर मूलनिवासी की पहचान को किसी एक समाज तक सीमित करके बाकी भारतीयों को उससे अलग खड़ा करने की आवश्यकता ही क्या है?

भेदभाव का कहाँ सवाल,

हम सब भारत माँ के लाल।

यही इस दिन का भारतीय संदेश होना चाहिए।

हमारे वनवासी समाज की अपनी विशिष्ट संस्कृति है। उनकी भाषा, लोक परंपराएं, पर्व, नृत्य, कला और प्रकृति के साथ जीवन जीने की शैली भारत की अमूल्य धरोहर हैं। इस विशिष्टता का पूरा सम्मान होना चाहिए। उनके संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक हितों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा भी होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए यह मान लेना जरूरी नहीं कि केवल वही इस भूमि के मूलनिवासी हैं और शेष भारतीय कोई दूसरी श्रेणी हैं।

यहीं शब्दों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

औपनिवेशिक शासन ने भारत को समझने और उस पर शासन करने के लिए समाज को अनेक जातीय, नस्ली और सामाजिक श्रेणियों में वर्गीकृत किया। जनगणना से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक भारतीय समाज को अलग-अलग खांचों में देखने की यह प्रवृत्ति दिखाई देती है। स्वतंत्र भारत को इस विरासत से आगे बढ़कर अपनी सभ्यतागत दृष्टि से समाज को देखना चाहिए जहां विविधता का सम्मान हो, लेकिन विविधता को विभाजन में न बदला जाए।

भारत को जोड़ने वाली अवधारणा यह नहीं हो सकती कि पहले हम यह तय करें कि कौन ‘मूल’ है और कौन नहीं। 

वन में रहने वाला भी इस धरती का पुत्र है और गांव में रहने वाला भी। पहाड़ों में रहने वाला भी और मैदान में रहने वाला भी। शहर में रहने वाला भी उतना ही भारतवासी है जितना किसी दुर्गम वन क्षेत्र में सदियों से अपनी परंपराओं को सहेजकर रखने वाला परिवार।

स्थान अलग हो सकता है, जीवन-पद्धति अलग हो सकती है, पर मातृभूमि अलग नहीं होती।

यही कारण है कि वनवासी समाज को भारत की मुख्यधारा से अलग किसी समानांतर पहचान के रूप में देखने के बजाय भारतीय सभ्यता के अभिन्न अंग के रूप में देखने की आवश्यकता है। गोंड की परंपरा भी भारत की है, भील की भी, बैगा की भी और संथाल की भी। उसी प्रकार तमिल, मराठी, पंजाबी, असमिया, गुजराती, बंगाली और देश की असंख्य अन्य परंपराएं भी भारत की ही हैं।

हम अलग-अलग धाराएं हैं, लेकिन सभ्यता की नदी एक है।

मूलनिवासी शब्द को यदि अधिकार और सम्मान का प्रतीक बनाया जाए तो वह सकारात्मक है। लेकिन उसी शब्द के आधार पर समाज में यह भाव पैदा होने लगे कि कोई इस भूमि पर अधिक मूल है और कोई कम, तो हमें सावधान होना चाहिए। किसी भी भारतीय की भारतीयता को दूसरे की तुलना में कमतर नहीं माना जा सकता।

वनवासी समाज  हमारा अपना है। उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है। उसका गौरव भारत का गौरव है। उसके जंगल और पहाड़ भारत की धरोहर हैं। उसके लोकगीत, देवी-देवता, नायक और परंपराएं भारत माता के विराट स्वरूप का हिस्सा हैं।

इसीलिए मूलनिवासी दिवस को विभाजन की शब्दावली से निकालकर समरसता के उत्सव में बदलने की आवश्यकता है।

न यह किसी एक समाज का अधिकार कम करता है, न किसी की विशिष्ट पहचान मिटाता है। इसके विपरीत यह कहता है, अपनी पहचान पर गर्व कीजिए, अपनी परंपरा बचाइए, अपनी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ाइए; लेकिन सबसे ऊपर उस मातृभूमि को याद रखिए जो हम सभी को एक सूत्र में बांधती है।


 कोई वन में, कोई नगर में, 

 कोई पर्वत, कोई मैदान। 

 बोली-वेश भले हों न्यारे, 

 सबकी माता हिंदुस्तान। 


 और इसलिए 

 किसे मूल और किसे पराया, 

 क्यों खींचें ऐसी दीवार? 

 माटी सबकी, माता सबकी, 

 भारत सबका एक परिवार। 

 भेदभाव का कहाँ सवाल, 

 हम सब भारत माँ के लाल।

Wednesday, April 5, 2023

प्लास्टिक की पन्नी और मन्नत : हिंदु संस्कृति की परंपरा में विकृति



प्लास्टिक की पन्नी और मन्नत : हिंदु संस्कृति की परंपरा में विकृति

#मनोज_जोशी



 


पिछले सप्ताह संयोग से चैत्र शुक्ल अष्टमी पर यानी बुधवार को कर्फ्यू वाली माता के मंदिर में दर्शन के लिए परिवार के साथ पहुंच गया। बिना किसी योजना के ऐसे पहुंचा जैसे स्वयं माता ने बुलाया हो। और यहाँ शेर के पाँव में बड़ी संख्या में पन्नी बंधी हुईं दिखी। याद आया कि कुछ दिन पहले ही Dainik Bhaskar में खबर छपी थी कि मन्नत के लिए यहाँ लोग शेर के पाँव में प्लास्टिक की पन्नी बांध रहे हैं। कलावा और चुनरी बांधना तो सुना था, प्लास्टिक की पन्नी की बात पहली बार सुनी तो अजीब सा लगा। और फिर उस दिन देख लिया तो मन खिन्न हो गया।

आखिर पन्नी बांधने की परंपरा कहाँ से आ गई।

मुझे अपने बचपन की दो घटनाएं याद आ गईं। 

1.घर के पास कालीजी का मंदिर था और उसी में हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित हो गई थी। कई मित्र खास तौर से गणित की परीक्षा वाले दिन हनुमान जी के दर्शन करने जाते और उनसे परीक्षा में पास कराने की प्रार्थना करते। अपने राम को कभी इसकी जरूरत महसूस नहीं हुई। बाद के वर्षों में उस मंदिर में और शहर के दूसरे हनुमान मंदिरों में चिट्ठियां चिपकने लगीं।

यह चिट्ठी परिणाम को कितना प्रभावित करती है पता नहीं ... लेकिन भक्त और भगवान के रिश्ते में भावनात्मक लगाव इतना होता है कि इस चिट्ठी को आस्था और विश्वास का प्रकटीकरण मानकर स्वीकार कर लिया।

और फिर इसमें कोई बुराई भी नहीं। भक्त अपने ढंग से अपने मन की बात भगवान से कहा रहा है। कई बार तो यह चिट्ठियां बहुत मार्मिक भी होती हैं।


2. यह किस्सा बिल्कुल प्लास्टिक की पन्नी जैसा ही है। घर पर माँ के स्पष्ट निर्देश थे कि भगवान को चीनी के बर्तन में भोग नहीं लगेगा। वो कहती थीं चीनी का बर्तन शुद्ध नहीं है, भगवान उसके भोग को स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन बचपना तो बचपना होता है, जैसा कहा वैसा मान लिया तो काहे के बच्चे। अपने राम ने एक दिन पूजा की और चीनी की प्लेट में भोग लगा दिया। पता नहीं क्या हुआ वह चीनी की प्लेट नीचे गिर कर टूट गई और भोग सामग्री जमीन पर फैल गई। उस घटना से यह बात मन में कहीं बैठ गई कि वाकई चीनी के बर्तन में भगवान भोग स्वीकार नहीं करते।

अब वापस पन्नी वाली बात पर आता हूँ।‌ यह तो हम सब जानते हैं कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए घातक है। और जो पर्यावरण के लिए घातक है उसे ईश्वर कैसे स्वीकार करेंगे ? हम तो हिंदु संस्कृति के वाहक हैं। प्रकृति के हर अंग पेड़ पौधे पशु पक्षी सब में देवताओं का वास मानने वाला हिंदु समाज उस पॉलिथीन को बांध कर मन्नत मांग रहा है जिसके खाने से गौ माता बीमार पड़ रहीं हैं। गौ माता में तो सभी देवताओं का वास हैं। और केवल गौ माता क्यों भगवान विष्णु के दशावतार का ध्यान कीजिए मछली से लेकर मानव तक सब में विष्णु अवतार का अंश मौजूद हैं। 

आखिर इसका आधार क्या है? और दुख का विषय यह है कि यह उस मंदिर में हो रहा है जिसकी स्थापना के लिए हमारी पुरानी पीढ़ी ने संघर्ष किया, कर्फ्यू लगा इसीलिए तो कर्फ्यू वाली माता का मंदिर नाम प्रचलित हुआ।

और मंदिर की स्थापना क्यों होती है ? संस्कृति की रक्षा के लिए ही ना ? फिर यह पन्नी बांध कर क्या हम रक्षा कर रहे हैं? इस पर विचार नितांत आवश्यक है।

हिंदु religion नहीं संस्कृति है, जीवनशैली है। यह परिवर्तनशील है इसीलिए युगों तक अक्षुण्ण है। इसकी अक्षुण्णता को बनाए रखने के लिए विकृतियों को भी रोकना होगा।


एक गीत जिसने १९८० के दशक के अंतिम वर्षों में मुझे प्रेरणा दी उसके बोल थे

"रुढ़ियों को तोड़ दो, परंपराएं मोड़ दो

जिसमें देश का भला न हो

वो हर काम छोड़ दो"

मुझे लगता है इसमें एक बात और जोड़ना पड़ेगी

"विकृतियों को रोक दो"

Monday, February 6, 2023

‘परंम् वैभवम नेतुमेतत्वस्वराष्ट्रं’

‘परंम् वैभवम नेतुमेतत्वस्वराष्ट्रं’


यानी राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाना है. अगर आप मुझसे पूछें कि यह कैसे होगा? तो मेरा स्पष्ट मत यह है कि जाति व्यवस्था को समाप्त करना होगा और इसकी शुरुआत जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करके होगी।

एक ही मंदिर, एक जलाशय, सबका एक श्मशान हो। जब तक यह एकता नहीं आएगी। जाति के आधार पर श्रेष्ठता और निम्नता के भाव जब तक समाप्त नहीं होंगे, हम परम वैभव के लक्ष्य को नहीं पा सकते। हमारे सांस्कृतिक इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण मौजूद हैं जो साबित करते हैं कि प्राचीन वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी, जन्म आधारित नहीं। बाद में यह जन्म आधारित जाति व्यवस्था में बदल गई।

अक्तूबर, 2003 में नागपुर में अपने विजयादशमी उद्बोधन में संघ के पांचवें सरसंघचालक सुदर्शन जी ने कथित दलित समस्या पर कहा, 'अपने ही समाज के एक वर्ग को दलित जैसे घृणित शब्द से संबोधित करना कहां तक उचित है? वास्तव में जो लोग विकास के निम्न स्तर पर हैं उनमें ऊपर उठने का आत्मविश्वास जगाना पहली आवश्यकता है। हमारी सोच यह है कि यह कार्य समाज को स्वयं करना होता है और यह कार्य तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थों से प्रेरित नेता लोग नहीं कर सकते। इस कार्य को सामाजिक एवं धार्मिक नेतृत्व को अपने हाथ में लेना चाहिए।'

संघ के चौथे सरसंघचालक रज्जू भैया एक जगह लिखते हैं -'इस देश का हिन्दू समाज हजारों वर्षों तक समृद्धि एवं वैभव का जीवन जीने के बाद ईसा की नवमी और दशमी शताब्दियों में ऐसी रुढ़िग्रस्त अवस्था में पहुंच गया जहां गुण-कर्म पर आधारित वर्ण एवं जाति व्यवस्था को ऊंच-नीच का पर्याय मानकर हमारे ही लोगों ने राष्ट्र के उत्थान में बाधाएं खड़ी कर दीं। परिणामत: हिन्दू समाज अनेक प्रकार से विभक्त हो गया और राष्ट्र को निरंतर आठ सौ वर्षों तक परकीयों की दासता सहनी पड़ी।'

संघ के तृतीय सरसंघचालक बालासाहेब देवरस का तो यह वाक्य प्रसिद्ध है - "यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है तो संसार में कुछ भी पाप नहीं है।"

बालासाहब देवरस ने 1986 राष्ट्रीय सेविका समिति के स्वर्ण जयंती समारोह में दिए भाषण में कहा था 'जाति-व्यवस्था को समाप्त कर देना चाहिए. हिंदू समाज की जातिप्रथा समाप्त होने पर सारा संसार हिंदू समाज को वरण करेगा. इसके लिए भारतीय महिला समाज को पहल अपने हाथ में लेकर अपने घर से ही अंतरजातीय और अंतरप्रांतीय विवाह की शुरुआत करनी चाहिए.'

द्वितीय सरसंघचालक गुरु गोलवलकर जी कहते थे - ‘चातुर्वर्ण्य में न तो किसी वर्ण का अस्तित्व है और न ही किसी जाति का. आज तो हम सभी का एक ही वर्ण और एक ही जाति है और वह है हिंदू.’

संघ के संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने कहा ‘हम अस्पृश्यता दूर करने की बात नहीं करते बल्कि हम स्वयंसेवकों को इस प्रकार विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं कि हम सभी हिंदू हैं और एक ही परिवार के सदस्य हैं. इससे किसी भी स्वयंसेवक में इस तरह का विचार नहीं आता है कि कौन किस जाति का है?’

#मनोज_जोशी

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Friday, January 13, 2023

गाँधी - गोडसे : आखिर वैचारिक असहमति हत्या का अधिकार तो नहीं देती


 #मनोज_जोशी 

फिल्म डायरेक्टर राजकुमार संतोषी की आने वाली फिल्म गांधी-गोडसे एक युद्ध का ट्रेलर रिलीज होने के दो दिन बाद ही इसका विरोध शुरु हो गया है। और इस विरोध के साथ ही गांधीजी और गोडसे को लेकर चलने वाली बहस एक बार फिर आम हो गई है। 

पिछले महीने मेरी पुस्तक "हिंदुत्व और गाँधी" का लोकार्पण हुआ है। इस पुस्तक के लेखन के लिए जब मैं अध्ययन कर रहा था तो स्वाभाविक रूप से गोडसे के बारे में काफी कुछ समझा और पढ़ा। 

लेकिन अंत में मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि गोडसे का पक्ष सामने लाना और उस पर चर्चा करना वास्तव में हिंदुत्व का नुक़सान ही है। और यही वज़ह है कि मैंने अपनी पुस्तक में गोडसे का जिक्र नहीं किया, बल्कि मैं उसका नाम भी लेना उचित नहीं समझता।

लेकिन इस विवाद को देखते हुए आज कुछ ऐसी बातें जो किताब में नहीं लिखी और कुछ ऐसी जो उसमें लिखी है सब मिलाकर अपनी बात कहना चाहता हूं। 

यह बात सही है कि नाथूराम गोडसे के बयान वाले दिन यानी ८ नवम्बर १९४८ को अदालत में काफी भीड़ थी और गोडसे का बयान सुनते हुए अदालत में मौजूद लोगों की आँखें नम हो गई थी। १० फरवरी १९४९ को गोडसे को फाँसी की सजा सुनाते हुए जस्टिस जीडी खोसला ने लिखा कि .."मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित दर्शकों को संगठित कर ज्यूरी बना दिया जाता। इसके साथ ही उन्हें नाथूराम गोडसे पर फैसला सुनाने को कहा जाता, तो भारी बहुमत के आधार पर गोडसे 'निर्दोष' (Not Guilty) करार दिया जाता। 

लेकिन मेरी मान्यता है कि इतने भर से गोडसे का अपराध तो कम नहीं हो जाता। यह भी सच है कि गाँधीजी विभाजन को नहीं रोक पाए और विभाजन के बाद और पहले गाँधीजी के कई फैसलों से हम असहमत हो सकते हैं। लेकिन इस असहमति का अर्थ क्या है कि हम जिससे असहमत हैं उसकी हत्या कर दें। यह तो जंगलराज ही होगा। एक तथ्य यह भी है कि गाँधीजी स्वयं इस आजादी से खुश नहीं थे और वह दिल्ली में हुए आजादी के जश्न में शामिल नहीं हुए थे।‌ शायद वे विभाजन को मन से स्वीकार नहीं कर सके थे । इसलिए ऐसी व्यवस्था चाहते थे कि दोनों देशों में बिना पासपोर्ट वीजा के आना-जाना हो सके

यदि आप हिंदुत्व की बात करें तो एक परिभाषा यह भी है - जिसका ह्रदय इंदु यानी चंद्रमा के समान पवित्र है वह हिंदु है। चंद्रमा के समान पवित्र हृदय वाला व्यक्ति तो असहमति पर हत्या नहीं करेगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ विचारक स्व एमजी वैद्य के एक बयान का मैंने अपनी पुस्तक में जिक्र किया है। एमजी वैद्य ने कहा है ...'मैं नाथूराम गोडसे का सम्मान करने और उन्हें सम्मान देने के खिलाफ हूँ. वह एक हत्यारा है। इसके आगे वे और भी महत्वपूर्ण बात कहते हैं - 'कुछ लोग कहते हैं कि इससे (गोडसे के महिमामंडन) हिंदुत्व का गौरव बढ़ेगा। नहीं इससे हिंदुत्व का नाम खराब होगा...मैं तो यहां तक कहता हूं कि गांधी की हत्या से हिंदुत्व को नुकसान पहुंचा है।'

वैद्य ने गाँधीजी के विचारों को लेकर असहमति को भी स्वीकारा और कहा, 'महात्मा गांँधी ने अपने जीवनकाल में आजादी के बारे में जागरूकता फैलाई। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम उनकी सभी नीतियों से सहमत हों। लेकिन विचारों की लड़ाई को विचार से लड़ा जाना चाहिए, इसके लिए खून की होली खेलने की इजाजत नहीं दी जा सकती।'

कुछ और तथ्य जिनका पुस्तक में जिक्र है वह भी दोहराना चाहूंगा। महात्मा गाँधी की हत्या की जानकारी मिलने पर गुरु गोलवलकर जी की पहली प्रतिक्रिया थी "यह देश का दुर्भाग्य है।" उन्होंने 13 दिन तक शोक मनाने की घोषणा की।‌ 

इसके बावजूद संघ पर प्रतिबंध लगा। गाँधीजी की हत्या के पाँचवें दिन संघ पर हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने का आरोप लगाकर ४ फरवरी १९४८ को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

११ जुलाई १९४९ को यह प्रतिबंध उठा लिया गया, जबकि गाँधीजी की हत्या पर अदालत का फैसला संघ से प्रतिबंध हटाने के लगभग ४ महीने बाद ८ नवंबर १९४९ को आया। क्या इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि सरकार को अपनी गलती का एहसास हो गया था।

 यदि आप गांधी जी की हत्या को लेकर आज भी संघ पर आरोप लगाते हैं या गोडसे को संघ से जोड़ते हैं तो यह सुप्रीम कोर्ट का अपमान है और उस समय की सरकार का अपमान है। संघ तो आज भी रोजाना अपने प्रातः स्मरण में गाँधीजी को याद करता है।

बात यहीं खत्म नहीं होती मैं तो यह पूछना चाहता हूँ कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के नाती जीवी केतकर पर गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र की जानकारी होने का आरोप लगाते समय लोगों को शर्म नहीं आई क्या? उन पर हत्या के षड्यंत्र की जानकार छिपाने के आधार पर रासुका लगाई गई। इसके बाद एक आयोग बना। आयोग की रिपोर्ट केतकर के साथ सावरकर और संघ को भी निर्दोष साबित करती है।

(फोटो साभार गूगल)





Thursday, July 7, 2022

सवाल यह है कि इन सवालों के जवाब कौन देगा

सवाल यह है कि इन सवालों के जवाब कौन देगा

#मनोज_जोशी

बुधवार को भोपाल में नगर निगम चुनाव के लिए मतदान हो गया। अब हर जुबान पर दो ही प्रश्न हैं। महापौर कौन बन रहा है ?और परिषद किसकी बनेगी ? वैसे सैद्धांतिक बात तो यह है कि अगर यह पता ही होता तो चुनाव क्यों कराते? सीधे ही महापौर और हर वार्ड में पार्षद घोषित कर देते 😊  इसी प्रश्न का जवाब तलाशने के लिए ही तो चुनाव हुआ है। मतगणना होगी और सच सामने आ जाएगा।


लेकिन इस पूरे चुनाव में और खास तौर से मतदान वाले दिन के माहौल को देखकर मेरे मन में कुछ बातें हैं। कांग्रेस के बारे में तो शुरू से यही कहा जाता है कि वहां कैंडिडेट चुनाव लड़ता है और इस बात से कोई भी इनकार नहीं करेगा कि महापौर पद के लिए  कांग्रेस के पास विभा पटेल से बेहतर कोई और उम्मीदवार नहीं था।

लेकिन भाजपा में तो ऐसा ही कहा जाता रहा है कि संगठन चुनाव लड़ता है। देवतुल्य कार्यकर्ताओं के इस संगठन में लगी हुई घुन नेताओं को दिखे या ना दिखे आम आदमी को तो दिखने लगी है। मतदाता सूची में अपना नाम तलाशने के लिए लोग यहां-वहां भटक रहे थे और नाम नहीं मिलने पर निराश और नाराज़ होकर लौट रहे थे। जिन इलाकों को भाजपा का कोर वोटर वाला इलाका माना जाता है, वहां भी सैकड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब हो गए। मेरा मन यह प्रश्न पूछ रहा था कि जिस पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष भी खुद को अपने बूथ की मतदाता सूची का पन्ना प्रभारी बताता है, उस देवतुल्य कार्यकर्ता को यह क्यों नहीं पता चला कि उसके पन्ने से लोगों के नाम कट गए हैं। आखिर देवतुल्य यानी देवता के समान का वह कार्यकर्ता कहां अपनी पूजा करा रहा था ? या मंच से जिसे देवतुल्य कहा जाता है उसे भक्त तो छोड़िए चाटुकार बनने के लिए मजबूर कर दिया गया है। गले में गमछा डाल कर पार्टी के बड़े नेताओं के आसपास चक्कर लगाना, दिन भर नेता जी के बंगले के बाहर या प्रदेश कार्यालय में खड़े होकर गपशप करना और हमेशा राजनीतिक समीकरणों पर ही चर्चा करना यही राजनीतिक गतिविधि रह गई है। पार्टी के कार्यक्रम आते हैं, पैसा देकर फ्लेक्स बन जाते हैं, ठेकेदार उन्हें लगा देता है और सत्ता में है इसलिए किसी न किसी बहाने से प्रशासन भीड़ जुटा देता है। नतीजा उस कार्यकर्ता का अपने क्षेत्र की जनता या मतदाता से सीधा संपर्क ही नहीं हो पाता। कुल मिलाकर इस सब में हुआ यह कि जब मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा था तब बड़े नेता जी ने ध्यान नहीं दिया और कार्यकर्ता को आदेश नहीं मिला इसलिए उसने कुछ नहीं किया। कुछ शातिर दिमाग लोगों ने अपने विरोधियों के नाम कटवा दिए। पार्टी के भीतर मची सिर फुटौव्वल का एक उदाहरण ऐसा भी है जिसमें प्रबल दावेदार का नाम ही मतदाता सूची से कटवा दिया गया जब तक वह जागे तब तक देर हो चुकी थी नतीजा टिकट मिलने के बाद भी वापस करना पड़ा। पार्षदों के टिकट वितरण में किस क्षेत्र में किस नेता ने, किसके लिए, कितना जोर लगाया और अपने मनपसंद उम्मीदवार को टिकट नहीं मिलने पर पूरे प्रचार के दौरान उन नेता जी ने और उनसे जुड़े कार्यकर्ताओं ने कितना काम किया इसका विश्लेषण करेंगे तो हर विधानसभा क्षेत्र में मतदान के प्रतिशत की हकीकत सामने आ जाएगी।

प्रशासन ही सब कुछ करेगा इस मानसिकता के नतीजे का व्यक्तिगत उदाहरण देता हूं। महापौर और पार्षदों के लिए पहली बार हुए आरक्षण के समय जब मतदाता सूची का पुनरीक्षण चल रहा था, मुझे अपना नाम मतदाता सूची में नहीं मिला। मैंने आवेदन दिया और वार्ड 82 में नाम जुड़ गया, जबकि मैं वार्ड 83 में निवास करता हूं। सभी संबंधित अधिकारियों को बताने के बावजूद मुझे भी कल वार्ड 82 में वोट डालने जाना पड़ा। मेरे पते के आधार पर वहां नाम नहीं मिल रहा था क्योंकि पता तो 83 नंबर का था। कुछ देर मशक्कत के बाद नाम मिला और मैं वोट डाल पाया। सवाल यह है कि वार्ड 82 के पार्षद प्रत्याशी से मेरा क्या लेना देना ? और इस उदाहरण से यह भी समझ में आता है कि प्रशासन ने नाम जोड़ने घटाने में कितनी रूचि ली होगी।

इसी तरह की एक और बात। निर्वाचन आयोग ने नियम बना दिया है कि पर्चियां भी बीएलओ बांटेंगे। बीएलओ यानी सरकारी बाबू जिनकी आदत दफ्तर में बैठकर काम करने की है वह चाह कर भी घर-घर घूम कर पर्चियां नहीं बांट सकते। यदि राजनीतिक कार्यकर्ता घर-घर जाकर पर्चियां बांटें तो इसमें क्या परेशानी है ? यह मेरे समझ में तो नहीं आता। 

चुनाव परिणाम चाहे जो हों लेकिन सभी प्रश्न जवाब मांगेंगे। आखिर सवा साल बाद विधानसभा के चुनाव भी होना है। 



Monday, October 25, 2021

बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं.....

 बचपन जैसी दिवाली  मनाते हैं.....


हुई करवा चौथ अब साफ़-सफाई में जुट जाते हैं

चूने और नील वाली बात हुई पुरानी तो क्या,

बाजार से ऑइल पेंट लाकर खुद पुताई करते हैं

अलमारी खिसकाएं शायद कोई खोई चीज़ 

वापस  मिल जाए, और हम मुस्कराएं

जैसे बचपन में खिलौना मिल जाता था

और हम इठलाते थे

आओ, बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

घर का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते हैं 

दौड़- दौड़  के घर का हर सामान लाते हैं 

कुछ पैसे पटाखों के लिए बचाते हैं

आओ, बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

बैरागढ़ जाकर थोक की दुकान से पटाखे लाते है

मुर्गा ब्रांड , लक्ष्मी बम और रस्सी बम और सांप की गोली लेकर आते हैं

दो -तीन दिन तक पटाखे  छत धूप में सुखाते हैं

बार-बार सब दोस्तों के पटाखे गिनते जाते है

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं 

मोहल्ले से निकल कर न्यू मार्केट की रौनक देखने जाते हैं

दुकान पर रखी  चीजों को उठाते हैं

और रेट पूछकर वापस रख देते हैैं

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं 

बिजली की सिरीज़ और कैंडल लटकाते है

याद करो

केसे सिरीज बनाते थे, छत से लटकाते थे

मास्टर  बल्ब लगाते थे

टेस्टर रखकर पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते थे

एक बार फिर दो-चार बिजली के झटके भी  खाते हैं

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

धनतेरस के दिन कटोरदान लेकर आते हैं

घर पर बने चकली गुजिया  खाते हैं

प्रसाद की  थाली   पड़ोस में  देने जाते हैं

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

खील में से  धान बिनवाते हैं 

खांड  के खिलोने के साथ धान खाते है 

अन्नकूट की तैयारी में हाथ बंटाते हैं

नए नए पकवान खाते हैं

भैया-दूज के दिन बहन से तिलक करवाते हैं 

चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं

दिवाली बीत जाने पर बिन फूटे पटाखों का बारूद जलाते हैं घर की छत पे जले हुए राकेट पाते हैं 

बचपन के सारे दोस्त इकट्ठा हो जाते हैं

 चलो इस बार बचपन जैसी दिवाली मनाते हैं


Wednesday, July 7, 2021

भागवत के बयान पर विवाद क्योंकि व्हाट्सएप और ब्रेकिंग न्यूज़ से हमारी याददाश्त हुई कमजोर

  भागवत के बयान पर विवाद क्योंकि
 व्हाट्सएप और ब्रेकिंग न्यूज़ से हमारी याददाश्त हुई कमजोर

3 दिन पहले संघ सरसंघचालक मोहन भागवत का बयान आया कि भारत के हिंदुओं और मुसलमानों का डीएनए एक ही है। मीडिया में आए इस बयान से हलचल मच गई। ब्रेकिंग न्यूज़ और व्हाट्सएप मैसेज के इस युग में ज्यादातर लोग ना तो संदर्भ देखते हैं और ना उन्हें पुरानी बातें याद रहती हैं। 

आरएसएस और मुसलमान यह हमेशा से ही विघ्न संतोषी लोगों का प्रिय विषय रहा है। ऐसे में भागवत के मीडिया में आए बयान की जब तक पूरी पड़ताल नहीं की जाए तब तक किसी भी तरह की धारणा बनाना उचित नहीं है।

जरा विचार कीजिए

 (१) क्या भागवत ने किसी भी पुस्तक के विमोचन समारोह में केवल एक या दो लाइन का ही भाषण दिया होगा? 

भागवत तो आमतौर पर सरल शब्दों में संदर्भों के साथ 45 मिनट से लेकर 1 घंटे तक भाषण देते हैं। इसलिए इस पुस्तक विमोचन समारोह में भी उनका भाषण कुछ लंबा ही रहा होगा ना।

(२) क्या भागवत ने ऐसा पहली बार कहा है ?

सितंबर 2018 में विज्ञान भवन नई दिल्ली में 3 दिन तक चली व्याख्यानमाला में सरसंघचालक ने क्या कहा था। जरा इसे पढ़ लीजिए


भागवत ने द्वितीय सरसंघचालक गुरु जी की पुस्तक बंच ऑफ थॉट्स और मुसलमानों से जुड़े एक प्रश्न के जवाब में कहा था - "अरे भाई हम एक देश की संतान हैं, भाई-भाई जैसे रहें. इसलिए संघ का अल्पसंख्यक शब्द को लेकर रिज़र्वेशन है. संघ इसको नहीं मानता. सब अपने हैं, दूर गए तो जोड़ना है. अब रही बात 'बंच ऑफ थॉट्स' की, तो बातें जो बोली जाती हैं वे परिस्थिति विशेष, प्रसंग विशेष के संदर्भ में बोली जाती हैं. वे शाश्वत नहीं रहतीं. एक बात यह है कि गुरुजी (गोलवलकर) के जो शाश्वत विचार हैं, उनका एक संकलन प्रसिद्ध हुआ है- 'श्री गुरुजी विजन और मिशन,' उसमें तात्कालिक सन्दर्भ वाली सारी बातें हमने हटाकर उनके जो सदा काल के लिए उपयुक्त विचार हैं उन्हें हमने लिया है. संघ बंद संगठन नहीं है कि हेडगेवर जी ने कुछ वाक्य बोल दिए, हम उन्हीं को लेकर चलने वाले हैं. समय के साथ चीज़ें बदलती हैं।"

इसके पहले भी सरसंघचालक मोहन भागवत के इस तरह के बयान आते रहे हैं। 

(३)क्या मुसलमानों के संदर्भ में इस तरह के बयान देने वाले भागवत पहले सरसंघचालक हैं?

इस सवाल का जवाब है नहीं ऐसा नहीं है। विस्तार में जाएंगे तो डॉ हेडगेवार और गुरु जी सहित सभी सरसंघचालकों के ऐसे ही विचार आपको मिल जाएंगे।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर में डॉ. हेडगेवार ने कुछ मुस्लिम धार्मिक नेताओं के साथ एक सहज संबंध बनाने की शुरुआत की थी और साठ के दशक में गोलवलकर ने विश्वयुद्ध से पहले के दिनों के उस रिश्ते को पुनर्जीवित करने की कोशिश की थी।"

(४) क्या कभी यह सोचा है कि हिंदू महासभा के होते हुए भी भारतीय जनसंघ की स्थापना क्यों हुई? संघ और हिंदू महासभा तो कई मुद्दों पर एक साथ काम करते थे ना।

पिछले दिनों महात्मा गांधी के संदर्भ में किए अध्ययन और लेखन के दौरान मैं इस नतीजे पर पहुंचा था कि आजादी के बाद भी हिंदू महासभा ने अपनी सदस्यता केवल उन्हीं लोगों के लिए खोली थी जो रिलीजियस रूप से हिंदू हों, जबकि संघ का मानना था कि भारत में जन्मा हर व्यक्ति हिंदू है। बशर्ते वह भारत माता को अपनी मां का दर्जा दे और यह स्वीकार करे कि हम सब के पूर्वज एक ही हैं और इस नाते भारत की संस्कृति का सम्मान करे। भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में से एक बलराज मधोक भारत के मुसलमानों को हिंदवी मुसलमान कहते थे। जनसंघ की माइनॉरिटी सेल बहुत मजबूत थी। ध्यान रहे उस समय गुरुजी संघ के सरसंघचालक थे। जनसंघ पर संघ का शत प्रतिशत नियंत्रण था आज की भाजपा तो उससे काफी हद तक मुफ्त है

(५) क्या संघ की शाखाओं में मुसलमान जा सकते हैं?

संघ ने 1979 से अपनी शाखाएं मुसलमानों के लिए खोल रखी हैं। कुछ मुस्लिम स्वयंसेवक शाखा में जाते हैं यह बात सही है कि उनकी संख्या बहुत कम है। लेकिन भारतीय मजदूर संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद सहित अन्य अनुषांगिक संगठनों में बड़ी संख्या में मुस्लिम पदाधिकारी है। वे इन संगठनों के कार्यक्रमों के दौरान भगवा ध्वज को प्रणाम भी करते हैं। 

(६) क्या आपको पता है मोहन भागवत किस संगठन के कार्यक्रम में गए थे ?

उस संगठन का नाम है मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ‌। स्वर्गीय कुप सी सुदर्शन ने सरसंघचालक रहते हुए इस संगठन की स्थापना कराई। संघ प्रचारक इंद्रेश कुमार इसके कर्ताधर्ता हैं। जब आप इस संगठन की गतिविधियों की जानकारी इकट्ठा करेंगे तो पता चलेगा कि यह संगठन मुसलमानों को राष्ट्रीय विचारधारा से जोड़ने का काम कर रहा है। 

(७) अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात आखिर भागवत ने कहा क्या था ?

उनके भाषण की ट्रांसस्क्रिप्ट पढ़ लीजिए। यह है पूरा उद्बोधन

भागवत ने कहा -

ये कोई इमेज मेकओवर का एक्सरसाइज नहीं है, संघ क्या है 90 वर्षों से पता है लोगों को. संघ को इमेज की कभी परवाह रही नहीं है. हमको बाकी कुछ करना नहीं है, सबको जोड़ना है, अच्छा काम करना है. हमारा संकल्प सत्य है, इरादा पक्का है, पवित्र है. किसी के विरोध में नहीं किसी की प्रतिक्रिया में नहीं.


इसलिए ये इमेज बदलने का कोई एक्सरसाइज नहीं है, ये अगले चुनावों के लिए मुसलमानों का वोट पाने का प्रयास भी नहीं है क्योंकि हम उस राजनीति में नहीं पड़ते.


हां हमारे कुछ विचार है, राष्ट्र में क्या होना चाहिए क्या नहीं होना चाहिए उसके बारे में. और अब एक ताकत बनी है तो वो ठीक हो जाए इतनी ताकत हमें जहां लगानी है, चुनावों में भी लगाते है. ये बात जरूर है लेकिन हम किसी के पक्षधर है इसलिए नहीं, हम राष्ट्र हित के पक्षधर है. उसके खिलाफ जाने वाली बात कोई भी करे हम उसका विरोध करेंगे. और उसके पक्ष में जाने वाली बात कोई भी करे हम उसका समर्थन करेंगे.


कुछ काम ऐसे है जो राजनीति बिगाड़ देती है, मनुष्यों को जोड़ने का काम राजनीति से होने वाला नहीं है. राजनीति चाहे तो उसपर असर डाल सकती है, बिगाड़ सकती है उतनी मात्रा में राजनीति की चिंता लोगों को जोड़ने वालों को करनी पड़ती है. वो कोई भी हो हम हों या अगर आप जोड़ने चले है उनको भी चिंता है वो करनी पड़ेगी. परंतु राजनीति इस काम का औजार नहीं बन सकती. इस काम को बिगाड़ने का हथियार बन सकती है.


हिंदू मुसलमान एकता ये शब्द ही बड़ा भ्रामक है, ये दो है ही नहीं तो एकता की बात क्या. इनको जोड़ना क्या ये जुड़े हुए है. और जब ये मानने लगते है की हम जुड़े हुए नहीं है तब दोनो संकट में पड़ जाते है. बात यही हुई है. हम लोग अलग नहीं है क्योंकि हमारे देश में ये परंपरा नहीं है की आप की पूजा अलग है इसलिए आप अलग है.


हम लोग एक है और हमारी एकता का आधार हमारी मातृभूमि है. आज हमारी पूरी जनसंख्या को ये भूमि आराम से पाल सकती है, भविष्य में खतरा है उसको समझ के ठीक करना पड़ेगा.


हम समान पूर्वजों के वंशज है. ये विज्ञान से भी सिद्ध हो चुका है. 40 हजार साल पूर्व से हम भारत के सब लोगों का डीएनए समान है.


हिंदुओ के देश में हिंदुओ की दशा ये हो गई जरूर दोष अपने ही समाज में है, उस दोष को ठीक करना है. ये संघ की विचारधारा है.


तथाकथित अल्पसंख्यकों के मन में यह डर भरा गया है की संघ वाले तुमको खा जायेंगे. दूसरा ये डर लगता है की हिंदू मेजोरिटी देश में आप रहोगे तो आपका इस्लाम चला जायेगा. अन्य किसी देश में ऐसा होता होगा. हमारे यहां ऐसा नहीं है. हमारे यहां जो जो आया है वो आज भी मौजूद है.


मैं बहुत आग बबूला होके भाषण करके हिंदुओ में पापुलर तो हो सकता हूं, लेकिन हिन्दू कभी मेरा साथ नहीं देगा. क्योंकि वो आतातायित्व पर चलने वाला नहीं है. वो जानता है की अपना शत्रु है तो भी उसको जीने का हक है. लड़ाई भी होती है और लड़ाई हारने के बाद शत्रु कहता है माफ करो तो उसको शरण देना है. ये परंपरा है.


अगर हिंदू कहते है की यहां एक भी मुसलमान नहीं रहना चाहिए तो हिंदू हिंदू नही रहेगा. ये हमने संघ में पहले नहीं कहा है, ये डॉक्टर साब के समय से चलती आ रही विचारधारा है. ये विचार मेरा नहीं है, ये संघ की विचारधारा का एक अंग है क्योंकि हिंदुस्तान एक राष्ट्र है. यहां हम सब एक है. इतिहास भी होंगे लेकिन पूर्वज सबके समान है.


लोगों को पता चले इस ढंग से इस्लाम भारत में आया वो आक्रामकों के साथ आया. जो इतिहास दुर्भाग्य से घटा है वो लंबा है, जख्म हुए है उसकी प्रतिक्रिया तीव्र है. सब लोगों को समझदार बनाने में समय लगता है लेकिन जिनको समझ में आता है उनको डटे रहना चाहिए.


देश की एकता पर बाधा लाने वाली बाते होती है तो हिंदू के खिलाफ हिंदू खड़ा होता है. लेकिन हमने ये देखा नहीं है की ऐसी किसी बात पर मुस्लिम समाज का समझदार नेतृत्व ऐसे आताताई कृत्यों का निषेध कर रहा है.


लोगों को कन्वर्ट करने के लिए तैयारी करने का समय मिले इसलिए लोगों को बातों में उलझा कर रखना ये भी एक अर्थ होता है बातचीत का. ऐसा किसी ने किया हो तो पता नहीं.


कट्टरपंथी आते गए और उल्टा चक्का घुमाते गए. ऐसे ही खिलाफत आंदोलन के समय हुआ. उसके कारण पाकिस्तान हुआ. स्वतंत्रता के बाद भी राजनीति के स्तर पर आपको ये बताया जाता है की हम अलग है तुम अलग हो.


समाज से कटुता हटाना है, लेकिन हटाने का मतलब ये नहीं की सच्चाई को छिपाना है. भारत हिंदू राष्ट्र है, गौमाता पूज्य है । लेकिन लिंचिंग करने वाले हिंदुत्व के खिलाफ जा रहे है, वो आतातायी है. कानून के जरिए उनका निपटारा होना चाहिए. क्योंकि ऐसे केसेज बनाए भी जाते है तो बोल नहीं सकते आज कल की कहां सही है कहां गलत है.


आज अगर संघ के नाते हम कोई बात कहते है, अभी ये बात मैं कह रहा हूं, इसकी हिन्दू समाज में तो बहुत बड़ी चर्चा होगी. बहुत बड़ा वर्ग है जो इसका समर्थन करेगा, हमको कहेगा की आपने बहुत अच्छा किया ये पहल की.


ऐसा भी वर्ग है जो खराब नहीं है, अच्छा ही है, अच्छे इंसान है लेकिन वो कहेंगे की बस आप भी भोले बन गए अब. ये जरूर कहेगा. क्योंकि ठोकरें लगी है. वो कहेंगे की अरे ऐसा कभी हुआ था क्या? ऐसा मामला नहीं है ये. आप लोग नहीं समझते. ऐसे भी होंगे. चलेगा.. ये शास्त्रार्थ चलेगा.


लेकिन एक बात है की हिंदू समाज की भावना संघ बोलता है. क्योंकि नीचे तक हमारे स्वयंसेवक है, समाज क्या सोचता है क्या नहीं, हमारे पास आता है, उसके अनुसार मै बता रहा हूं.


हिंदू समाज की हिम्मत बढ़ाने के लिए उसका आत्मविश्वास उसका आत्म सामर्थ्य बढ़ाने का काम संघ कर रहा है. संघ हिंदू संगठनकर्ता है. इसका मतलब बाकी लोगों को पीटने के लिए नहीं है वो.


एक ने पूछा की आप क्या करने जा रहे है? क्या होगा इससे? इससे तो हिंदू समाज दुर्बल होगा. मैने कहा कमाल है.. एक तथाकथित माइनोरिटी समाज है मुसलमान, उसकी पुस्तक का मैं उद्घाटन करने जा रहा हूं उसमे कोई डरता नहीं है और तुम मेजोरिटी समाज के होकर के डरते हो की क्या होगा? ऐसा व्यक्ति एकता नही कर सकता जो डरता है. एकता डर से नहीं होती, प्रेम से होती है, निस्वार्थ भाव से होती है.


हम डेमोक्रेसी है, कोई हिंदू वर्चस्व की बात नहीं कर सकता कोई मुस्लिम वर्चस्व की बात नहीं कर सकता. भारत वर्चस्व की बात सबको करनी चाहिए.


हम कहते है भारत हिंदू राष्ट्र है । इसका मतलब केवल तिलक लगाने वाला, पूजा करने वाला नही है. जो भारत को अपनी मातृभूमि मानता है जो अपने पूर्वजों का विरासतदार है, संस्कृति का विरासतदार है वो हिंदू है । 


हम हिंदू कहते है आपको नहीं कहना है मत कहो, भारतीय कहो, ये नाम का शब्द का झगड़ा छोड़ो. हमको इस देश को विश्व गुरु बनाना है. और ये विश्व की आवश्यकता है, नहीं तो ये दुनिया नहीं बचेगी.

इति।


©️ इस आलेख में व्यक्त विचार मेरे निजी हैं। किसी भी मीडिया माध्यम में पूर्वानुमति के बिना इसके उपयोग की अनुमति नहीं है। 

- मनोज जोशी


Wednesday, June 9, 2021

बिरसा तुम्हें आना होगा

"यह धरती हमारी है, हम इसके रक्षक हैं। हर अन्याय के खिलाफ उलगुलान। यही पुरखों का रास्ता है।अप्राकृतिक ताकतों के खिलाफ एकजुट हो जाओ। उठो प्रकृति नेतुम्हे जीने के लिए सभी हथियार दिये हैं। मैं सभी दिशाओ से पुकार रहा हूँ।" - बिरसा मुंडा


वनवासी समाज के भगवान बिरसा मुंडा की आज पुण्यतिथि है। बिरसा यानी एक ऐसा योद्धा, स्वतन्त्रता सेनानी , समाज सुधारक जिसके बारे में वनवासी आज भी मानते हैं कि वह लौट कर आएगा।

1895 से 1900 तक बिरसा मुंडा का महाविद्रोह ‘ऊलगुलान’ चला. आदिवासियों को लगातार जल-जंगल-ज़मीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किया जाता रहा और वे इसके खिलाफ आवाज उठाते रहे।

 बिरसा ने अंग्रेजों की लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई के साथ-साथ जंगल-ज़मीन के हक  की लड़ाई छेड़ी । बिरसा ने सूदखोर महाजनों के ख़िलाफ़ भी आंदोलन का ऐलान किया. ये महाजन, जिन्हें वे दिकू कहते थे, क़र्ज़ के बदले उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेते थे. यह सामान्य विद्रोह नहीं बल्कि वनवासी अस्मिता और संस्कृति  के संरक्षण के साथ साथ स्वायत्तता का संग्राम था।

बिरसा ने छापामार लड़ाई का सहारा लिया. रांची और उसके आसपास के इलाकों में पुलिस में  बिरसा का आतंक हो गया। जब बिरसा पकड़ में नहीं आए तो  अंग्रेजों ने उन्हें पकड़वाने के लिए पांच सौ रुपये का इनाम रखा था जो उस समय बहुत बड़ी रकम थी.  बिरसा की ही जाति के लोगों ने उन्हें पकड़वा दिया।

‘उलगुलान’ के रुमानीवाद को साहित्य और जंगल से निकलकर साम्यवाद के हाथों में लाने वाले चारू मजुमदार, कनु सान्याल और जगत संथाल ने इसे नक्सलवाद का रंग दे दिया। ‘नक्सलवाद’ शब्द पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से निकला। पं. बंगाल के हाल के विधानसभा चुनाव के परिणाम चाहे जो रहा हो, लेकिन एक बात जिस पर शायद कम ही लोगों का ध्यान गया कि नक्सलबाड़ी के लोगों ने भी अब कम्युनिज्म को नकार दिया है।

बिरसा मुंडा के जीवन और उनके संघर्ष को समझेंगे तो पता चलेगा कि बिरसा मुंडा वनवासियों को उनके अधिकार दिलाने के साथ उन्हें संस्कृति से भी जोड़ कर रखना चाहते थे।

 बिरसा का जन्म वर्तमान झारखण्ड प्रदेश के  अड़की प्रखंड अंतर्गत ग्राम – उलीहातु में 15 नवंबर 1875 को हुआ था।  बिरसा के जन्म के बहुत दिन पहले ही उसके बड़े पिता कानू उलिह्तू में ईसाई बन चुके थे। इनका मसीही नाम पौलूस था। बिरसा के पिता सुगना और उसके छोटे भाई फसना ने बम्बा में जाकर ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। यहाँ तक की सुगना तो जर्मन ईसाई मिशन के प्रचारक भी बन गए थे। इसलिए बिरसा भी अपने पिता के साथ ईसाई हो गये। सुगना का मसीही नाम मसीहदस  और बिरसा का दाऊद मुंडा पड़ा।

बिरसा अपनी मौसी का बड़ा प्यारा था। वे उसे अपने साथ अपने गांधी खटंगा ले गईं । यहाँ एक ईसाई प्रचारक से उनका संपर्क हुआ। वह प्रचारक मुंडाओं की पुरानी धर्म (पंथ/ संप्रदाय/ उपासना पद्धति  ) व्यवस्था की आलोचना किया करता था। यह बिरसा को अच्छा नहीं लगा। नाराज बिरसा वहां से  बुडजो स्थित जर्मन मिशन स्कूल में भर्ती हो गया और  निम्न प्राथमिक (lower primary) की शिक्षा के लिए जर्मन ईसाई मिशन स्कूल चाईबासा में एडमिशन ले लिया । यह 1886 से 1890 के बीच का घटनाक्रम है। उस समय जर्मन – लूथेरन और रोमन कैथोलिक ईसाईयों के भूमि आन्दोलन चल रहे थे। एक दिन चाईबासा मिशन में उपदेश देते हुए डॉ. नोट्रेट ने ईश्वर के राज्य के सिद्धांत पर उपदेश दिया।  डॉ. नोट्रोट ने वनवासियों से कहा  कि यदि वे ईसाई बने रहेंगे और और उनके निर्देशों का पालन करते रहेंगे तो उनकी छिनी हुई जमीन वापस कर दी जाएगी। यह बात बिरसा और अन्य लोगों को नागवार गुजरी। बिरसा ने उसी समय डॉ. नोट्रोट और मिशनरियों की  बहुत ही तीखे शब्दों में आलोचना की। इसका नतीजा यह हुआ कि बिरसा को स्कूल से निकाल दिया गया। इस घटना के बाद बिरसा ने नारा दिया -  "साहब - साहब एक टोपी हे।"  यानी  गोरे अंग्रेज और मिशनरी एक जैसे हैं । । बिरसा ने1890 में चाईबासा छोड़ दिया और जर्मन ईसाई मिशन की सदस्यता भी छोड़ दी। उसने रोमन कैथोलिक मिशन धर्म (religion ) स्वीकार किया। पर बाद में उस religion के प्रति भी उनके मन में विरक्ति आने लगी। आखिरकार वे अपने  पुराने धर्म (पंथ)  की ओर लौट आये। और इसके बाद अपनी संस्कृति और पंथ पर जोर देने लगे।

बिरसा की मुलाकात आनंद पाण्ड नाम के एक व्यक्ति से हुई , जिसने उनका जीवन बदल दिया । आनंद पांड स्वांसी जाति का एक धार्मिक व्यक्ति था।  बिरसा ने उनसे  वैष्णव पंथ के प्रारम्भिक सिद्धांतों और रामायण महाभारत की कथाओं का श्रवण कर ज्ञान हासिल किया। इसी दौरान एक वैष्णव साधु से उनकी मुलाकात हुई। साधु ने उन्हें  तीन महीने तक उपदेश दिए। साधु से प्रभावित होकर बिरसा ने मांस खाना छोड़ दिया और जनेऊ धारण कर शुद्धता और धर्म परायणता का जीवन व्यतीत करने लगा। वह तुलसी की पूजा करने लगा और माथे पर चन्दन का टीका लगाना शुरू किया। यही नहीं उन्होंने गो – वध भी रूकवाया।

वनवासी समाज के भगवान माने जाने वाले स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा ने नारा दिया था " साहब- साहब एक टोपी हे।" यानी गोरे अंग्रेज और मिशनरी एक जैसे हैं । यही नहीं बिरसा अनुयायी जोर - शोर से नारे लगाते थे ;हेन्दे राम्बड़ा रे केच्चे, केच्चे, पूंडी राम्बड़ा रे केच्चे – केच्चे।" यानी काले ईसाइयों और गोरे  ईसाइयों का सिर काट दो। परंतु कोई ईसाई नहीं मारा गया। 


कवि भुजंग मेश्राम की इन पंक्तियों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करुंगा 


‘बिरसा तुम्हें कहीं से भी आना होगा


घास काटती दराती हो या लकड़ी काटती कुल्हाड़ी


यहां-वहां से, पूरब-पश्चिम, उत्तर दक्षिण से


कहीं से भी आ मेरे बिरसा


खेतों की बयार बनकर


लोग तेरी बाट जोहते.’


#मनोज_जोशी

Monday, April 26, 2021

समाज परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव

 समाज परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव 

मनोज जोशी 

कोरोना की इस महामारी और खासतौर से दूसरी लहर ने हमारे तंत्र यानी सिस्टम की खामियों को एक बार फिर सामने लाकर रख दिया है। सिस्टम की इन खामियों को लेकर सोशल मीडिया पर एक अजीबोगरीब युद्ध छिड़ा हुआ है। ‌ मैं भी सिस्टम की खामियों से दुखी हूं और पिछली कम से कम 4 पोस्ट में मेरा यह गुस्सा और दुख जाहिर कर चुका हूं। 

लेकिन इसके आगे एक और पहलू है जिसकी चर्चा होनी चाहिए। लोग पूछ रहे हैं कि सरकार ने यानी सिस्टम ने कोरोना की इस दूसरी लहर की तैयारी क्यों नहीं करी ? यदि बहुत गहराई से सोचें तो आग लगने पर कुआं खोदना यह हमारे सिस्टम का चरित्र बना हुआ है और हमने इसे ऐसा ही स्वीकार भी कर रखा है। जब कोई समस्या या मुद्दा सामने खड़े होता है तभी हम उसका निदान खोजते हैं। पहले से तैयारी यह हमारे सिस्टम का चरित्र ही नहीं है। आज महामारी का समय है इसलिए स्वास्थ्य को लेकर बात हो रही है, लेकिन क्या स्वास्थ्य के अलावा अन्य क्षेत्रों में सिस्टम ठीक काम कर रहा है ? कल्पना कीजिए कि हमारा सिस्टम आज से 5 साल बाद आने वाली किसी समस्या के निराकरण के लिए आज से प्रयास शुरु करता है तो क्या उसकी आलोचना नहीं होगी ? हम ही लोग कहेंगे जब होगा तब देखेंगे अभी तो आज की स्थिति से निपटा जाए।

यह बिल्कुल सही है कि नेताओं ने अपनी रैलियों और सभाओं या पार्टियों की बैठकों में कोरोना प्रोटोकॉल का ध्यान नहीं रखा। लेकिन यह भी सही है कि समाज का बड़ा वर्ग भी उसे भूल सा गया था। दुकानों के आगे बनने वाले गोले और काउंटर के सामने बंधने वाली रस्सी तो गायब हो ही गई थी। हम लोग भी मास्क के बिना सर्वजनिक स्थानों पर घूम रहे थे। जैसे हम वैसे हमारे नेता और वैसा ही हमारा सिस्टम। हमारी और सिस्टम की दोनों की खामियों को मिलाकर समस्या ने विकराल रूप ले लिया और कई ऐसे लोग शिकार हो गए जो बेचारे 100% से भी अधिक सतर्कता बरतते थे। 

जब हम देश के और प्रदेश के चुनाव परिणामों पर नजर डालेंगे तो पता लगेगा कि हमने कई बार व्यवस्था में यानी सिस्टम में परिवर्तन के लिए सत्ता परिवर्तन किया। 1977 में जनता पार्टी की सरकार आई लोगों को उम्मीद थी की व्यवस्था बदलेगी सिस्टम बदलेगा। जब सिस्टम नहीं बदला तो 1980 में जनता ने जनता पार्टी को बाहर का रास्ता दिखा दिया। मप्र में 1977 के बाद 1990 के सत्ता परिवर्तन में भी अपेक्षित व्यवस्था परिवर्तन नहीं दिखा। 2003 आते-आते जब लोग पूरी तरह निराश हो गए और उन्हें उमा भारती के रूप में नया नेतृत्व नजर आया तो फिर सत्ता परिवर्तन हुआ। भाजपा को व्यवस्था परिवर्तन के लिए प्रदेश के लोगों ने तीन अवसर दिए। इस बीच केंद्र की यूपीए सरकार के दो कार्यकालों से आई निराशा के कारण केंद्र में भी मोदी सरकार बन गई। लेकिन इतने सबके बावजूद क्या व्यवस्था यानी सिस्टम में बदलाव हुआ है? इस प्रश्न पर जब गंभीरता से विचार करेंगे तो जवाब मिलेगा कि इन वर्षों में कुछ चीजें बदली है, लेकिन वह उतनी ही है जितना समाज में बदलाव आया है। मेरी बहुत स्पष्ट मान्यता है कि चाहे अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की बात हो या धारा 370 को निष्प्रभावी करने का मुद्दा हो या ऐसा और कोई विषय हो सब पर सरकार या सिस्टम तभी निर्णायक स्थिति में आया है जब समाज में उसको लेकर स्पष्ट मत बन चुका था।

 समस्या के दौरान ही हमारे समाज की ताकत सामने आती है। लाल बहादुर शास्त्री जी के आह्वान पर सोमवार का उपवास इसका एक बड़ा उदाहरण है। वर्तमान समय में पिछले साल लॉक डाउन के दौरान जहां लोग बड़े पैमाने पर भोजन, राशन आदि की व्यवस्था कर रहे थे, वही अब समाज का बड़ा वर्ग इंजेक्शन, ऑक्सीजन, दवाई और अस्पताल के इंतजाम में लगा हुआ है। लोगों ने छोटे-छोटे व्हाट्सएप ग्रुप और फेसबुक ग्रुप बना लिए हैं। किसी को भी कहीं से भी किसी भी तरह की मदद की जरूरत होती है तो वह सूचना एक साथ कई जगह घूमती है और कई लोग मदद के लिए आगे आ जाते हैं। गौर से देखेंगे तो हमारे आसपास ऐसे कई लोग मिल जाएंगे जो अपना नियमित कामकाज छोड़कर इस समय सेवा में लगे हुए हैं, इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो बार-बार अस्पताल का चक्कर लगाने के कारण संक्रमित हो गए। 

बस समाज की इसी ताकत को बचाए रखने और बढ़ाने की जरूरत है। अक्सर कहा जाता है कि सरकार अकेले कुछ नहीं कर सकती। उसे समाज का सहयोग चाहिए होता है। मैं इसके आगे कहता हूं, और यह पहली बार नहीं कह रहा हूं पहले भी कह चुका हूं कि सरकार को सब कुछ करने की जरूरत भी नहीं है। 

केवल सत्ता परिवर्तन से व्यवस्था परिवर्तन हो रहा होता तो अब तक हमारी व्यवस्था हमारा सिस्टम ठीक हो चुका होता। लेकिन 137 करोड़ आबादी वाले इस प्राचीन देश में यह संभव नहीं है। यहां तो समाज परिवर्तन से ही व्यवस्था परिवर्तन संभव है। इस समाज परिवर्तन के यज्ञ में आहुति देने के लिए तैयार रहें।

#मनोज_जोशी 

(हनुमान जयंती, 5123,युगाब्द तदानुसार 27 अप्रैल 2021)


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Tuesday, April 20, 2021

आरोग्य के लिए रामचरितमानस का अध्ययन करें

 

आरोग्य के लिए रामचरितमानस का अध्ययन करें

- #मनोज_जोशी 


आज रामनवमी है। रामनवमी यानी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म दिन ! लगातार दूसरे साल यह पर्व ऐसे समय आया है जब न केवल भारत बल्कि पूरा विश्व एक महामारी से लड़ रहा है। रामनवमी की शुभकामनाएं देते हुए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि आरोग्य के लिए रामचरितमानस का अध्ययन कीजिए ‌‌। आप सोच रहे होंगे भला रामचरितमानस का आरोग्य से क्या रिश्ता ?

मैं एक दिन एक कथावाचक के प्रवचन सुन रहा था, उन्होंने कहा जिस घर में रामचरितमानस होती है वहां आरोग्य होता है। कथावाचक ने घर के सभी सदस्यों को मानस का अध्ययन करने की सलाह दी। मैं भी यही सोच रहा था कि मानस का आरोग्य से क्या रिश्ता?

कथावाचक ने भी बहुत विस्तार में बताने की बजाए केवल राम की भक्ति की बात करी। लेकिन उनके इस कथन के बाद मैंने मानस को जब आरोग्य की दृष्टि से देखा तो समझ आया कि रामचरितमानस में कम से कम 40 ऐसी वन औषधियों का जिक्र है जो अलग-अलग रोगों में उपयोग में आ सकती हैं। श्री राम के युग में भारत में एक विशिष्ट चिकित्सा पद्धति विकसित थी। 

जरा यह उदाहरण देखिए - 

सती अहिल्या को श्रीराम पाषाण (वास्तव में कई वर्षों से कोमा) अवस्था से चरण धूलि से स्वस्थ अवस्था में लाते हैं।

“ जे पद परसि तरी रिषिनारी।

दंडक कानन पावनकारी।। ”

भक्ति भाव में हम इसे श्रीराम का चमत्कार मान लेते हैं, लेकिन वास्तव में यह किसी चमत्कार का परिणाम नहीं था। इस भक्ति में हम यह भूल जाते हैं कि श्री राम जब विश्वामित्र जी श्रीराम विद्या ग्रहण कर रहे थे तो उन्होंने श्रीराम को ऐसी औषधियों की शिक्षा दी थी जो बिना भोजन तथा जल के शरीर को स्वस्थ रख सकती है।

“ तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही।

विद्यानिधि कहुँ विद्या दीन्ही।।

जाते लाग ना छुधा पिपासा।

अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।। ”


लंका में युद्ध के दौरान लक्ष्मण जी का मूर्छित हो जाना और संजीवनी बूटी से उनके इलाज का पूरा प्रसंग तो सभी जानते हैं। इस प्रसंग में एक खास बात जिसका आम तौर पर जिक्र नहीं होता वह या कि लक्ष्मण जी का उपचार लंका के राज वेद्य सुषेण वैद्य ने किया था। यानी उस समय चिकित्सक युद्ध के दौरान घायल दुश्मन का भी इलाज करते थे।

 इसके अलावा श्री राम के जन्म से पहले की कथा को याद कीजिए। महाराज दशरथ एक यज्ञ करते हैं और उस यज्ञ के प्रसाद स्वरूप खीर तीनों महारानियों को ग्रहण कराते हैं। यह यज्ञ भी विश्वामित्र ही संपन्न कराते हैं। तार्किक बुद्धि से विचार कीजिए यह प्रसाद एक औषधि ही थी जिसे केवल महारानियों को ही ग्रहण कराया गया। आप जब अगली बार मानस का अध्ययन करें तो पाएंगे कि अनेक अवसरों पर तुलसीदास जी ने विभिन्न फल फूल आदि के गुणों का वर्णन किया है। कई जगहों पर उन्होंने मनुष्य के स्वभाव,कर्तव्य आदि की व्याख्या करने के लिए इनका सहारा लिया है। 


!! सर्वे संतु निरामया !!

रामनवमी पर यही शुभकामना


*चित्र मेरे निवास पर बेटे रुद्रांश द्वारा तैयार श्रीराम की झांकी का


©️ आलेख में व्यक्त विचार मेरे निजी हैं। किसी भी समाचार माध्यम यथा न्यूज़ वेबसाइट, न्यूज़ चैनल, यूट्यूब चैनल, किसी भी तरह की पत्र-पत्रिका आदि में इनके उपयोग की अनुमति नहीं है। आप अपने सोशल मीडिया नेटवर्क यानी फेसबुक व्हाट्सएप टि्वटर आदि पर मेरे नाम के साथ इसे शेयर कर सकते हैं। यह आलेख मेरे फेसबुक पर भी उपलब्ध है।

- मनोज जोशी (भोपाल) रामनवमी युगाब्द 5123 तदनुसार दिनांक 21 अप्रैल 2021

Friday, April 2, 2021

हिंदुत्व और महात्मा गांँधीजी का रामराज्य (५०)

(गतांक से आगे)

महात्मा गाँधीजी की रामराज्य की अवधारणा हिंदू राष्ट्र के बहुत करीब

-#मनोज_जोशी

हमने पिछली दो- तीन कड़ी में देखा कि हिंदू और हिंदुत्व के साथ हिंदू राष्ट्र की अवधारणा की गलत व्याख्या करके उसे रिलीजन से जोड़ा गया। इसी तरह गाँधीजी की रामराज्य की अवधारणा को जब हम देखते हैं तो पता चलता है कि वह भी रिलीजन पर आधारित नहीं है। आरएसएस की स्थापना से ४ साल पहले असहयोग आंदोलन के दौरान २२ मई, १९२१ को ‘नवजीवन’ में महात्मा गाँधी ने रामराज्य को लेकर जो कुछ लिखा वह पढ़ लीजिए। डॉ हेडगेवार और महात्मा गाँधीजी दोनों के विचारों में समानता ही नजर आएगी।

गाँधी जी लिखते हैं -‘कुछ मित्र रामराज्य का अक्षरार्थ करते हुए पूछते हैं कि जब तक राम और दशरथ फिर से जन्म नहीं लेते तब तक क्या रामराज्य मिल सकता है? हम तो रामराज्य का अर्थ स्वराज्य, धर्मराज्य, लोकराज्य करते हैं। वैसा राज्य तो तभी संभव है जब जनता धर्मनिष्ठ और वीर्यवान् बने. ...अभी तो कोई सद्गुणी राजा भी यदि स्वयं प्रजा के बंधन काट दे, तो भी प्रजा उसकी गुलाम बनी रहेगी। हम तो राज्यतंत्र और राज्य नीति को बदलने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं; बाद में हमारे सेवक के रूप में अंग्रेज रहेंगे या भारतीय हमें इसकी चिंता नहीं करनी पड़ेगी। हम अंग्रेज जनता को बदलने का प्रयास भी नहीं करते।हम तो स्वयं अपने-आप को बदलने का प्रयास कर रहे हैं।'

अब जरा संघ संस्थापक डॉ हेडगेवार के विचारों को ध्यान कर लीजिए। वे भी हिंदू समाज की कमजोरियों को दूर करने की बात करते हुए कहते थे कि इन हालात में यदि हम आजाद हो भी गए तो भी वह बेमानी होगी।


भावनगर में गाँधीजी ने कहा - राम के वंशज समाप्त नहीं हुए हैं

भावनगर में ८ जनवरी १९२५ को काठियावाड़ राजनीतिक सम्मेलन में रामराज्य को लेकर महात्मा गाँधी ने कहा `राम ने एक कुत्ते के साथ भी न्याय किया। राम ने सत्य के लिए अपना राजपाट छोड़कर वन गमन किया जो कि सारी दुनिया के राजाओं के लिए मर्यादा का पाठ है। उन्होंने एक पत्नीव्रत का पालन करते हुए यह दर्शाया कि राजवंश से संबद्ध होने के बावजूद कोई गृहस्थ व्यक्ति पूर्ण आत्मसंयम का पालन कर सकता है। राम को जनमत जानने के लिए आज की तरह मतदान की आवश्यकता नहीं थी बल्कि वे अंतरज्ञान के माध्यम से ही लोगों के हृदय की बात जान लेते थे। राम की प्रजा बहुत प्रसन्न थी। इस तरह का रामराज्य आज भी कायम किया जा सकता है। राम के वंशज समाप्त नहीं हुए हैं।’


रामराज्य का मतलब ईश्वर का राज

उन्होंने १९ सितंबर १९२९ को `यंग इंडिया’ में लिखाः----,`रामराज्य से मेरा मतलब हिंदू राज नहीं है।" (यहाँ गाँधीजी हिंदू शब्द का उपयोग रिलीजन के ‌रूप में कर रहे हैं) वे आगे लिखते हैं- " मेरे रामराज्य का अर्थ है- ईश्वर का राज्य। मेरे लिये, राम और रहीम एक ही हैं; मैं सत्य और धार्मिकता के ईश्वर के अलावा किसी और ईश्वर को स्वीकार नहीं करता। चाहे मेरी कल्पना के राम कभी इस धरती पर रहे हो या न रहे हो, रामायण का प्राचीन आदर्श निस्संदेह सच्चे लोकतंत्र में से एक है, जिसमें एक बहुत बुरा नागरिक भी एक जटिल और महंगी प्रक्रिया के बिना त्वरित न्याय को लेकर आश्वस्त हो।"

रामराज्य यानी धर्म राज्य और रामराज्य ही सबसे बेहतर लोकतंत्र का उदाहरण

२० मार्च, १९३० को ‘नवजीवन’ में ‘स्वराज्य और रामराज्य’ शीर्षक से एक लेख में गाँधीजी ने कहा था- ‘स्वराज्य के कितने ही अर्थ क्यों न किए जाएं, तो भी मेरे नजदीक तो उसका त्रिकाल सत्य एक ही अर्थ है, और वह है रामराज्य। यदि किसी को रामराज्य शब्द बुरा लगे तो मैं उसे धर्मराज्य कहूंगा। रामराज्य शब्द का भावार्थ यह है कि उसमें गरीबों की संपूर्ण रक्षा होगी, सब कार्य धर्मपूर्वक किए जाएंगे और लोकमत का हमेशा आदर किया जाएगा. ...सच्चा चिंतन तो वही है जिसमें रामराज्य के लिए योग्य साधन का ही उपयोग किया गया हो. यह याद रहे कि रामराज्य स्थापित करने के लिए हमें पाण्डित्य की कोई आवश्यकता नहीं है. जिस गुण की आवश्यकता है, वह तो सभी वर्गों के लोगों- स्त्री, पुरुष, बालक और बूढ़ों- तथा सभी धर्मों के लोगों में आज भी मौजूद है. दुःख मात्र इतना ही है कि सब कोई अभी उस हस्ती को पहचानते ही नहीं हैं. सत्य, अहिंसा, मर्यादा-पालन, वीरता, क्षमा, धैर्य आदि गुणों का हममें से हरेक व्यक्ति यदि वह चाहे तो क्या आज ही परिचय नहीं दे सकता?’


भोपाल में कहा - मेरे लिए राम और रहीम एक

सितंबर १९२९ में भोपाल में एक सभा में भी गाँधीजी ने रामराज्य की बात कही थी। गाँधी भवन न्यास द्वारा प्रकाशित पुस्तक मध्यप्रदेश के गाँधीधाम में लिखा है कि गांधीजी ने रामराज्य की पूरी व्याख्या करते हुए कहा था कि मुसलमान भाई इसे अन्यथा न लें, रामराज्य का मतलब है-ईश्वर का राज्य। मेरे लिए राम और रहीम में कोई अंतर नहीं है। उन्होंने कहा था कि जिस रामराज्य की कहानी हमें सुनने को मिलती है वह प्रजातंत्र का आदर्श है।

गाँधीजी ने कुछ अन्य अवसरोंं पर कहा था - "मैं अपने मुस्लिम मित्रों को सचेत करता हूं कि मेरे रामराज्य शब्द के प्रयोग पर वे किसी प्रकार की गलतफहमी में न आएं। मेरे लिए रामराज्य का अर्थ हिंदू राज नहीं है। मेरे लिए रामराज्य का अर्थ दैवीय शासन है। एक प्रकार से ईश्वर का राज्य है। मेरे लिए राम और रहीम एक ही हैं। मैं सत्य के अलावा और किसी को ईश्वर नहीं मानता। मेरी कल्पना के राम कभी इस धरती पर आए थे या नहीं लेकिन रामराज्य का प्राचीन आदर्श निस्संदेह एक प्रकार से सच्चे लोकतंत्र का नमूना है। वह ऐसी शासन व्यवस्था है जहां पर सबसे सामान्य नागरिक को भी लंबी और महंगी प्रक्रिया से गुजरे बिना त्वरित न्याय की उम्मीद बनी रहती है।"

अगस्त १९३४ में अमृत बाज़ार पत्रिका में उन्होंने कहा, 'मेरे सपनों की रामायण, राजा और निर्धन दोनों के लिये समान अधिकार सुनिश्चित करती है।'फिर २ जनवरी १९३७ को हरिजन में उन्होंने लिखा, 'मैंने रामराज्य का वर्णन किया है, जो नैतिक अधिकार के आधार पर लोगों की संप्रभुता है।’


मुस्लिम और ईसाई रिलीजन के लोगों की समझ के लिए वे रामराज्य को खुदाई राज या परमात्मा का राज भी कहने लगे थे।


गाँधीजी ने १९४६ में हरिजन में लिखाः----


`( मैं रामराज्य शब्द का प्रयोग इसलिए करता हूं) क्योंकि यह एक सुविधाजनक और सार्थक अभिव्यक्ति वाला मुहावरा है। इसके विकल्प में कोई दूसरा शब्द नहीं है जो लाखों लोगों तक मेरी बात को इतने प्रभावशाली ढंग से पहुंचा दे। जब मैं सीमांत प्रांत का दौरा करता हूं या मुस्लिम बहुल सभा को संबोधित करता हूं तो मैं अपने भाव को व्यक्त करने के लिए खुदाई राज शब्द का प्रयोग करता हूं। जब मैं ईसाई जनता को संबोधित करता हूं कि तब मैं धरती पर परमात्मा के राज की बात करता हूं।’

२६ फरवरी, १९४७ को एक प्रार्थना-सभा में महात्मा गाँधी ने कहा" मैंने अपने आदर्श समाज को रामराज्य का नाम दिया है. कोई यह समझने की भूल न करे कि राम-राज्य का अर्थ है हिन्दुओं का शासन. मेरा राम खुदा या गॉड का ही दूसरा नाम है। मैं खुदाई राज चाहता हूं जिसका अर्थ है धरती पर परमात्मा का राज्य. ...ऐसे राज्य की स्थापना से न केवल भारत की संपूर्ण जनता का, बल्कि समग्र संसार का कल्याण होगा।'

पिछले 7 महीने से जारी इस श्रंखला की 50 वीं कड़ी तक आते-आते इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि जिन महात्मा गांधी को "रघुपति राघव राजा राम" और "वैष्णव जन तो तेने कहिए जो पीर पराई जाने रे" प्रिय थे स्वाभाविक रूप से वे मन और वचन से हिंदुत्व की मूल अवधारणा के काफी करीब थे।

दोनों की कार्यपद्धति में जरूर कुछ अंतर नजर आता है, लेकिन इस अंतर को बढ़ा चढ़ा कर पेश करके हम केवल उन विघ्न संतोषी लोगों के एजेंडे को ही पूरा करेंगे जिनके विचार की जड़ें भारत में नहीं है।

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अध्ययन के लिए अल्प विराम……

"हिंदुत्व और महात्मा गांँधीजी का रामराज्य" विषय पर यह अध्ययन तब तक बेमानी है जब तक रामराज्य की अवधारणा की प्रासंगिकता पर चर्चा ना हो। अब मैं वाल्मीकि रामायण में राम राज्य के वर्णन और वर्तमान संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता पर अध्ययन शुरू कर रहा हूँ। इस बारे में अध्ययन के लिए इस श्रृंखला को अल्प विराम देता हूं। कुछ ही दिनों में "वर्तमान युग में रामराज्य की प्रासंगिकता" इस विषय पर भी मेरा लेखन किसी न किसी रूप में सामने आएगा।

इस श्रृंखला के लिए अनेक मित्रों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मुझे जो सहयोग प्रदान किया है और जो मेरा उत्साहवर्धन किया है के लिए सबका आभार व्यक्त करता हूं।

(समाप्त)


(यह श्रृंखला मेरे ब्लॉग www.mankaoj.blogspot.com 

और एक अन्य न्यूज़ वेबसाइट www.newspuran.com पर भी उपलब्ध है)




Monday, March 29, 2021

हिंदुत्व और महात्मा गांँधी जी का रामराज्य (४९)

(गतांक से आगे)

आखिर हिंदू राष्ट्र की अवधारणा क्या है ?

#मनोज_जोशी


रामराज्य और उसमें भी गांधीजी के विचार जानने से पहले मुझे लगता है कि हिंदू राष्ट्र की अवधारणा पर भी चर्चा होनी चाहिए, तभी हम यह समझ सकेंगे कि दोनों में अंतर क्या है और दोनों में समानता क्या है ?

इस कड़ी में चर्चा करते हैं कि आखिर हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा क्या है ? 

१९२५ में आरएसएस की स्थापना के साथ डॉ हेडगेवार ने जोर देकर कहा - " हां मैं कहता हूँ कि भारत हिंदू राष्ट्र है।" यानी डॉक्टर हेडगेवार ने यह नहीं कहा कि भारत को हिंदु राष्ट्र बनाना है उन्होंने कहा भारत हिंदू राष्ट्र है। 


संघ की प्रार्थना कहती है 


प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता

इमे सादरं त्वां नमामो वयम्

त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्

शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।


प्रार्थना के इस भाग का हिंदी में अर्थ है


"सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के घटक के रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ। आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें इस कार्य को पूरा करने किये आशीर्वाद दे। हमें ऐसी अजेय शक्ति दीजिये कि सारे विश्व मे हमे कोई न जीत सकें और ऐसी नम्रता दें कि पूरा विश्व हमारी विनयशीलता के सामने नतमस्तक हो। यह रास्ता कांँटों से भरा है, इस कार्य को हमने स्वयं स्वीकार किया है और इसे सुगम कर काँटों रहित करेंगे।"

वास्तव में संघ मानता है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की कोई जरूरत नहीं क्योंकि वह पहले से ही हिंदू राष्ट्र है। 12 वर्षों में लगने वाले कुंभ के मेले, चार धाम की यात्रा, शक्तिपीठों की स्थापना आदि को देख लीजिए। हमारे कई शक्तिपीठ और प्रमुख धार्मिक स्थल पाकिस्तान और बांग्लादेश में चले गए हैं इसे समझ लीजिए। अलग-अलग रियासतों में बँटा इतना बड़ा देश लेकिन सांस्कृतिक रूप से सब एक। सबकी अपनी परंपराएं, सबकी अपनी पूजा पद्धति, सबके अपने विचार लेकिन फिर भी एक। इस 'हिंदू विचार' को 'राष्ट्र विचार' के रूप में देखा जाए। यही हिंदू राष्ट्र है।

 हमने इस श्रंखला की पिछली कड़ी में देखा कि धर्म और हिंदुत्व की गलत व्याख्या के कारण जिस तरह का भ्रम बना है लगभग वही स्थिति हिंदू राष्ट्र को लेकर है। हम पिछली कड़ी में यह जान चुके हैं कि हिंदू विचार यानी हिंदुत्व में पूजा पद्धति और अन्य मान्यताओं को लेकर कोई बंधन नहीं है। ईश्वर को मानने वाला भी हिंदू है और नास्तिक भी हिंदू है तो फिर इस हिंदू विचार को राष्ट्र विचार मानने में किसी भी पूजा पद्धति वाले व्यक्ति को क्या परेशानी होना चाहिए। 

कहा जाता है कि यदि भारत हिंदु राष्ट्र होगा तो यहाँ मुसलमानों और ईसाइयों की स्थिति दूसरे दर्जे के नागरिक जैसी हो जाएगी। इस आशंका का समाधान करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि यह देखा जाए कि राजनीतिक रूप से हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को सबसे पहले प्रस्तुत करने वाले वीर सावरकर ने इस पर क्या कहा था ?

 हिंदू महासभा के अध्यक्ष रूप में सावरकर ने कहा


"हिंदु महासभा न सिर्फ प्रति व्यक्ति एक वोट के सिद्धांत को स्वीकार करती है बल्कि मानती है कि इसके साथ मौलिक अधिकार और कर्तव्य भी सभी नागरिकों के लिए उनकी नस्ल और धर्म से परे समान होने चाहिए… अल्पसंख्यक अधिकारों की कोई भी बात सैद्धांतिक रूप से न केवल अनावश्यक बल्कि विरोधाभासी भी है।

क्योंकि यह सामुदायिक आधार पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक होने का बोध कराता है। लेकिन व्यावहारिक राजनीति जैसी माँग करती है और हिंदू संगठनी गैर-हिंदू देशवासियों को भयमुक्त करना चाहते हैं, उसके लिए हम इस बात पर ज़ोर देते हैं कि अल्पसंख्यकों के धर्म, संस्कृति और भाषा के लिए वैधानिक अधिकार दिए जाएँगे– जिसकी एक शर्त होगी-

बहुसंख्यकों के समान अधिकारों पर इससे अतिक्रमण न हो, न वे इससे निरस्त हों। अल्पसंख्यकों के अलग विद्यालय हो सकते हैं जिसमें वे अपने बच्चों को अपनी भाषा में शिक्षा दें, अपने धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थान हो सकते हैं जिसे सरकार सहायता भी मिले लेकिन वे जितना कर देते हैं, उसके अनुपात में। ये सिद्धांत बहुसंख्यकों पर भी लागू हों।

इन सबसे आगे और ऊपर, यदि संविधान संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों और प्रति व्यक्ति एक वोट पर आधारित नहीं होता है तो जो अल्पसंख्यक अलग निर्वाचन क्षेत्र या आरक्षित सीटें चाहते हैं, उन्हें उसकी अनुमति होगी- लेकिन उनकी जनसंख्या के अनुपात में जिससे बहुसंख्यकों के समान अधिकारों का हनन न हो।

मुस्लिम अल्पसंख्यकों से समान नागरिकों की तरह व्यवहार होगा, वे समान सुरक्षा के अधिकारी होंगे और उनकी जनसंख्या के अनुपात में उन्हें जनपद अधिकार मिलेंगे। हिंदू बहुसंख्यक किसी भी गैर-हिंदू अल्पसंख्यक के वैधानिक अधिकारों पर अतिक्रमण नहीं करेंगे।

लेकिन किसी भी सूरत में हिंदू बहुसंख्यकों को अपने उन अधिकारों को नहीं त्यागना चाहिए जो किसी लोकतांत्रिक और वैधानिक संविधान के तहत बहुसंख्यकों को मिलते हैं। विशेषकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों ने अल्पसंख्यक रहकर हिंदुओं के प्रति आभार व्यक्त नहीं किया है और इसलिए उन्हें प्राप्त पद और नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों में अनुपात के अनुसार मिली वैधानिक साझेदारी से संतुष्ट होना चाहिए।

मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के वैधानिक अधिकारों और विशेषाधिकारों पर निषेधाधिकार देना और उसे “स्वराज्य” कहना निरर्थक होगा। हिंदू शासकों को बदलना नहीं चाहते, वे इसलिए संघर्ष नहीं कर रहे, इसलिए मरने के लिए तैयार नहीं हैं कि किसी एडवर्ड का स्थान कोई औरंगजेब ले ले, मात्र इस आधार पर कि उसका जन्म भारतीय सीमाओं के अंदर हुआ है, वे अपने घर में, अपनी भूमि में अपना स्वामित्व चाहते हैं।"


ध्यान रहे सावरकर यह सब तब कह रहे हैं जब देश में अंग्रेजों का राज था और रियासतें भी कायम थीं। भारत की आजादी का संघर्ष चल रहा था, संविधान क्या होगा यह तय नहीं था, उस समय एक व्यक्ति एक वोट की बात कहना बहुत बड़ी बात थी। एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सावरकर जहाँ यह कहते थे कि भारत में हिंदु और मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्र है वहीं वे विभाजन को स्वीकार नहीं करते थे। यानी दोनों साथ रहेंगे और दोनों के अधिकार बराबर होंगे कोई किसी के अधिकार पर दबाव बनाकर अतिक्रमण नहीं करेगा। 

(क्रमशः)


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Friday, March 26, 2021

हिंदुत्व और महात्मा गांधी जी का रामराज्य (४८)

 (गतांक से आगे)

सिंधु का अपभ्रंश नहीं है हिंदु, और हिंदुत्व ही राष्ट्रीयत्व है, 

जानिए शोध क्या कहती है 

#मनोज_जोशी

मैंने पिछली पोस्ट में कहा था कि धर्म की तरह हिंदु शब्द की भी गलत व्याख्या की जाती है। हिंदु को रिलीजन बता कर कहा जाता है कि पारसी लोगों ने सिंधु किनारे रहने वालों को हिंदु कहा, क्योंकि वे स को ह उच्चारण करते थे। पहली बात तो यह कि हिंदु क्रिश्चियन और मुस्लिम की तरह कोई रिलीजन नहीं है, इसकी आगे व्याख्या करूंगा। पहले हिंदु शब्द की उत्पत्ति पर बात करते हैं।

विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन करने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हिंदु शब्द पारसियों ने नहीं दिया। जो लोग यह दावा करते हैं कि यह फारसियो का दिया शब्द है, उनसे मेरा पहला सवाल है कि भारत के लोग तो फारसी नहीं बोलते थे फिर उन्होंने एक फारसी शब्द कैसे अपना लिया। न केवल अपना लिया बल्कि उसे अपनी पहचान मान लिया। दूसरा सवाल उस समय भारत की सीमा अफगान तक थी और भारत की सीमा के सबसे करीब काबुल नदी थी तो हमें काबुली क्यों नहीं कहा गया ??

अब फारसी भाषा के व्याकरण की बात कर लीजिए फारसी लोग खुद को परस बोलते उसमे भी 'स' है । वे तो खुदको परह नहीं कहते थे । प्राचीन इराकी शहर सुमेर को भी वे सुमेर ही कहते थे हुमेर भाई। प्राचीन समय में सिंध राज्य था और उसे सिंध ही कहा गया साथ ही आज के पाकिस्तान में सिंध प्रान्त है पर उसे भी सिंध ही कहते है और यदि सिन्धु के दूसरी तरह रहने वालो को हिन्दु कहा गया तो सिंध को सिंध ही क्यों हिन्द क्यों नहीं। संस्कृत को भी हंह्कृत नहीं कहते।

एक और बात पारसी पंथ की स्थापना 700 ईसा पूर्व की है। बाद में इस पंथ को संगठित रूप दिया जरथुस्त्र ने। लेकिन हिंदु शब्द का जिक्र पारसियों की किताब से पूर्व की किताबों में भी मिलता है। 

उदाहरण देखिए -

मेरु तंत्र ( शैव ग्रन्थ ) में हिन्दु शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया है...

'हीनं च दूष्यत्येव हिन्दुरित्युच्चते प्रिये’

( अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दु कहते हैं )

लगभग यही मंत्र कल्पद्रुम में भी दोहराया गया है...

‘हीनं दूषयति इति हिन्दू ‘(

 अर्थात... जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे वह हिन्दु है।)

पारिजात हरण में “हिन्दु” को कुछ इस प्रकार कहा गया है |

हिनस्ति तपसा पापां दैहिकां दुष्टम ¡

हेतिभिः शत्रुवर्गं च स हिंदुरभिधियते ।।

माधव दिग्विजय में हिन्दु शब्द का इस प्रकार उल्लेख है...

ओंकारमंत्रमूलाढ्य पुनर्जन्म दृढाशयः ।

गोभक्तो भारतगुरू र्हिन्दुर्हिंसनदूषकः ॥

( अर्थात... वो जो ओमकार को ईश्वरीय ध्वनि माने... कर्मो पर विश्वास करे, गौ पालक रहे तथा बुराइयों को दूर रखे वो हिन्दु है )

ऋग्वेद (८:२:४१) में ‘विवहिंदु’ नाम के राजा का वर्णन है जिसने 46000 गाएँ दान में दी थी विवहिंदु बहुत पराक्रमी और दानीराजा था और, ऋग्वेद मंडल 8 में भी उसका वर्णन है। ब्रहस्पति अग्यम में हिन्दु शब्द इस प्रकार आया है…

हिमालयं समारभ्य यावत इन्दुसरोवरं ।

तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थानं प्रचक्षते ।।

( अर्थात... हिमालय से इंदु सरोवर तक देव निर्मित देश को हिन्दुस्थान कहते हैं )

 -इस्लाम के चतुर्थ खलीफ़ा अली बिन अबी तालिब लिखते हैं कि वह भूमि जहां पुस्तकें सर्वप्रथम लिखी गईं, और जहां से विवेक तथा ज्ञान की‌ नदियां प्रवाहित हुईं, वह भूमि हिन्दुस्तान है। 

- नौवीं सदी के मुस्लिम इतिहासकार अल जहीज़ लिखते हैं...

“हिन्दु ज्योतिष शास्त्र में, गणित, औषधि विज्ञान, तथा विभिन्न विज्ञानों में श्रेष्ठ हैं। मूर्ति कला, चित्रकला और वास्तुकला का उऩ्होंने पूर्णता तक विकास किया है। उनके पास कविताओं, दर्शन, साहित्य और नीति विज्ञान के संग्रह हैं। भारत से हमने कलीलाह वा दिम्नाह नामक पुस्तक प्राप्त की है।

इन लोगों में निर्णायक शक्ति है, ये बहादुर हैं। उनमें शुचिता, एवं शुद्धता के सद्गुण हैं। मनन वहीं से शुरु हुआ है।

चीनी यात्री ह्वेनसांग के समय में 'हिंदु' शब्द प्रचलित था। चीनी भाषा में भी 'इंदु को 'इंतु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इंतु' या 'हिंदु' कहते थे। मैंने कहीं पढा है कि हिंदु शब्द संस्कृत से आया है। ह:+इंदु --हिंदु। अर्थात जिसका ह्रदय इंदु यानी चंद्रमा के समान पवित्र है। वह हिंदु है। एक मान्यता यह भी है कि हिंदु शब्द हिमालय के प्रथम अक्षर 'हि' एवं 'इन्दु' का अंतिम अक्षर 'न्दु'। इन दोनों अक्षरों को मिलाकर शब्द बना 'हिन्दु और यह भू-भाग #हिन्दुस्थान कहलाया।

सही शब्द हिंदु है हिंदू नहीं

पोस्ट के बीच में एक बात और कहना चाहता हूँ भाषा की शुद्धता के हिसाब से सही शब्द हिंदु है हिंदू नहीं। दा में बड़े ऊ की मात्रा लगाकर हिंदू लिखना अशुद्ध है। संस्कृत के इंदु शब्द में भी छोटे उ की मात्रा है और चीनी भाषा का इंतु भी देवनागरी में त में छोटी उ की मात्रा लगाकर ही लिखा जाता है। यह बात स्वीकार करने में कोई गुरेज नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में हिंदु अस्मिता को लेकर चले आंदोलनों में बार-बार गुंजायमान होने के कारण हिंदु शब्द हिंदू में बदल गया।

अब पंथ यानी religion की बात

अंग्रेजी के शब्द religion का अनुवाद धर्म कर देने से भारत के संदर्भ में गङबङ हो गया। हमारे लिए धर्म का पूजा पद्धति से कोई लेना देना नहीं है। पिछली पोस्ट में हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि जो धारण करने योग्य है वह धर्म है।

उच्चतम न्यायालय भी यही कहता है।

क्या हिन्दुत्व को सच्चे अर्थों में धर्म कहना सही है? इस प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय ने – “शास्त्री यज्ञपुरष दास जी और अन्य विरुद्ध मूलदास भूरदास वैश्य और अन्य (1966(3) एस.सी.आर. 242) के प्रकरण का विचार किया। इस प्रकरण में प्रश्न उठा था कि स्वामी नारायण सम्प्रदाय हिन्दुत्व का भाग है अथवा नहीं ? इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री गजेन्द्र गडकर ने अपने निर्णय में लिखा –

"जब हम हिन्दु धर्म के संबंध में सोचते हैं तो हमें हिन्दु धर्म को परिभाषित करने में कठिनाई अनुभव होती है। विश्व के अन्य मजहबों के विपरीत हिन्दु धर्म किसी एक दूत को नहीं मानता, किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं है, वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, यह किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति नीति को नहीं मानता, वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की संतुष्टि नहीं करता है। वृहद रूप में हम इसे एक जीवन पद्धति के रूप में ही परिभाषित कर सकते हैं – इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं।"

रमेश यशवंत प्रभु विरुद्ध प्रभाकर कुन्टे (ए.आई.आर. 1996 एस.सी. 1113) के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय को विचार करना था कि विधानसभा के चुनावों के दौरान मतदाताओं से हिन्दुत्व के नाम पर वोट माँगना क्या मजहबी भ्रष्ट आचरण है। उच्चतम न्यायालय ने इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हुए अपने निर्णय में कहा-

"हिन्दु, हिन्दुत्व, हिन्दुइज्म को संक्षिप्त अर्थों में परिभाषित कर किन्हीं मजहबी संकीर्ण सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता है। इसे भारतीय संस्कृति और परंपरा से अलग नहीं किया जा सकता।"

अब बात सनातन धर्म की - 

सनातन का अर्थ शाश्वत होता है यानी कभी न खत्म होने वाला । हिंदुत्व सबसे प्राचीन विचारधारा है जिसके धारणत्व आचरण को धर्म कहा गया । जो किसी एक किताब से शुरू नही होती और ना ही खत्म होती है! आस्तिक-नास्तिक या निराकार साकार सब विषयो विचारो को सनातन धर्म खुद में समाए हुए है। ध्यान से देखिए इसमें विश्व की सभी पूजा पद्धतियां समाहित हैं ।

हिंदुत्व क्या है ?

“एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका” (Encyclopedia Britannica) में “हिन्दुत्व” शब्द का अर्थ बताया गया है 

“Hindutva (‘Hinduness’), is an ideology that sought to define Indian culture in terms of Hindu values.” सवाल यह है कि हिंदू वैल्यूस या हिंदुओं के गुण क्या हैं? विवेक, अनुशासन, इन्द्रियों और मन पर संयम रखना, त्याग, सत्य, परोपकार और फल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना यह हिंदुत्व के गुण हैं। 

#हिंदुत्व ही #राष्ट्रीयत्व है

हिंदु शब्द की उत्पत्ति की बात मेरे ख्याल से स्पष्ट हो गई। हिंदु शब्द भारत के प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। और यह ग्रंथ भारत में मुस्लिम और ईसाई पंथ के आगमन से पहले के हैं । भारत के मुस्लिम और ईसाई भी इस हिसाब से हिंदु ही हैं । क्योंकि हमारे पूर्वज एक हैं । इन ग्रंथों पर भारत के मुसलमानों और ईसाइयों का भी उतना ही अधिकार है जितना अन्य का। पूजा पद्धति बदल जाने से पूर्वज नहीं बदलते। इसी श्रंखला की पिछले कड़ियों में मोहम्मद अली जिन्ना, अल्लामा इकबाल और शेख अब्दुल्ला के परिवार द्वारा इस्लाम ग्रहण करने का उदाहरण दिया जा चुका है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हिन्दुत्व शब्द इस उपमहाद्वीप के लोगों की जीवन पद्धति से संबंधित है। इसे संकीर्णता नहीं कहा जा सकता। साधारण रूप में हिन्दुत्व को एक जीवन पद्धति ही समझा जा सकता है।

(क्रमशः)


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